महादेव के जयघोष के साथ 25 अप्रैल से केदारनाथ धाम यात्रा की शुरुआत हो चुकी है। लाखों की तादाद में श्रद्धालुओं ने केदारनाथ की यात्रा के लिए रजिस्ट्रेशन करवाया है। अगर आप भी केदारनाथ धाम यात्रा पर जाने वाले हैं तो केदारनाथ से जुड़ी और इसके आसपास की इन 8 जगहों के दर्शन भी जरूर करें।

देवप्रयाग संगम

यह भगीरथी और अलकनंदा नदियों के संगम पर बसा हुआ है। यहीं पर दोनों नदियां सम्मिलित धारा में गंगा कहलाती हैं। दोनों नदियों के संगमस्थल पर दो अलग-अलग रंगों के पानी का मिलन स्पष्ट रूप से पता चलता है। इस क्षेत्र में आश्चर्यजनक रूप से एक भी कौवा दिखाई नहीं देता है।
मां धारी देवी मंदिर

धारी देवी मंदिर में काली मां की आश्चर्यजनक मूर्ति स्थापित है, जो दिन में तीन बार अपना रुप बदलती है। यह मूर्ति सुबह में बालिका, दोपहर में युवती और शाम के समय में वृद्धा के रूप में नजर आती है। यह मंदिर झील के बीचोबीच स्थित है। यह चारधाम और उसके श्रद्धालुओं की रक्षक के रूप में जानी जाती हैं।
यह भी कहा जाता है कि 16 जून 2013 की शाम को धारी देवी का मंदिर तोड़ दिया गया था और उनकी मूर्ति को मूल स्थान से हटा दिया गया था। इसके कुछ घंटों बाद ही केदारनाथ में भयानक बाढ़ आयी थी जिसमें सब कुछ तहस-नहस हो गया था। बाद में मंदिर को फिर से पुराने स्थान पर ही बनाया गया।
रुद्रप्रयाग संगम

केदारनाथ से 86 किमी दूर रुद्रप्रयाग संगम स्थित है। रुद्रप्रयाग अलकनंदा के पंच प्रयागों में से एक है। यह अलकनंदा और मंदाकिनी नदी का संगमस्थल है। कहा जाता है कि इस स्थान पर नारद मुनी ने भगवान शिव की उपासना की थी और उनके कहने पर ही भगवान शिव में रौद्र रुप धारण किया था। यहां दोनों नदियों का संगमस्थल इतना सुन्दर है, ऐसा लगता है मानों दो बहनें आपस में गले मिल रही हो।
गुप्तकाशी विश्वनाथ मंदिर

गुप्तकाशी का वहीं महत्व है, जो काशी का है। रुद्रप्रयाग से 35 किमी दूर गुप्तकाशी स्थित है। यह केदारनाथ का प्रमुख पड़ाव है। केदारनाथ की चढ़ाई यहीं से प्रारंभ होती है। यहां अर्द्धनारीश्वर का एक मंदिर है। मंदिर के निकट ही मणिकर्णिका कुंड है।
कहा जाता है कि महाभारत के युद्ध के बाद पांडव अपने पाप धोने के लिए भगवान शिव का दर्शन करने जा रहे थे लेकिन भगवान शिव उन्हें दर्शन नहीं देना चाहते थे। उस समय वह इस कुंड में छिप गये थे और यहीं उनके कानों के कुंडल की मणि गिर गयी। इसलिए इस कुंड को मणिकर्णिका कहा जाता है।
गौरी कुंड

केदारनाथ से 14 किमी की दूरी पर स्थित गौरीकुंड से ही लोग केदारनाथ की पैदल यात्रा शुरू करते हैं। गौरीकुंड में गर्म पानी के दो कुंड हैं, जिनका तापमान करीब 43 डिग्री सेल्सियस और 23 डिग्री सेल्सियस होता है। यहां गौरी मां को समर्पित एक मंदिर है जिसमें संध्या आरती देखने लायक होती है। मंदिर में एक पार्वतीशिला भी है, जिसके बारे में कहा जाता है कि मां पार्वती ने यहां बैठकर ध्यान लगाया था।
भुकुंड भैरव मंदिर

केदारनाथ से आधा किमी की दूरी पर स्थित है भुकुंड भैरव का मंदिर। भुकुंड भैरव को केदारनाथ का रावल और यहां का क्षेत्रपाल भी कहा जाता है। केदारनाथ के कपाट खुलने से पहले विधिविधान से भुकुंड भैरव की पूजा करने का विधान है। इस मंदिर में कोई छत नहीं है। यानी खुले आकाश के नीचे ही भगवान शिव भैरव के स्वरुप में निवास करते हैं। माना जाता है कि जब सर्दियों में केदारनाथ के कपाट बंद हो जाते हैं उस समय भैरव ही मंदिर की रखवाली करते हैं।
ऊखीमठ ओम्कारेश्वर मंदिर

ऊखीमठ ओम्कारेश्वर मंदिर कोई एक मंदिर नहीं बल्कि कई मंदिरों का समूह है। यहां वाराही देवी, पंचकेदार लिंग दर्शन मंदिर, पंचकेदार गद्दीस्थल, भैरवनाथ मंदिर और भी कई मंदिर हैं। शीतकाल में जब केदारनाथ के कपाट बंद हो जाते हैं उस समय केदार बाबा की भोग मूर्ति की डोली, छत्र और त्रिशुल को ऊखीमठ के ओंकारेश्वर मंदिर के गर्भगृह में प्रतिष्ठित किया जाता है। फिर मंदिर खुलने से पहले उन्हें ले जाकर केदारनाथ मंदिर के गर्भगृह में प्रतिष्ठित कर दिया जाता है।
त्रियुगीनारायण मंदिर

यह प्राचीन मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है। यहां भगवान नारायण भूदेवी के साथ विराजमान है। इस मंदिर का महत्व इसलिए भी काफी ज्यादा है क्योंकि इसे शिव-पार्वती का विवाह-स्थल माना जाता है। इस विवाह में ब्रह्मा आचार्य और भगवान विष्णु ने पार्वती के भाई का कर्तव्य निभाया था।
मंदिर के ठीक सामने एक अखंड ज्योति जलती है। इसके बारे में कहा जाता है कि यह शिव-पार्वती के विवाह के समय से जलती आ रही है। मंदिर के सामने स्थित ब्रह्मशिला को इस दिव्य विवाह का वास्तविक स्थल माना जाता है। मंदिर के पास ही कई पवित्र सरोवर भी हैं।



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