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उत्तराखंड का 'फूलों की घाटी' : प्रकृति की गोद में ट्रैकिंग का लुत्फ उठाने की आदर्श जगह

उत्तराखंड का फूलों की घाटी एक लोकप्रिय टूरिस्ट डेस्टिनेशन है, जहां हर साल हजारों की संख्या में लोग घूमने आते हैं। मानसून के आगमन के बाद ही इसे पर्यटकों के लिए खोल दिया जाता है जो अगले कुछ महीनों तक खुला रहता है। जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है कि उत्तराखंड की इस घाटी में अलग-अलग और कई प्रजातियों के रंग-बिरंगे फूल खिलते हैं।

फूलों के चादर से ढंकी यह घाटी किसी का भी मन मोह लेने की क्षमता रखता है। इस घाटी में आप करीब 500 से भी अधिक प्रजातियों के रंग-बिरंगे फूल देख सकेंगे जो आपने समतल या मैदानी इलाकों में कभी नहीं देखा होगा।

पौराणिक मान्यताएं

देवभूमि उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र के चमोली जिले में फूलों की घाटी मौजूद है। यह घाटी लगभग 87.50 वर्ग किमी के क्षेत्र में फैला हुआ है। फूलों की घाटी की पौराणिक मान्यताएं भी हैं। स्थानीय लोग फूलों की घाटी में परियों का निवास मानते हैं। इस वजह से ही यहां लंबे समय तक लोग आने से कतराते थे। वहीं स्थानीय मान्यताओं में कहा जाता है कि भगवान हनुमान संजीवनी बुटी की खोज करते हुए यहां आ चुके हैं।

मान्यताओं के अनुसार इस घाटी का उल्लेख स्कंद पुराण में मिलता है, जिसमें इस नंदनकानन कहा जाता है। कालिदास ने भी अपनी पुस्तक मेघदुतम् में फूलों की घाटी को अल्का कहा था। यह घाटी नर और गंघमाधन पर्वत के ठीक बीच में मौजूद है।

बता दें, वर्ष 1931 में ब्रिटिश पर्वतारोही फ्रैंक स्मिथ ने सबसे पहले फूलों की घाटी की खोज की थी। फ्रैंक और उनके साथी होल्डसवर्थ द्वारा इस घाटी की खोज के बाद ही यह एक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल बन गया था। इस घाटी का उल्लेख फ्रैंक ने अपनी पुस्तक 'वैली ऑफ फ्लावर्स' में भी किया है।

phoolo ki ghati

पायी जाती हैं दुर्लभ वनस्पतियां

उत्तराखंड का फूलों की घाटी है विश्व धरोहर स्थल। यह नंदादेवी बायोस्पेयर रिजर्व का हिस्सा है। इस घाटी को अगर जैव विविधता का खजाना कहा जाए तो ऐसा कहना गलत नहीं होगा। यहां जितनी रंगों और तादाद में फूल खिलते हैं, उतनी ही संख्या में यहां फूलों पर मंडराती तितलियां भी दिखाई देंगी। इसके साथ ही आपको इस घाटी में कई तरह के जानवर जैसे कस्तूरी मृग, हिम तेंदुए, हिमालयी भालू आदि भी रहते हैं। अगर आपकी किस्मत अच्छी हुई तो इनमें से कुछ जानवर आपको इस घाटी में दिखाई भी देंगे।

कब से कब तक जाएं

इस साल 1 जून से फूलों की घाटी को पर्यटकों के लिए खोल दिया गया है। 30 अक्तूबर 2024 को फूलों की घाटी को बंद कर दिया जाएगा। लेकिन यहां घूमने जाने का बेस्ट समय अगस्त-सितंबर को ही माना जाता है, क्योंकि मानसून के तुरंत बाद यहां बड़ी संख्या में फूल खिले मिलते हैं। इस घाटी में घूमने के लिए न सिर्फ देश बल्कि विदेशों से भी पर्यटक आते रहते हैं। इस समय फूलों की घाटी में ब्रह्म कमल भी खिलते हैं, जिनको देखना अपने आप में एक अलग ही सुकून देता है।

कैसे जाएं और कहां करें कैम्पिंग?

फूलों की घाटी जाने का रास्ता चमोली का गोविंदघाट होता है। यहां से पैदल ट्रैकिंग शुरू हो जाती है। पैदल ट्रैकिंग करते हुए घांघरिया जाना होता है जहां घाटी में जाने का पास बनवाना होता है। इसके बाद घांघरिया से फिर फूलों की घाटी तक जाने की ट्रैकिंग शुरू होती है।

अगर आप फ्लाइट से जा रहे हैं तो नजदीकी एयरपोर्ट देहरादून है। देहरादून से गोविंदघाट के लिए टैक्सी मिल जाएगी। वहीं अगर आप ट्रेन से जाने का प्लान बना रहे हैं तो नजदीकी रेलवे स्टेशन ऋषिकेश है। ऋषिकेश से लगभग 250 किमी का रास्ता तय कर गोविंदघाट पहुंचना होगा। जोशीमठ से गोविंदघाट की दूरी 10 किमी है।

फूलों की घाटी जाने के लिए लगभग 19 किमी की ट्रैकिंग करनी होती है, जिसके लिए पास बनवाना अनिवार्य होता है। चुंकि फूलों की घाटी में कैंपिंग की अनुमति नहीं है, इसलिए रुकने के लिए आपको घांघरिया ही आना होगा। यहां पर्यटकों के ठहरने की समुचित व्यवस्था है।

ट्रेकिंग के लिए कितना है शुल्क?

  • देशी नागरिक - ₹200
  • विदेशी नागरिक - ₹800

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