Search
  • Follow NativePlanet
Share
» »तमिलनाडु के रहस्‍यमय स्‍थल

तमिलनाडु के रहस्‍यमय स्‍थल

By Namrata Shastry

P.C: JR Korpa

प्रकृति की गोद में ऐसे कई अद्भुत स्‍थान हैं जिन्‍हें देखकर मनुष्‍य मंत्रमुग्‍ध हो जाता है। पृथ्‍वी पर अनेक रहस्‍यमयी स्‍थल भी मौजूद हैं और आज हम आपको तमिलनाडु के कुछ रहस्‍यमयी स्‍थलों के बारे में बताने जा रहे हैं। इन्‍हें देखकर आपको आश्‍चर्य होगा कि ऐसी कोई जगह आज भी मौजूद है। उत्‍कृष्‍ट वास्‍तुकला, समृद्ध इतिहास से सजी तमिलनाडु के ये जगहें किसी को भी आकर्षित कर सकती हैं।

कार्तिकेय मुरुगा का सिक्क्कल सिंगारवेलावर मंदिर

कार्तिकेय मुरुगा का सिक्क्कल सिंगारवेलावर मंदिर

P.C: Shaouraav Shreshtha

सिक्क्कल सिंगारवेलावर मंदिर में स्थापित मूर्ति से पसीना आता है। इस मंदिर में हर साल अक्टूबर से नवंबर के मध्य में एक त्योहार मनाता है, जिसमें भगवान सुब्रमण्य की पत्थर की मूर्ति को पसीना आता है। यह त्योहार राक्षस सुरापदमन पर भगवान सुब्रमण्य की जीत के उत्सव का प्रतीक है और राक्षस को मारने के लिए उत्सुकता से इंतजार करते हुए भगवान सुब्रमण्य के क्रोध का प्रतीक मूर्ति का पसीना है। त्योहार के अंत में पसीना कम हो जाता है। इस जल को भक्तों और दर्शनार्थियों द्वारा बहुत पवित्र माना जाता है, इसलिए पसीने का पानी सौभाग्य और समृद्धि की निशानी के रूप में उन पर छिड़का जाता है।

तंजावुर मंदिर

तंजावुर मंदिर

P.C: Vinayaraj

कला और वास्तुकला से समृद्ध तंजावुर शहर में प्रसिद्ध तंजावुर मंदिर स्थित है एवं इसे ब्रह्देशेश्वर मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। राजा चोल-I द्वारा 1010 ईस्वी में निर्मित यह हिंदू मंदिर भगवान शिव की हिंदू पौराणिक आकृति को समर्पित है। यूनेस्को के विश्व धरोहर स्थल के रूप में घोषित इस मंदिर को प्राचीन चोल वंश के सबसे उल्लेखनीय स्मारकों में से एक माना जाता है। मंदिर की दीवारें पौराणिक आकृतियों, कहानियों और किंवदंतियों की विरासत से सजी हैं। इसकी दीवारों को जटिल नक्काशी और मूर्तियों से सजाया गया है।

मंदिर की दीवारें उस समय के राजा फ्रांस रॉबर्ट और एक चीनी व्यक्ति से मिलती-जुलती मानव आकृतियों की नक्काशी हैं लेकिन इनकी पहचान अभी तक नहीं की जा सकी है। इतिहासकारों के अनुसार, दुनिया 1500 ईस्‍वीं तक जुड़ी नहीं थी। वास्तव में, भारतीय धरती पर पैर रखने वाला पहला व्‍यक्‍ति वास्को डी गामा था, जो इस मंदिर के निर्माण के लगभग 500 साल बाद आया था। क्या इससे पता चलता है कि तत्कालीन भारतीय राजा चोल- ने पहले ही अन्य देशों के साथ अंतर्राष्ट्रीय संबंध स्थापित कर लिए थे? यदि हां, तो उस समय परिवहन और संचार के साधन क्या थे?

राम सेतु पुल

राम सेतु पुल

P.C: Jonathan Safa

हिंदुओं के पवित्र ग्रंथ रामायण की घटनाओं से रामसेतु का गहरा संबंध है। सीता को रावण के चंगुल से छुड़ाने के लिए भारत और श्रीलंका के बीच तैरते पत्थरों से बना पौराणिक पुल पर्यटकों को आज भी हज़ारों साल बाद दिखाई देता है। इसे एडम ब्रिज के नाम से भी जाना जाता है, यह भारत और श्रीलंका की भूमि के बीच स्थित है। प्राचीन हिंदू मिथक के अनुसार, 10 मिलियन वानरों या बंदरों की एक सेना के साथ भगवान राम ने इस पुल को चूना पत्थर के विशाल पत्‍थरों से बनाया था। पत्‍थरों को पानी में डालते ही वो डूब जाते थे इसलिए उन पर भगवान राम का नाम लिखकर समुद्र में फेंका गया। इससे पत्‍थर तैरने लगे और भारत में धनुषकोडी और श्रीलंका के मन्नार द्वीप के बीच मात्र पांच दिनों में 30 किलोमीटर लंबा और 3 किलोमीटर चौड़ा पुल बनाया गया। कई वैज्ञानिकों और पुरातत्वविदों ने पुल के अस्तित्व के पीछे की कहानी के इस प्राचीन और अप्रमाणित संस्करण का खंडन किया लेकिन साथ ही साथ रामेश्वरम में पाए गए तैरते पत्थरों की अवधारणा को समझाने में विफल रहे।

नचियार कोइल – कल गरुड

नचियार कोइल – कल गरुड

P.C: Sandesh Rajbhandari

देश के सबसे रहस्यमय मंदिरों में से एक मंदिर तमिलनाडु में कुंभकोणम में स्थित है जिसका नाम नचियार कोइल - काल गरुड़ मंदिर है। इस मंदिर में हिंदू देवता भगवान विष्णु के चील पर्वत की प्रसिद्ध पत्थर की मूर्ति है। हर साल गर्मियों के महीनों में मंदिर में एक विस्तृत जुलूस निकलता है एवं इस जुलूस में भगवान की प्रतिमा भी निकाली जाती है। किवदंती है कि जैसे ही प्रतिमा मंदिर से बाहर जाती है, प्रतिमा का वजन तेजी से बढ़ने लगता है।

इस प्रकार मूर्ति को ले जाने वालों की संख्या भी अंततः 4 से 8 लोगों से बढ़कर 16 से 32 हो जाती है। इसी प्रकार, जब भगवान विष्णु की मूर्ति को वापस मंदिर में लाया जाता है तो मूर्ति का वजन कम हो जाता है और इसे ले जाने के लिए आवश्यक लोगों की संख्या भी 64 से घट जाती है। मूर्ति के वजन में इस अथाह परिवर्तन ने वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं को भी उलझन में डाल रखा है।

कृष्‍ण बटरबॉल

कृष्‍ण बटरबॉल

P.C: Dey.sandip

तमिलनाडु के ऐतिहासिक शहर महाबलिपुरम में एक खड़ी चट्टान की ढलान पर पांच मीटर के व्यास के साथ लगभग 20 फीट की ऊंचाई वाला विशालकाय पत्‍थर कई वर्षों से बिना हिले-डुले खड़ा है। ये पत्‍थर कभी भी पहाड़ी की ढलान से नीचे नहीं लुड़कता है। इस पत्‍थर का असाली नाम 'वान इराई काल' जिसका शाब्दिक अर्थ है 'स्काई गॉड्स स्टोन'। अनुमान है कि पिछले लगभग 1200 वर्षों से ये पत्‍थर इसी जगह पर बिना लुढ़के टिका हुआ है।

इस पत्‍थर का वजन 250 टन से अधिक है और वर्ष 1908 में मद्रास के राज्यपाल ने चट्टान को धकेलने के लिए सात हाथियों को लगा दिया था ताकि लोगों को इससे होने वाले खतरे से दूर रखा जा सके, लेकिन सात हाथी मिलकर भी इस चट्टान को हिला नहीं पाए थे। आज तक कोई भी इस बात का पता नहीं लगा पाया है कि इतना भारी पत्‍थर इतने वर्षों से यहां कैसे टिका है और ये किस तरह संतुलित है।

Read more about: तमिलनाडु

यात्रा पर पाएं भारी छूट, ट्रैवल स्टोरी के साथ तुरंत पाएं जरूरी टिप्स

Notification Settings X
Time Settings
Done
Clear Notification X
Do you want to clear all the notifications from your inbox?
Settings X
We use cookies to ensure that we give you the best experience on our website. This includes cookies from third party social media websites and ad networks. Such third party cookies may track your use on Nativeplanet sites for better rendering. Our partners use cookies to ensure we show you advertising that is relevant to you. If you continue without changing your settings, we'll assume that you are happy to receive all cookies on Nativeplanet website. However, you can change your cookie settings at any time. Learn more