अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा का अनुष्ठान शुरू हो चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यजमानी में राम मंदिर में यह भव्य अनुष्ठान आयोजित हो रहा है जिसमें देश-विदेश से आए सैंकड़ों वीआईपी मेहमान शामिल होने वाले हैं। मंदिर के भूतल में रामलला की मनमोहक प्रतिमा में प्राण प्रतिष्ठा के बाद प्रथम तल में राम दरबार बनाने की तैयारियां तेज हो जाएंगी।

यहां भगवान राम के साथ माता सीता, लक्ष्मण समेत रामभक्त हनुमान की मूर्ति भी स्थापित होगी। अयोध्या से करीब 750 किमी दूर उत्तराखंड के चांई में वेदवती माता के मंदिर में 21 जनवरी से ही अखंड रामायण का पाठ शुरू कर दिया गया है। यह वहीं मंदिर है, जहां से दशानन रावण के वध की लीला शुरू हुई थी। इतना ही नहीं, इस जगह को माता सीता के पूर्वजन्म से जोड़कर भी देखा जाता है। कहा जाता है कि इस मंदिर में जो भी भक्त सच्चे दिल से कोई भी मन्नत मांगता है, उसकी सारी इच्छाएं वेदवती माता जरूर पूरा करती हैं।
आइए माता सीता के पूर्वजन्म से जुड़े इस पवित्र मंदिर के बारे में जानते हैं -
माता सीता का है मंदिर
उत्तराखंड के जोशीमठ जिले के चांई में माता सीता का एक पुराना मंदिर स्थित है। इस मंदिर में माता सीता की पूजा वेदवती कन्या के रूप में होती है। मान्यताओं के अनुसार माता सीता पूर्वजन्म में वेदवती कन्या थी। इस मंदिर में किसी मूर्ति नहीं बल्कि एक सफेद शीला का रूप में वेदवती कन्या की पूजा होती है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार वेदवती लक्ष्मी की ही अवतार थीं।
उनका जन्म कुशध्वज और मालावती के घर हुआ था। संयोग से माता सीता के चाचा का नाम भी कुशध्वज ही था। कहा जाता है कि जन्म के कुछ समय बाद ही वेदवती को चारों वेदों का ज्ञान प्राप्त हो गया था। इसलिए उनका नाम वेदवती रखा गया।

रावण ने करना चाहा था अपहरण
मान्यताओं के अनुसार वेदवती भगवान विष्णु से बेहद प्रेम करती थीं और उनसे विवाह करना चाहती थी। इसके लिए वह हिमालय पर तपस्या करने चली गयीं। एक बार भगवान शिव के परम भक्त दशानन रावण कैलाश जाने के क्रम में उसी तरफ से गुजरा, जहां वेदवती तपस्या में लीन थीं। वेदवती के रूप पर मोहित होकर उसने उनका अपहरण करना चाहा और उन्हें जबरदस्ती अपने साथ लंका ले जाने का प्रयास करने लगा।
अपनी पवित्रता को भंग करने की कोशिश करते रावण पर उन्हें बहुत क्रोध आया। उन्होंने रावण को श्राप दिया कि उसकी मृत्यु का वहीं कारण बनेंगी। इसके बाद खुद को बचाने के लिए वह अपनी तपस्या अधुरी छोड़कर ही अग्निकुंड में प्रवेश कर गयी। कालांतर में वेदवती ने माता सीता के रूप में राजा जनक को हल जोतते समय धरती से मिली और रामायण का पूरा घटनाक्रम शुरू हुआ।

रावण ने सीता रूपी वेदवती का किया था हरण
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार अपने 14 वर्षों के वनवास के दौरान भगवान राम, लक्ष्मण और माता सीता जब वन की तरफ जा रहे थे, तब श्रीराम ने माता सीता को वेदवती के श्राप के विषय में बताया। इसके बाद भगवान राम ने अग्निदेव को माता सीता को सौंपकर वेदवती को माता सीता के रूप में अग्निकुंड से बाहर निकाला था।
तुलसीदास द्वारा रचित रामचरित मानस में जिसे छाया सीता के रूप में भी दर्शाया गया है। कहा जाता है कि रावण ने माता सीता नहीं बल्कि सीता के रूप में वेदवती का ही अपहरण किया था और अग्नि परीक्षा के समय वेदवती को फिर से अग्नि में सौंप कर माता सीता को प्राप्त किया गया था।



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