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Navratri : भक्त के बुलाने पर कामाख्या से चलकर बिहार के थावे पहुंची थी भवानी, उमड़ता है भक्तों का हुजूम

किसी भी भक्त की दिल से निकली पुकार को भगवान कभी अनसुना नहीं करते हैं। ऐसी बातें हम अक्सर धार्मिक किताबों में पढ़ते हैं। लेकिन क्या आपको पता है बिहार में एक मंदिर ऐसा भी है जहां भक्त के बुलावे पर देवी मां कामाख्या से चलकर कई शहरों से होते हुए इस जगह पर पहुंची थी। इस मंदिर का महत्व किसी भी शक्तिपीठ से जरा भी कम नहीं है। सिर्फ स्थानीय लोग ही नहीं बल्कि नवरात्रि के समय मां भवानी के दर्शन करने दूर-दराज के राज्यों से भी लोग यहां पहुंचते हैं।

thawe bhawani temple

कहा जाता है कि इस मंदिर में देवी भवानी काफी जागृत हैं और उनसे मांगी गयी हर मनोकामना जरूर पूरी होती है। देशभर में 51 शक्तिपीठों के अलावा ऐसे कई मंदिर स्थापित हैं जहां देवी दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की पूजा की जाती है। बिहार में स्थित इस मंदिर की स्थापना की कहानी बड़ी ही दिलचस्प है। हम बात कर रहे हैं बिहार के गोपालगंज जिले में स्थित थावे भवानी मंदिर की।

लगभग 300 साल पहले स्थापित हुआ था मंदिर

goddess bhawani

माना जाता है कि थावे भवानी मंदिर की स्थापना लगभग 300 साल पहले की गयी थी। इस मंदिर में स्थापित देवी भवानी को काफी जागृत देवी के रूप में पूजा जाता है। साल के दोनों नवरात्रि के 9 दिनों में इस मंदिर प्रांगण में भक्तों का हुजूम उमड़ता है। मंदिर में सिर्फ बिहार और आसपास के लोग ही नहीं बल्कि सीमावर्ती नेपाल और उत्तर प्रदेश से भी काफी संख्या में भक्त खासतौर पर नवरात्रि के समय आते हैं। यह स्थान हथुआराज के अधिकारक्षेत्र में आता था। इसलिए वर्तमान समय में इस मंदिर की देखरेख हथुआ राजपरिवार द्वारा ही किया जाता है।

भक्त की पुकार पर आयी भवानी

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इस मंदिर में स्थापित देवी भवानी स्वयं प्रकट नहीं हुई थी, बल्कि एक भक्त की पुकार पर वह कामरुप कामाख्या से चलकर कई शहरों से होते हुए थावे तक पहुंची थी। इस मंदिर का इतिहास देवी दुर्गा के 2 भक्तों रहषू भगत और चेरो वंश के राजा मनन सिंह से जुड़ा हुआ है।

goddess bhawani

लोककथा के मुताबिक मनन सिंह देवी दुर्गा का परम भक्त था और अपनी भक्ति पर उसे काफी घमंड भी था। वह समझता था कि उससे बड़ा देवी दुर्गा का कोई और भक्त ही नहीं है। इसके साथ ही वह एक क्रुर राजा भी था, जो हथुआ राजपरिवार से जुड़ा था। दूसरी तरफ रहषु भगत असम की देवी कामाख्या का परम भक्त था।

राजा ने परम भक्त को ढोंगी बताया

लोककथा के अनुसार एक बार राज्य में अकाल पड़ गया। लोग दाने-दाने को तरसने लगे। वहीं दूसरी तरफ रहषु भगत पर मां भवानी की कृपा बरसने लगी। हर रोज रात के समय रहषु भगत घास काटता था और अगले दिन सुबह वह घास अन्न में बदल जाती। इस तरह रहषु गांववालों की भूख का समाधान भी करने लगा। इस बात की जानकारी जब राजा मनन सिंह को हुई तो उसने रहषु भगत को ढोंगी करार दिया।

rahasu bhagat

राजा ने उससे मां को बुलाने के लिए कहा और ऐसा ना करने पर सजा देने की धमकी भी दी। रहषु ने कई बार राजा को मनाने का प्रयास किया और कहा कि अगर देवी मां यहां आयी तो राज्य पूरी तरह से बर्बाद हो जाएगा। लेकिन अपने घमंड में चुर राजा नहीं माना।

भक्त की पुकार पर कामाख्या से चल पड़ी भवानी

कहानी के अनुसार आखिरकार हारकर रहषु भगत ने कामाख्य देवी को पुकारा। भक्त की पुकार पर कामाख्या से देवी भवानी चल पड़ी और रास्ते में वह कई शहरों में रूकी। कहा जाता है कि कोलकाता में जब देवी पहुंची तो वहां वह दक्षिणेश्वर काली के रूप में स्थापित हुई। इसके बाद वह पटना पहुंची जहां वह पटन देवी के नाम से स्थापित हुई और आखिरकार वह छपरा में अमी देवी के नाम से स्थापित हुई। देवी जब भी किसी शहर को पार करती रहषु भगत राजा को चेतावनी देता और उनसे रुक जाने का अनुरोध करता।

thawe mandir

आखिरकार जब देवी थावे पहुंची तो वह रहषु भगत का सिर फाड़कर बाहर निकलने लगी। इस दौरान चुड़ियों से भरा सिर्फ उनका हाथ ही रहषु के सिर से बाहर आया था और देवी के दर्शन पाकर राजा मनन सिंह की भी मौत हो गयी। थावे भवानी मंदिर परिसर में ही रहषु भगत का भी मंदिर है, जिसमें स्थापित रहषु की मूर्ति में सिर फाड़कर बाहर निकला देवी का चुड़ियों वाला हाथ दिखाई देता है। कहा जाता है कि थावे भवानी का दर्शन तब तक अधुरा है, तब तक रहषु भगत के मंदिर में दर्शन ना कर लिया जाए।

दुर्गाष्टमी को चढ़ती है बलि

नवरात्रि के समय थावे भवानी मंदिर की छटा देखते ही बनती है। मंदिर को रंग-बिरंगी लाइट्स से बेहद शानदार तरीके से सजाया जाता है। मंदिर में देवी मां को चुनरी चढ़ाने का विशेष रिवाज है। इसके साथ ही खासतौर पर थावे के फेमस पेड़ा चढ़ाए जाते हैं। नवरात्रि में सप्तमी के दिन इस मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन किया जाता है और अष्टमी के दिन बलि चढ़ायी जाती है।

स्थानीय लोगों के अनुसार इस मंदिर में महंगी वस्तुएं चढ़ाने की जरूरत नहीं होती है। थावे भवानी इतनी दयालु हैं कि दिल की गयी हर प्रार्थना पर वह उस इंसान को हर वो चीज प्रदान करती हैं जिसका वह हकदार होता है। मंदिर में स्थापित देवी को थावेवाली, सिंहवासिनी भवानी, रहषु भवानी के नाम से भी पुकारा जाता है। मंदिर के आसपास जंगल फैला हुआ है, जिसके साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की जाती है।

कैसे पहुंचे थावे मंदिर

थावे बिहार के गोपालगंज जिले में स्थित है। यह मंदिर जिला मुख्यालय से महज 6 किमी दूर गोपालगंज-सिवान राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित है। मंदिर तक पहुंचने के लिए सिवान और गोपालगंज दोनों जगहों से ऑटो और बस की सेवा उपलब्ध है। मंदिर से सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन थावे जंक्शन है, जो सिवान-गोरखपुर रूट पर स्थित है। जंक्शन के पास स्थित देवी हॉल्ट स्टेशन मंदिर से काफी नजदीक है, जहां इस रूट पर चलने वाली सभी पैसेंजर ट्रेनें रुकती हैं। स्टेशन से मंदिर परिसर तक के लिए ऑटो, ई-रिक्शा या रिक्शा आसानी से उपलब्ध है।

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