कोलकाता के दो प्रमुख काली मंदिरों में एक है काली घाट मंदिर और दूसरा है दक्षिणेश्वर का काली मंदिर। काली घाट मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है, जहां माता सती की हाथों की सबसे छोटी ऊंगली गिरी थी। लेकिन शक्तिपीठ ना होकर भी दक्षिणेश्वर काली मंदिर का महत्व किसी शक्तिपीठ से कम नहीं है।

गंगा नदी के किनारे स्थित इस मंदिर के ठीक दूसरी ओर यानी गंगा की उस पार बेलुड़ मठ स्थित है जो रामकृष्ण मिशन का मुख्यालय भी है। दक्षिणेश्वर काली मंदिर से जुड़ी कई बातें काफी लोकप्रिय हैं। क्या आप जानते हैं, अगर आप दक्षिणेश्वर में माँ काली को भक्तिभाव से आज कोई साड़ी समर्पित करते हैं, तो वह साड़ी माँ काली 10 सालों के बाद पहनेंगी? क्या आपको ये पता है दक्षिणेश्वर में स्थापित भवतारिणी माँ काली की दो बहनें भी हैं?

जैसा हम सभी जानते हैं, दक्षिणेश्वर में माँ काली के मंदिर की स्थापना कोलकाता के एक जमींदार परिवार की बहू रानी रासमणी ने की थी। मंदिर में बतौर प्रधान पुजारी रामकृष्ण परमहंस को नियुक्त किया गया था। बता दें, रामकृष्ण परमहंस वहीं महान साधक हैं, जिनके बारे में कहा जाता है कि माँ काली उन्हें नित्य दर्शन दिया करती थी। काली पूजा की रात को पूरी रात इस मंदिर में भक्तों का तांता लगा रहता है। हर साल की तरह इस साल भी मंदिर के कपाट पूरी रात खुले रहे। मंदिर में कलश स्नान के साथ काली पूजा पर विशेष पूजा-अनुष्ठान शुरू हुआ। भक्तों ने पूरी रात जागकर लाइन में लगकर माँ काली के दर्शन भी किये। और उन्हें एक खास चढ़ावा भी चढ़ाया।
पसंद है बनारसी साड़ी

भक्त माँ काली को सिर्फ फूल और मिठाई ही नहीं बल्कि गहने, जेवर और कीमती साड़ियों का चढ़ावा भी चढ़ाते हैं। कहा जाता है कि दक्षिणेश्वर की माँ काली को बनारसी साड़ी पहनना सबसे अधिक भाता है। इसलिए देश और दुनिया भर से आने वाले भक्त माँ काली के लिए खास तौर पर तैयार की गयी बनारसी साड़ियों का चढ़ावा मंदिर में चढ़ाते हैं। दक्षिणेश्वर काली मंदिर की सबसे बड़ी खासियत है कि यहां भक्तों द्वारा चढ़ायी गयी बनारसी साड़ी सिर्फ माँ काली के चरणों में अर्पित ही नहीं की जाती है बल्कि उन्हें पहनायी भी जाती है।
आज दी साड़ी 10 साल बाद पहनेंगी माँ काली
दक्षिणेश्वर काली मंदिर में अगर कोई भक्त माँ काली को आज साड़ी समर्पित करता है, तो वह साड़ी माँ काली 10 के बाद पहनेंगी। जी हां, चौंक गये ना। लेकिन यहीं सच है। दरअसल, यहां माँ काली के लिए हर दिन हजारों की संख्या में साड़ियां भक्त चढ़ाते हैं। खास तौर पर काली पूजा के दिन लाखों की संख्या में भक्त दक्षिणेश्वर मंदिर पहुंचे और केवल इस दिन हजारों की संख्या में बनारसी से लेकर दूसरी तरह की साड़ियां माँ काली को चढ़ायी भी गयी है। इसलिए हर साड़ी को माँ काली को पहनाने के लिए मंदिर प्रशासन ने पंक्तिबद्ध तरीके से दिन निर्धारित किया है।
उसी हिसाब से अगर कोई भक्त आज माँ काली को साड़ी समर्पित करता है, उसे लगभग 10 सालों का इंतजार करना पड़ेगा जब देवी माँ को उस भक्त की चढ़ाई साड़ी पहनायी जाएगी। इससे ही हम अंदाजा लगा सकते हैं कि मंदिर में पूर्व से ही कितनी अधिक संख्या में साड़ियां जमा हो रखी हैं। यानी आपने अगर इस साल (2023) माँ काली को दिवाली के दिन कोई साड़ी दक्षिणेश्वर मंदिर में चढ़ायी है तो संभव है कि माँ काली साल 2032-33 में आपकी चढ़ायी साड़ी धारण करेंगी।
माँ काली की हैं दो बहनें

जी हां, दक्षिणेश्वर की भवतारिणी माँ काली की एक नहीं बल्कि दो बहनें हैं। दरअसल, रानी रासमणी ने मंदिर के गर्भगृह में स्थापित करने के लिए काले रंग के पत्थर से माँ काली की सुन्दर प्रतिमा बनाने की जिम्मेदारी नवीन भाष्कर को सौंपी थी। पहली प्रतिमा बनकर जब तैयार हुई तो उसका आकार थोड़ा छोटा पड़ गया, जो रानी रासमणी को पसंद नहीं आया। नवीन भाष्कर फिर से माँ काली की नयी प्रतिमा तैयार करने में जुट गये।
दूसरी प्रतिमा बनकर तैयार हुई, वह रानी रासमणी को पसंद भी आयी लेकिन उसका आकार थोड़ा बड़ा हो जाने के कारण मंदिर के गर्भगृह में स्थापित नहीं की जा सकती थी। आखिरकार नवीन भाष्कर की बनायी तीसरी मूर्ति मंदिर के गर्भगृह में स्थापित हुई जिसके दर्शन आज दुनियाभर के हजारों-लाखों श्रद्धालु करते हैं।
कहां हैं माँ काली की दोनों बहनें
नवीन भाष्कर ने माँ काली की कुल 3 मूर्तियां तैयार की। इनमें से एक मूर्ति तो दक्षिणेश्वर काली मंदिर में माँ भवतारिणी के रूप में स्थापित हैं, बाकि की दोनों मूर्तियां कहां गयी? नवीन भाष्कर की बनायी दूसरी मूर्ति जिसका आकार बड़ा हो गया था, वह कोलकाता के श्यामबाजार से सटे हेदुआ इलाके में गुहबाड़ी (गुह परिवार) में निस्तारिणी काली के नाम से स्थापित हैं। पहली मूर्ति जो आकार में सबसे छोटी थी वह दक्षिणेश्वर से सटे बड़ानगर इलाके में दे प्रमाणिक परिवार में ब्रह्ममयी काली माँ के नाम से स्थापित व पूजित हैं।

कैसे पहुंचे दक्षिणेश्वर मंदिर
दक्षिणेश्वर काली मंदिर पहुंचने का सबसे आसान तरीका मेट्रो है। कोलकाता मेट्रो के सबसे पुराने नॉर्थ-साउथ कॉरिडोर का सबसे आखिरी स्टेशन (वर्तमान में) दक्षिणेश्वर ही है। दक्षिणेश्वर मेट्रो स्टेशन पर उतरने के बाद आपको बस एक सड़क पार करने की जरूरत होगी। सड़क पार कर दूसरी तरफ से दक्षिणेश्वर काली टेम्पल स्काईवॉक मिल जाएगा जिससे होकर आप सीधे मंदिर के मुख्य द्वार के सामने पहुंच जाएंगे।
अगर आप ट्रेन से यहां आना चाहे तो मंदिर का सबसे नजदीकी स्टेशन दक्षिणेश्वर ही है, जिसके ठीक बगल में स्काईवॉक मिल जाएगा। सियालदह स्टेशन से दक्षिणेश्वर स्टेशन के लिए ट्रेन आसानी से मिल जाएगी। इसके अलावा हावड़ा से आप पानी वाले जहाज से भी गंगा पार कर दक्षिणेश्वर पहुंच सकते हैं। यह मंदिर सड़क मार्ग से भी अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है।



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