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जानिए शिव के पांच सबसे प्रमुख धाम 'पंच केदार' का रहस्य

देवभूमि के नाम से प्रसिद्ध उत्तराखंड अपने धार्मिक स्थलों के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। यह देशवासियों के आस्था का सबसे बड़ा केंद्र है। अधिकतर इसे चार धाम (गंगोत्री, यमुनोत्री, बद्रीनाथ व केदारनाथ) के लिए जानते हैं। लेकिन यहां सैकड़ों ऐसे मंदिर हैं, जिनकी महिमा पूरी विश्व भर में फैली है और यहां दूर-दूर से लोग दर्शन करने के लिए आते हैं।

उत्तराखंड के सबसे प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों की बात की जाए तो शायद केदारनाथ धाम का नाम सबसे पहले आता है, लेकिन क्या आपको पता है कि देवभूमि में एक नहीं बल्कि पांच केदारनाथ धाम है। अगर आप इस बारे में नहीं जानते हैं तो इस लेख के जरिए जान लीजिए और जान लीजिए इन मंदिरों की पौराणिक कहानियां..। इन पांचों को मंदिरों को पंच केदार के नाम से जाना जाता है और इन सभी मंदिरों का निर्माण पांडवों द्वारा किया गया है। तो आइए जानते हैं कि आखिर इन पंच केदारों में कौन-कौन से मंदिर आते हैं...

1. केदारनाथ मंदिर - Kedarnath Temple

इस मंदिर के बारे में देश-दुनिया का हर व्यक्ति जानता होगा। चार धामों में से एक भगवान शिव का सबसे पवित्र धाम माना जाता है केदारनाथ धाम..। हिमालय की गोद में बसा बाबा केदार का यह मंदिर रुद्रप्रयाग जिले में स्थित है, जो भोलेनाथ के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह मंदिर साल 6 महीने ही खुला रहता है और बाकी समय यह बर्फ की चादरें ओढ़ लेता है।

kedarnath temple

पौराणिक किवदंतियों के अनुसार इस मंदिर का निर्माण कुरू वंश के राजा जनमेजय ने करवाया था। कहा जाता है कि मंदिर में विराजित शिवलिंग स्वयं प्रकट हुआ है। जून 2013 में आई आपदा के बाद से इस मंदिर को देश-दुनिया में एक नई पहचान मिली। आपदा के दौरान मंदिर को एक खरोच तक नहीं आई थी, जबकि आसपास काफी तवाही का मंजर देखने को मिला था।

2. मध्यमहेश्वर मंदिर - Madhyamaheshwar Temple

पंच केदारों में दूसरे नंबर पर मध्यमहेश्वर मंदिर का नाम आता है। इस मंदिर को मदनमहेश्वर के नाम से भी जाना जाता है। कहा जाता है कि इस स्थान पर भगवान शिव की नाभि (शिवलिंग के रूप में) स्थित है। पौराणिक किवदंतियों की मानें तो इसी पवित्र स्थान पर बाबा भोलेनाथ ने अपनी सुहागरात मनाई थी।

मंदिर की मान्यताओं के मुताबिक, यहां स्थित नारद कुंड के जल स्पर्श से ही श्रद्धालुओं को मोक्ष की प्राप्ति होती है। कहा जाता है कि स्वर्ग यात्रा के दौरान पांडवों ने ही इस मंदिर का निर्माण किया था। मंदिर शीतकाल के पहले यहां डोली यात्रा निकलती है, इसे एक उत्सव के रूप में मनाया जाता है।

3. तुंगनाथ मंदिर - Tungnath Temple

तुंगनाथ मंदिर, रुद्रप्रयाग जिले में ही स्थित है और इसे विश्व का सबसे ऊंचा शिव मंदिर माना जाता है। मंदिर में भगवान शिव की भुजा एक शिला के रूप में विद्यमान है। पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह इसी पवित्र स्थान पर हुआ था, जहां आज भी वह पौराणिक हवन कुंड जलता रहता है।

tungnath temple

तुंगनाथ पर्वत पर स्थित इस मंदिर का निर्माण पांडवों ने करवाया था, जब भोलेनाथ कुरुक्षेत्र में हुए नरसंहार के कारण उनसे रुष्ठ हो गए थे। यहां विवाह करने वाली जोड़ियों का जीवन काफी सुखद होता है। गढ़वाली महिलाएं यहां सिंदूर चढ़ाकर अपनी मांग सजाती है। यह मंदिर साल के 5-6 महीने ही खुला रहता है और बाकी समय भारी बर्फबारी के चलते बंद रखा जाता है।

4. रुद्रनाथ मंदिर - Rudranath Temple

देवभूमि के चमोली जिले में स्थित रुद्रनाथ मंदिर भी पंच केदारों में से एक है। यह मंदिर दिखने में काफी छोटा है। लेकिन इस मंदिर में मान्यता व महिमा पूरे विश्वभर में फैली है। कहा जाता है कि इस मंदिर में भगवान शिव का सिर्फ मुख है और और बाकी का शरीर नेपाल के काठमांडू में स्थित पशुपतिनाथ मंदिर में विद्यमान है।

रुद्रनाथ तक पहुंचने के भक्तों को काफी खड़ी चढ़ाई चढ़नी पड़ती है। यहां पहुंचने का सबसे सही समय गर्मी में है। क्योंकि ऊंचाई पर स्थित होने के चलते सर्दी के मौसम में यहां काफी बर्फबारी होती है। इस मंदिर के दूसरी ओर पांडवों सहित माता कुंती व द्रौपदी के मंदिर है। इसके अलावा, यहां से दिखाई देती हुई नन्दा देवी और त्रिशूल पीक की चोटियां सारी थकान मिटा देती हैं।

5. कल्पेश्वर मंदिर - Kalpeshwar Temple

कल्पेश्वर मंदिर, चमोली में स्थित है, जिसका निर्माण महाभारत काल में पांडवों द्वारा गोत्र हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए किया गया था। इस मंदिर में भगवान शिव के जटाओं की पूजा की जाती है। कल्पेश्वर महादेव को अंतिम पंच केदार माना जाता है। मान्यता है कि महान ऋषि दुर्वासा ने इसी जगह पर कल्प वृक्ष के नीचे बैठकर लंबे समय कठोर तपस्या की थी। इसीलिए इस पवित्र स्थान को कल्पेश्वर के नाम से जाना जाता है।

कल्पेश्वर महादेव का मंदिर, पंच केदारों में एकलौता ऐसा मंदिर है, जो पूरे साल भक्तों के लिए खुला रहता है। जबकि बाकी के चारों केदार धाम के कपाट सर्दी के मौसम में बंद कर दिए जाते हैं। कहा जाता है कि इस मंदिर में विराजित शिवलिंग स्वयंभू है। मंदिर के पास में एक कुंड है, जिसे कलेवर कुंड के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि इस कुंड का पानी पीने से कई बीमारियों से मुक्ति मिल जाती है।

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