सावन का महीना भगवान महादेव को समर्पित होता है और इस साल तो सावन के दो महीने हैं। सावन में भगवान शिव के ज्योतिर्लिंगों समेत हर छोटे-बड़े मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। भगवान शिव के ज्योतिर्लिंगों के प्रति भक्तों की आस्था ही अलग होती है। भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग हैं, जिनमें त्र्यंबकेश्वर महादेव प्रमुख है।

महाराष्ट्र के नाशिक में स्थित त्र्यंबकेश्वर महादेव का मंदिर एक ज्योतिर्लिंग तो है लेकिन यह बाकी सभी ज्योतिर्लिंगों से कई कारणों से काफी अलग है। यहां भगवान शिव का सिर्फ एक लिंगस्वरूप नहीं बल्कि त्रिदेव की पूजा की जाती है।
कहां है त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग

त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र के नाशिक शहर से 28 किमी की दूरी पर स्थित है। यह मंदिर गोदावरी और गौतमी नदी के तट पर बना हुआ है, जहां हर 12 सालों में कुंभ का मेला लगता है। मंदिर के ठीक पीछे एक अमृत कुंड भी है। इस मंदिर की महिमा का बखान नाशिक के हर एक निवासी के मुख से सुना जा सकता है। मंदिर पूरी तरह से काले पत्थरों से निर्मित है। इस मंदिर का निर्माण करने में करीब 30 सालों का समय लग गया था। मंदिर साल के सभी दिन खुला रहता है लेकिन सावन और शिवरात्रि के समय इस मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है।
क्यों अलग है त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग

भगवान शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग काफी अलग है। इसकी कई खासियतें हैं। सबसे बड़ी खासियत है कि यहां सिर्फ भगवान शिव का ज्योतिर्लिंग ही नहीं बल्कि त्रिदेव की पूजा होती है। हर ज्योतिर्लिंग में महादेव के शिवलिंग की ही पूजा होती होती है लेकिन विश्व का एकमात्र ज्योलिर्लिंग त्र्यंबकेश्वर है, जहां तीनों देव ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र तीनों की पूजा है।

इसके अलावा त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग की एक खासियत यह भी है कि यहां कोई शिवलिंग नहीं बल्कि एक गड्ढा है, जिसमें तीन छोटे-छोटे अंगुठे के आकार के लिंग स्वरूप स्थापित हैं। भक्त इन्हीं लिंग स्वरुपों की पूजा ब्रह्मा, विष्णु और महेश के रूप में करते हैं। भोर के समय पूजा करने के बाद इनपर चांदी का पंचमुखी मुकुट चढ़ा दिया जाता है। मंदिर में खास तौर पर कालसर्प दोष की पूजा करवाने वाले भक्त काफी संख्या में पहुंचते हैं।
त्र्यंबकेश्वर मंदिर की वास्तुकला
त्र्यंबकेश्वर मंदिर की वास्तुकला मराठा शिल्पकला का शानदार उदाहरण है। मंदिर में भक्त विभिन्न प्रकार के अनुष्ठान व पूजा करवाकर त्रिदेवों को खुश करने का प्रयास करते हैं। संपूर्ण मंदिर का निर्माण का काले पत्थरों से की गयी है। बताया जाता है कि मुगल शासक औरंगजेब ने 1690 में नाशिक के त्र्यंबकेश्वर मंदिर के अंदर मौजूद शिवलिंग को तुड़वा दिया था। मंदिर को नुकसान पंहुचाने के अलावा मंदिर के ऊपर मस्जिद का गुंबद भी बना दिया था। इतना ही नहीं उसने नाशिक का नाम भी बदल दिया था लेकिन 1751 में मराठों का फिर से नाशिक पर कब्जा होने के बाद इस मंदिर का पुनर्निर्माण कराया गया।

मंदिर का पूणर्निर्माण तीसरे पेशवा नाना साहेब ने 1755 से 1786 ई. में करवाया था। यानी इस मंदिर के पूणर्निर्माण में करीब 30 सालों का समय लग गया है। कहा जाता है कि इस मंदिर के पूणर्निर्माण में पेशवा नाना साहेब ने 16 लाख रुपये का खर्च किया था। उस जमाने में 16 लाख रुपये एक बड़ी रकम मानी जाती थी। मंदिर के सर्वोच्य शिखर पर 5 स्वर्ण कलश और पंच धातु से बना हुआ केसरिया ध्वज स्थापित है।
त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग से जुड़ी पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के अनुसार त्र्यंबक ऋषि गौतम की तपोभूमि थी जो अपनी पत्नी अहिल्या के साथ वहां रहते थे। एक बार वहां रहने वाली दूसरे ऋषियों की पत्नियां किसी बात पर अहिल्या से नाराज हो गयी और ऋषि गौतम को अपमानित करने के लिए उन्होंने भगवान गणेश की आराधना की। उनकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर जब विघ्नहर्ता गणेश ने उन्हें दर्शन दिया तो ऋषियों ने गौतम ऋषि को वहां से निकाल देने के लिए कहा। जब लाख समझाने के बावजूद सभी ऋषि गणेश से यही वरदान मांगने पर अड़े रहे तो भगवान गणेश ने एक दुर्बल गाय का रूप लेकर गौतम ऋषि के खेत में चरने लगे।

जब गौतम ऋषि ने घास के कुछ तीनके लेकर गाय को भगाने का प्रयास किया तो तीनके के स्पर्श से गाय वहीं गिर पड़ी और मर गयी। गो हत्या के पाप से बचने के लिए गौतम ऋषि ने तब भगवान शिव की आराधना की। ऋषि गौतम ने भगवान शिव की आराधना के लिए त्र्यंबक में गंगा जल लेकर आए। उनकी पूजा से खुश होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिया और गो हत्या के पाप से मुक्त किया। ऋषि गौतम के अनुरोध पर भगवान शिव ने त्र्यंबक में ज्योतिर्लिंग के रूप में निवास करना स्वीकार किया। जब भगवान शिव यहां रहेंगे तो मैं भी यहीं रहूंगी। यह कहकर देवी गंगा वहां गोदावरी नदी के रूप में प्रवाहित हुई। इधर भगवान शिव के इस ज्योतिर्लिंग में भगवान विष्णु और ब्रह्मा भी रहने के लिए पहुंच गये।
कैसे पहुंचे त्र्यंबकेश्वर मंदिर
इस मंदिर से सबसे नजदीकी एयरपोर्ट मुंबई एयरपोर्ट है। वहीं सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन इगतपुरी रेलवे स्टेशन है। दोनों जगहों से आप बस या टैक्सी लेकर त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग पहुंच सकते हैं। मंदिर सुबह 5 बजे से रात को 8 बजे तक खुली रहती है। गर्भगृह में काफी नीचे त्रिदेव के लिंग स्वरूप स्थापित हैं, इसलिए भक्तों की सुविधा के लिए सामने ही आइना भी लगाया गया है। इसके साथ ही हर सोमवार की शाम को 4 से 5 बजे तक त्रिदेव के चारों ओर एक रत्न जड़ित मुकुट रखा जाता है, जिसमें हीरा, पन्ना व अन्य बेशकीमती रत्न लगे होते हैं।



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