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क्या है हावड़ा के रामराजातल्ला का इतिहास? मां काली और दुर्गा के शहर में कैसे शुरू हुई श्रीराम की पूजा

क्या आप बता सकते हैं, भगवान राम और कृष्ण की भक्ति और उनका नाम जपने का सबसे प्रसिद्ध मंत्र 'हरे राम हरे कृष्ण' की शुरुआत कहां हुई थी? इसकी शुरुआत बंगाल में हुई थी। 15वीं शताब्दी में बंगाल के संत चैतन्य महाप्रभु ने सबसे पहले इस नाम का जाप शुरू किया था।

ram mandir latest photo

आज हम आपको बंगाल के ही सबसे व्यस्त शहरों में से एक हावड़ा में मौजूद रामराजातल्ला मंदिर के बारे में बता रहे हैं। इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत है कि यहां आज भी लगातार 3 महीने तक भगवान राम की भव्य पूजा का आयोजन होता है। लेकिन इस पूजा के साथ यहां पहले से होने वाली सरस्वती पूजा के गंभीर ठकराव का इतिहास भी रहा है।

हावड़ा का रामराजातल्ला एक ऐसा क्षेत्र है जो यहां स्थापित भगवान राम के मंदिर की वजह से पहचाना जाता है। इतिहासकारों का कहना है कि पहले इस जगह का नाम सांतरागाछी हुआ करता था, लेकिन यहां भगवान राम का मंदिर स्थापित होने के बाद इस जगह को रामराजातल्ला के नाम से ही पहचान मिली। लेकिन...

यह सोचकर आश्चर्य होता है न...कि वह भूमि जहां शक्ति की आराधना होती है, धुमधाम से दुर्गा पूजा से लेकर काली पूजा तक का आयोजन होता है, वहां भगवान राम को इतनी अधिक प्रधानता कैसे मिली? दरअसल, हावड़ा में भगवान राम की पूजा सबसे पहले अयोध्याराम चौधरी ने शुरू की थी।

कहा जाता है कि करीब 3 सदी पहले हावड़ा निवासी अयोध्याराम चौधरी को सपने में भगवान का आदेश मिला, जिसके बाद उन्होंने यहां भगवान राम के भव्य मंदिर का निर्माण किया। मंदिर में भगवान राम और माता सीता के अलावा श्रीकृष्ण और महादेव की मूर्ति भी स्थापित की गयी। धीरे-धीरे जमींदार अयोध्याराम चौधरी की सार्वजनिक पूजा की प्रसिद्धि इलाके में फैलने लगी और लोगों की आस्था भगवान राम में बढ़ने लगी।

इतिहासकारों का मानना है कि 'अयोध्याराम' ऐसा नाम है, जो आमतौर पर बंगाली परिवारों में सुनने को नहीं मिलता है। यह नाम उत्तर प्रदेश या फिर बिहार जैसे उत्तर भारतीय राज्यों में ही सुनने को मिलता है। इसलिए संभव है कि अयोध्याराम चौधरी किसी उत्तर भारतीय राज्य से आकर बंगाल में बस गये हो और कालांतर में उन्होंने बंगाली संस्कृति को अपना लिया हो।

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार हावड़ा के इस इलाके में भगवान राम ने 3 महीनों का लंबा समय व्यतित किया था। चैत्र से लेकर श्रावण तक का समय भगवान राम ने यहां बिताया था, इसलिए इस समय यहां भगवान राम की पूजा आयोजित की जाती है। 3 महीनों के दौरान यहां बड़ा मेला लगता है जिसमें सिर्फ रामराजातला ही नहीं बल्कि आसपास के उपनगरीय क्षेत्रों में रहने वाले लोग भी शामिल होते हैं।

इस समय भगवान राम की भव्य मूर्ति बनाकर पूजा की जाती है, मगर गौर से देखने पर कुछ अजीब आपको यहां दिखेगा। इस पूजा में एक ही मंच पर सभी देवी-देवताओं को अलग-अलग स्तरों पर रखकर पूजा की जाती है और ठीक बीच में भगवान राम और माता सीता की मूर्ति विराजमान होती है। लेकिन...भगवान राम से भी ऊपर यहां माता सरस्वती की मूर्ति को रखा जाता है...पर क्यों?

ramrajatalla temple puja

जब सरस्वती पूजा के साथ शुरू हुआ विवाद

हावड़ा में भगवान राम की पूजा की प्रसिद्धि बढ़ने लगी तो उस इलाके में पहले से होने वाली सरस्वती पूजा के आयोजकों के मन में इसे लेकर नाराजगी बढ़ने लगी। भगवान राम के श्रद्धालुओं और सरस्वती पूजा आयोजकों के बीच जब विवाद बढ़ गया तो इलाके के बुजूर्ग दोनों पक्षों में बीच-बचाव करने आगे आए। बैठक हुई और यह तय किया गया कि भगवान राम की पूजा को पूरी मान्यता दी जाएगी

लेकिन सभी मूर्तियों से ऊपर विद्या की देवी सरस्वती की मूर्ति रहेगी। इतना ही नहीं कहा जाता है कि इस बैठक में यह भी निर्णय लिया गया कि हर साल भगवान राम की पूजा राम-नवमी से शुरू होगी किन्तु मूर्ति बनाने का काम वसंत पंचमी के दिन से शुरू होगा। पहले यह मेला सिर्फ 3 दिनों तक चलता था लेकिन अब धीरे-धीरे मेले की अवधि बढ़कर 3 महीने हो गयी है। यह राज्य का सबसे लंबा चलने वाला मेला होता है। श्रावण के महीने की आखिरी रविवार को मेला खत्म होता है, जिस दिन विसर्जन समारोह आयोजित किया जाता है।

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