कहा जाता है कि पौराणिक ज्ञान लेना हो तो भारत घूमें, इस बात को कहीं से काटा नहीं जा सकता। समय-समय इसके प्रमाण भी मिलते रहते हैं। आज इस लेख में हम आपको उस पवित्र स्थान के बारे में बताएंगे, जो भगवान परशुराम से जुड़ा हुआ है। इस धार्मिक स्थान पर आपको वो देखने को मिलेगा, जिसकी आपने कभी कल्पना तक नहीं की होगी।
जी हां, आप सभी जानते होंगे कि भगवान परशुराम ने अपने फरसे से तीन बार पृथ्वी लोक से क्षत्रियों का नाश कर दिया था लेकिन क्या आपको पता है कि आखिर उनका वो शक्तिशाली व अद्वितीय फरसा कहां है? अगर आपको इसके बारे में पता चले तो आप क्या करेंगे? जाहिर है आप उसे देखने की इच्छा रखेंगे, ऐसे में हम आपको आज उसी पवित्र स्थान के बारे में बताएंगे, जहां आप साक्षात परशुराम के फरसे का दर्शन कर पाएंगे।

भगवान परशुराम का फरसा
ये पवित्र स्थान झारखंड के गुमला के डुमरी नामक स्थान पर स्थित है। इस स्थान का नाम टांगीनाथ धाम है, जो भगवान शिव के लिए काफी विशेष माना जाता है। यहां एक फरसा आपको देखने को मिल जाएगा, जिसको लेकर लोग बताते हैं कि यह भगवान परशुराम का फरसा है, जिस पर आजतक जंग नहीं लग पाया है। श्रद्धालुओं द्वारा इसकी पूजा भी की जाती है।
परशुराम एक कुशल योद्धा माने जाते हैं, जिन्हें भगवान शिव द्वारा देवताओं के सभी शत्रुओं से लड़ने सक्षमता का वरदान प्राप्त था। उनके फरसे का आकार बेहद भयानक था, जिसे देखने पर शायद आपकी रूह तक कांप जाए। आज इसी फरसे की खूब पूजा की जाती है। इसके अलावा यहां परशुराम के पदचिन्ह के दर्शन किए जा सकते हैं।
टांगीनाथ धाम का नाम कैसे पड़ा?
दरअसल, झारखंड की नागपुरिया भाषा में फरसे को टांगी कहा जाता है। इसीलिए इस स्थान को टांगीनाथ धाम कहा जाता है। यहां भगवान शिव का एक मंदिर है। इसके अलावा यहां छोटे-छोटे कई और मंदिर भी विद्यमान है। परशुराम के फरसे को लेकर कहा जाता है कि यह जमीन के कितना अंदर तक धंसा है, इसके बारे में कोई सटिक जानकारी नहीं है। लेकिन लोग अनुमान लगाते हैं कि यह करीब 17 फीट जमीन के अंदर धंसा है।

टांगीनाथ धाम को लेकर पौराणिक कथा
सीता-राम विवाह के दौरान जब भगवान राम ने शिवजी का पिनाक धनुष तोड़ दिया था, तब परशुराम अत्यंत क्रोधित हुए और भगवान राम से युद्ध करने चले गए लेकिन जब उन्हें ज्ञात हुआ कि भगवान राम उनकी ही तरह विष्णु जी के अवतार हैं तो वे पश्चताप करने के लिए लुचुतपाट पर्वत के घने वन में तपस्या करने के लिए चले गए, वहां उन्होंने एक शिवलिंग की स्थापना की और अपना फरसा गाड़कर 1000 वर्षों तक घोर तपस्या की। आज इसी स्थान को टांगीनाथ धाम के नाम से जाना जाता है।
टांगीनाथ धाम में महाशिवरात्रि पर मेले का आयोजन
टांगीनाथ धाम में भगवान शिव का भी निवास स्थान है, इसीलिए यहां हर साल शिवरात्रि के दिन एक विशाल मेले (3 दिवसीय) का आयोजन भी किया जाता है। इस दिन भक्तों की भारी भीड़ देखी जा सकती है। इस ऐतिहासिक मंदिर में स्थानीय आदिवासी जनजाति बैगा और पाहन पुजारी का पद संभालते हैं।
टांगीनाथ धाम कहां है व कैसे पहुंचें?
टांगीनाथ धाम, रांची से करीब 150 किमी दूर गुमला जिले के डुमरी प्रखंड (गुमला से 75 किमी. दूर) से करीब 8 किमी. दूर लुचुतपाट की पहाड़ियों में बसा है। यहां का नजदीकी रेलवे स्टेशन या एयरपोर्ट रांची



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