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Navratri Special! मेघालय में स्थित है माता का 600 साल पुराना मंदिर, कहा जाता है दुर्गा का स्थायी निवास

मंदिरों की वास्तुकला और सुंदरता की जब भी बात की जाती है तो सबसे पहले दक्षिण भारत का ही नाम है लेकिन देश के कई ऐसे हिस्से है, जहां मंदिरों की सुंदरता की मिशालें दी जाती है। आज हम ऐसी ही एक मंदिर की बात करने जा रहे हैं जो अपने आप में ऐतिहासिक भी है और धार्मिक भी है। यह मंदिर मेघालय के जयंतिया पहाड़ी पर स्थित है, जिसे नर्तियांग मंदिर के नाम से जाना जाता है। इस पहाड़ी और आसपास के लोग इस पवित्र स्थान को माता का स्थायी निवास मानते हैं।

मंदिर को लेकर पौराणिक कथा

मंदिर को लेकर पौराणिक कथा

यह मंदिर माता दुर्गा के 51 शक्तिपीठों में से एक भी है। कहा जाता है कि जब माता सती ने अपना देह त्याग किया था, तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता के शरीर को कई हिस्सों में बांट दिया था और इस दौरान जयंतिया हिल्स पर माता की बाई जांघ गिरी, जिसके बाद ये स्थान शक्तिपीठ के नाम से प्रचलित हुआ।

मंदिर का इतिहास

मंदिर का इतिहास

नर्तियांग मंदिर को मां दुर्गा जयंतेश्वरी के नाम से भी जानी जाती हैं। कहा जाता है कि इस मंदिर की स्थापना करीब 600 साल पहले हुआ था। तत्कालीन जयंतिया साम्राज्य के शासक राजा धन मानिक के शासनकाल में य स्थान उनकी ग्रीष्मकालीन राजधानी हुआ करती थी। एक बार राजा को माता ने स्वप्न दिया और इस स्थान के महत्व और पौराणिक इतिहास के बारे में बताया और कहा कि इस स्थान पर एक मंदिर का निर्माण किया जाए। मां दुर्गा के इस सपने के बाद राजा ने एक मंदिर का निर्माण कराया और उस समय इस मंदिर का नाम जयंतेश्वरी मंदिर पड़ा।

इस मंदिर में माता शक्ति के साथ कालभैरव भी विराजमान है, जो कामदीश्वर के नाम से जाने जाते हैं। मेघालय के हिंदू समाज के लिए यह मंदिर काफी पवित्र स्थान है और उनके लिए यह मंदिर उनकी संस्कृति, स्थानीय पहचान और रीति-रिवाजों का प्रतीक भी है और माता का स्थायी निवास भी है।

खास है इस मंदिर की दुर्गा पूजा

खास है इस मंदिर की दुर्गा पूजा

नर्तियांग मंदिर में मनाए जाने वाले दुर्गा उत्सव भी काफी अलग तरीके से मनाई जाती है। इसी के चलते यह मंदिर देश के बाकी हिस्सों में स्थापित मंदिरों से अलग है। दुर्गा पूजा के दौरान मंदिर में केले के पेड़ को गेंदे के फूल से सजाया जाता है और मां दुर्गा के रूप में उसी की पूजा की जाती है। इस मंदिर में 4 दिनों के लिए दुर्गोत्सव का आयोजन किया जाता है फिर मयतांग नदी में केले के पेड़ को विसर्जित कर दिया जाता है। इसके अलावा इस खास पर्व पर माता को गन सैल्यूट भी दिया जाता है।

आज भी संरक्षित है मंदिर में जयंतिया साम्राज्य के हथियार

आज भी संरक्षित है मंदिर में जयंतिया साम्राज्य के हथियार

कामदीश्वर महादेव के मंदिर में आज भी जयंतिया राजघराने के पुराने आयुध और शस्त्र संरक्षित करके रखे गए हैं। इसके साथ ही दुर्गा पूजा के दौरान इस मंदिर में आने वाले भक्तों को नवरात्र पूजा के साथ-साथ राजपुरोहित परंपरा भी देखने को मिलती है, जो इस मंदिर को और भी खास बनाता है। मंदिर में अष्टमी के दिन मानव मुखोटे में धोती पहनाकर बकरे और बत्तख की बलि दी जाती है। इस मंदिर में दशकों पहले आत्मोत्सर्ग की भी परंपरा थी, जो अब बंद हो चुकी है।

नर्तियांग मंदिर कैसे पहुंचें?

नर्तियांग मंदिर कैसे पहुंचें?

नर्तियांग मंदिर एक पहाड़ी पर स्थित होने के चलते यहां कोई एयरपोर्ट या रेलवे स्टेशन नहीं है। यहां का नजदीकी एयरपोर्ट शिलांग में स्थित है, जो लगभग 67 किमी. की दूरी पर स्थित है। इसके अलावा यहां का नजदीकी रेलवे स्टेशन मेंदीपाथर है, जो कि मंदिर परिसर से करीब 285 किमी. है। वहीं, सड़क मार्ग से भी मंदिर परिसर तक आसानी से पहुंचा जा सकता है।

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