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वट सावित्री पूजा: सावित्री को अपने में वापस बुलाना

भगवान की पूजा की तरह पति की पूजा भी भारत में बहुत प्रसिद्ध है और शादी शुदा औरतों की ज़िंदगी में महत्व रखती है। अब यह मत पूछना किस तरह की पूजा! तो चलिए हम थोड़ी देर के लिए इस मज़ाक को किनारे रख के जानते हैं वट सावित्री पूजा के महत्व।

हम इसकी कथा से शुरू करते हैं जो हिंदू पौराणिक कथा के अनुसार प्रसिद्ध है।

एक बार,राजकुमारी सावित्री जिसे यह बात पता थी की सुंदर नौजवान सत्यवान 1 साल के अंदर ही मरने वाला है, फिर भी उसके प्यार में पड़ गयी। भगवानों के दूत नारद ने सत्यवान के बारे में यह बात सावित्री के पिता अश्वपति को भी बताई पर सावित्री उनके प्यार में इस कदर डूबी हुई थी की वो उससे शादी करके ही मानी।

अगले 11 महीनों में सत्यवान की मृत्यु हो गयी और मृत्यु के भगवान यमदूत उसकी आत्मा को लेने के लिए आए। सावित्री बहुत ज़ोर ज़ोर से अपने पति को खोने के दुख में रो रही थी, पर उसे देख कर भी यमदूत को उसपे तरस नहीं आया। वो उनके पीछे पीछे ही रोते बिलखते चलने लगी, यह देख यमराज को उस पर दया आ गयी और उसे 3 वरदान माँगने का वर दे दिया। पहले वरदान में उसने अपने माता पिता की हमेशा कुशलता माँगी, दूसरे में माता पिता का ही कल्याण होना माँगा और तीसरे वरदान में उसने अपने माँ बनने का वरदान माँगा। यमराज ने बिना कुछ सोचे समझे उसे ये सारे वरदान दे दिए।

Vat Savitri

बरगद के पेड़ मे बँधे हुए धागे।
Image Courtesy:
Indu

तब सावित्री ने यमराज से पूछा की अगर वो उनके पति को अपने साथ ले जाएँगे तो उसका तीसरा वरदान उसे बच्चे हो माँ बनने का सुख पूरा कैसे होगा। तब जाकर यमराज को अपनी ग़लती का एहसास हुआ और उन्होने उसके पति का जीवन लौटा दिया। सावित्री लौट कर उसी बरगद के पेड़ पर गयी जहाँ उसका पति मृत्यु की हालत मे पड़ा था और कुछ ही समय में वो जीवित हो गया।

वट सावित्री की पूजा में बरगद के पेड़ का महत्व इसी कथा में बताया गया है।

वट सावित्री की पूजा व्रत पूर्णिमा या फिर व्रत अमावस्या के समय क्षेत्र के अनुसार की जाती है।

राज्य जहाँ जहाँ यह त्योहार मनाये जाते हैं:
वट सावित्री की पूजा विवाहित औरतों का पर्व है जो महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश और कर्नाटका के कुछ क्षेत्रों मे मनाया जाता है।

Vat Savitri Pooja

बरगद के पेड़ की पूजा करती विवाहित औरतें।

वट सावित्री पूजा का अनुष्ठान:
इस दिन विवाहित औरतें सुबह से शाम तक बिना कुछ खाए पिए उपवास रखती हैं और शाम को अपने पारंपरिक परिधान में बरगद के पेड़ के पास जमा हो उसमे एक लंबा धागा बाँधती हैं। प्रार्थना में वो अपने पति के अच्छे स्वास्थ और लंबी उम्र की कामना करती हैं और अंत में एक जगह जमा होकर सावित्री की कथा सुनती हैं।

बरगद (वट वृक्ष) के पेड़ का भारत में एक अलग ही महत्व है। हिंदू रीति रिवाज में इसे भगवान की तरह पूजा जाता है।

वट सावित्री की पूजा का समय:
वट सावित्री की पूजा सामान्यतः जून या जुलाई के महीने में मनाई जाती है। इस बार यह पूजा 18 जून से 20 जून तक मनाई गयी।

सावित्री की दृढ़ता से प्रेरित होकर ही विवाहित औरतें अपने पति और परिवार के अच्छे जीवन के लिए इस दिन भगवान से प्रार्थना करती हैं।

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