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आश्चर्यजनक! इस जगह पर अपने परमभक्त को भगवान शिव ने माना था अपना गुरु

भगवान शिव का अतिप्रिय महीना सावन का अधिमास चल रहा है। इस समय महादेव के हर मंदिर में भक्तों की भीड़ उमड़ रही है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कहा जाता है कि भगवान शिव जन्म और मृत्यु से परे हैं। उनकी ना तो कई मां है और ना ही उनका कोई गुरु है। वह स्वयं परब्रह्म हैं, जिसके पास हर तरह का ज्ञान मौजूद है। भगवान शिव को भक्त वत्सल भी कहा जाता है।

Kapaleeshwar mahadev

महादेव से पूरे दिल से कोई मनोकामना मांगी जाए तो वह उसे जरूर पूरा करते हैं। लेकिन क्या आपने कभी किसी ऐसे स्थान के बारे में सुना है जहां भगवान शिव ने अपने ही परमभक्त को अपना गुरु मान लिया था? जी हां, यह स्थान है महाराष्ट्र का नाशिक। जहां कपालेश्वर मंदिर में भगवान शिव ने अपने भक्त को गुरु तो माना लेकिन नंदी महाराज को अपने मंदिर के सामने बैठने से मना कर दिया। आखिर क्या है यह पूरा माजरा और कैसे जुड़ी है ये दोनों पौराणिक कथाएं?

नंदी महाराज भगवान शिव के सिर्फ गण ही नहीं बल्कि उनके वाहन भी हैं। कहा जाता है कि भगवान शिव के बाद जब तक नंदी महाराज की पूजा नहीं हो जाती है, तब तक महादेव की पूजा अधुरी ही रहती है। इतना ही नहीं, मान्यता तो यह भी है कि नंदी महाराज की मूर्ति के कान में अगर आप अपनी इच्छा बताते हैं तो वह महादेव तक जरूर पहुंच जाती है। नंदी महाराज को भगवान शिव के हर मंदिर के बाहर प्रतिक्षारत मुद्रा में जरूर बैठे देखा जाता है। लेकिन नाशिक का कपालेश्वर महादेव का मंदिर संभवतः भारत का एकलौता मंदिर है, जहां मंदिर के बाहर नंदी की कोई मूर्ति नहीं है।

Kapaleshwar shiva

दरअसल, भगवान शिव ने अपने जिस परमभक्त को अपना गुरु माना था, वह कोई और नहीं बल्कि नंदी ही हैं। इसलिए जिस स्थान पर भगवान शिव ने नंदी को अपना गुरु माना था, वहां उन्होंने नंदी को अपने मंदिर के बाहर बैठने से मना कर दिया था। पर महादेव ने नंदी को अपना गुरु क्यों माना? चलिए आपको इसकी कहानी भी बताते हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार पहले ब्रह्मा जी के 5 मुख हुआ करते थे। इनमें से 4 मुख वेदों का उच्चारण करता था और 5वां मुख दूसरों की निंदा किया करता था। एक बार भगवान शिव के साथ ब्रह्मा जी की किसी बात पर बहस हो गयी और अपने 5वें मुख से उन्होंने शिवजी की निंदा शुरू कर दी। इससे क्रोधित होकर भगवान शिव ने अपने त्रिशुल से ब्रह्मा जी के 5वें मुख को काट दिया।

Ram kund

इस वजह से महादेव पर ब्रह्म हत्या का पाप लग गया। किसी भी जगह पर जाने पर भी महादेव को इस पाप से मुक्ति नहीं मिल रही थी। तब ऐसे ही वह एक दिन सोमेश्वर में गये जहां एक बछड़े (नंदी) से उनकी मुलाकात हुई, जिसपर ब्रह्म हत्या का पाप लगा था। बछड़े ने महादेव को ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति का तरीका बताया। महादेव को लेकर वह बछड़ा उस स्थान पर पहुंचा जहां आज कपालेश्वर महादेव का मंदिर है। यहां उसने (बछड़े ने) महादेव को बताया कि गोदावरी नदी में डूबकी लगाकर वह ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्त हुआ। महादेव ने भी ऐसे ही ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति पायी।

चुंकि ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति पाने का तरीका उन्हें नंदी ने बताया, इसलिए महादेव ने इस स्थान पर नंदी को अपना गुरु माना। इसी कारण उन्होंने नंदी को इस मंदिर के सामने बैठने से मना किया। तभी से यह मंदिर स्थापित तो हुआ लेकिन मंदिर में नंदी की कोई मूर्ति स्थापित नहीं की गयी। कहा जाता है कि द्वादश ज्योतिर्लिंग के बाद इस मंदिर का ही सबसे ज्यादा महत्व है। मंदिर के सामने राम कुंड है। कहा जाता है कि इसी कुंड में भगवान राम ने अपने पिता दशरथ का श्राद्ध किया था। इस मंदिर परिसर में भगवान नारायण का मंदिर भी स्थापित है जहां साल में एक बार हरिहर महोत्सव मनाया जाता है।

FAQs
कपालेश्वर महादेव के मंदिर में नंदी की मूर्ति क्यों नहीं है?

ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्त होने का उपाय बताने के कारण नंदी को भगवान शिव ने अपना गुरु मान लिया था। इस वजह से ही इस मंदिर के बाहर उन्होंने नंदी को बैठने से मना कर दिया था।

नंदी के बिना कौन सा मंदिर है?

भगवान शिव का एकलौता मंदिर कपालेश्वर महादेव का मंदिर है जो नंदी के बिना है, वह महाराष्ट्र के नाशिक में स्थित है। इस मंदिर के बाहर नंदी की कोई मूर्ति नहीं है।

भगवान शिव ने किसे अपना गुरु माना था?

भगवान शिव ने अपने परमभक्त और वाहन नंदी को अपना गुरु माना था। नंदी महाराज ने एक बार भगवान शिव को ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्त होने का उपाय बतलाया था। इसलिए उन्होंने नंदी को अपना गुरु माना।

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