रथ यात्रा पर पुरी जाने का टिकट नहीं मिल पाया है या होटलों की बुकिंग फुल हो जाने की वजह से आप पुरी नहीं जा सकें हैं? इसके लिए निराश होने की कोई जरूरत नहीं है। आप सीधे कोलकाता पहुंच जाइए और कोलकाता में भी पुरी के रथ यात्रा जैसे ही उत्सव का माहौल मिलेगा।

खास बात यह है कि कोलकाता में आपको किसी बड़े रथ यात्रा में शामिल होने की जरूर भी नहीं है। यहां के हर गली मुहल्ले में आपको हर बच्चा दो से तीन मंजील रथ खींचता दिख जाएगा। इसके अलावा कोलकाता में रथ यात्रा के दिन कई खास लेकिन स्वादिष्ट परंपराओं का भी पालन किया जाता है, जिन्हें सुनकर आप खुद को रोक ही नहीं सकेंगे।
आइए आपको कोलकाता की रथ यात्रा के बारे में खास बातें बताते हैं :
इस्कॉन रथ यात्रा
कोलकाता में सबसे भव्य और धुमधाम से रथ यात्रा इस्कॉन की तरफ से निकाली जाती है। इस रथ यात्रा में हर साल पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी शामिल होती हैं। जानकारों की मानें तो साल 1972 में पहली बार पुरी के तर्ज पर इस्कॉन ने कोलकाता में रथ यात्रा का आयोजन किया था।

इसके बाद से हर साल इस्कॉन की तरफ से विशाल रथों पर भगवान जगन्नाथ, बहन सुभद्रा और दाऊ बलराम की सवारी निकाली जाती है। मंदिर परिसर से बाहर निकलकर कोलकाता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड तक पहुंचने तक रास्ते भर भक्त रथ के साथ नाचते-गाते और भगवान के प्रति अपनी आस्था प्रकट करते हुए साथ-साथ ही चलते हैं।
उपनगरीय क्षेत्रों में भी निकलती है भव्य रथ यात्रा
रथ यात्रा का भव्य आयोजन सिर्फ कोलकाता ही नहीं, बल्कि उपनगरीय इलाकों में भी बड़े ही धुमधाम से रथ यात्रा का आयोजन किया जाता है। इसमें सबसे पहला नाम माहेश रथ यात्रा का आता है। ओडिशा के पुरी के बाद यह भारत का दूसरा और पश्चिम बंगाल में सबसे पुरानी रथ यात्रा है हुगली जिले का माहेश रथ यात्रा। बताया जाता है कि यह रथ यात्रा 600 सालों से भी ज्यादा पुरानी है।

इस रथ यात्रा की सबसे बड़ी खासियत है कि यहां लकड़ी नहीं बल्कि लोहे के रथ पर भगवान जगन्नाथ की सवारी निकलती है। दरअसल, विभिन्न समय कई भक्तों ने विशालाकार रथ यहां दान में दिये थे, लेकिन कई बार लकड़ी का रथ जल जाने और एक बार रथ के अंदर एक व्यक्ति के आत्महत्या कर लेने की वजह से ही 1885 में 2 लाख रुपये की लागत से लोहे का रथ बनवाया गया। इस रथ की ऊंचाई करीब 50 फीट और वजन 125 टन है।
हर बच्चा खींचता है रथ
रथ यात्रा के दिन शाम के समय कोलकाता की गलियों में हर बच्चा आपको रथ खींचता नजर आएगा। रथ यात्रा से कुछ दिन पहले से ही बाजारों में दो और तीन मंजील रथ बिकने शुरू हो जाते हैं। लेकिन घबराईए मत, ये सभी रथ 40-50 फीट नहीं बल्कि छोटे-छोटे रथ होते हैं, जिनकी ऊंचाई 1-1.5 फीट ही होती है।

बच्चे इन छोटे-छोटे रथों को फुलों और रंगीन कागजों से सजाकर इसमें जगन्नाथ देव, सुभद्रा और बलराम को बैठाकर, उनको मिठाई का भोग चढ़ाकर सड़कों पर निकलते हैं। इस दौरान हर आने-जाने वाले राहगीरों से बच्चे भगवान के चढ़ावे में कुछ रुपये वसूलते हैं जिनसे बाद में बाजार से मिठाई खरीदकर अपनी पार्टी मनाते हैं। राहगीर भी इन नन्हें भक्तों को निराश नहीं करते और अपनी खुशी से 1-2 या 5-10 रुपये चढ़ावा जरूर देते हैं।
जलेबी, मालपुआ और पापड़ Must

अब आता है रथ यात्रा का सबसे खास और स्वादिष्ट हिस्सा। रथ यात्रा के दिन पूरे शहर में जगह-जगह मेले लगते हैं। हर मेले में आपको तीन चीजें जरूर बिकती नजर आएंगी और वह है जलेबी, तला हुआ पापड़ और मालपुआ। जी हां, कहा जाता है कि किसी भी भगवान की पूजा में जहां भक्तों को उपवास रखकर उनकी पूजा करनी पड़ती है वहीं भगवान जगन्नाथ इतने दयालु हैं कि वह अपने भक्तों को बिल्कुल भुखा नहीं रखते हैं। रथ यात्रा के दिन भगवान जगन्नाथ को मालपुआ का भोग चढ़ाने का रिवाज है। वहीं कोलकाता में लोग तला हुआ पापड़ और जलेबी खाकर इस दिन का जश्न मनाते हैं।
तो इस बार अगर भीड़, टिकट ना मिलने, होटल फुल हो जाने या किसी वजह से आप पुरी नहीं जा सकें तो रथ यात्रा पर कोलकाता जरूर आएं। हम दावे के साथ कह सकते हैं कि कोलकाता की रथ यात्रा आपको बिल्कुल निराश नहीं करेगी।



Click it and Unblock the Notifications












