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इतिहास कोला नृत्‍य का जो आपने देखा कांतारा मूवी में

स्‍टार ऋषभ शेट्टी की मूवी कांतारा में कोला नृत्‍य का वृहद चित्रण किया गया है। बेहतरीन म्‍यूजिक और डिजिटल साउंड के बीच कोला नृत्य देख सिनेमाघरों में तमाम लोगों के रोंगटे तक खड़े हो गए। आपने कांतारा मूवी देखी हो या नहीं लेकिन कोला नृत्‍य क्‍या है, यह सवाल आपके मन में घर कर चुका होगा, ये पक्का है। इसीलिए हम बात करने जा रहे हैं कोला के इतिहास की, जो दक्षिण भारत से जुड़ा है, वो भी खास तौर से केरल और कर्नाटक के बॉर्डर जिलों से।

क्या होता है भूत कोला?

दरअसल भूत कोला तुलू भाषी लोगों द्वारा भगवान व आत्माओं की पूजा के दौरान किया जाता है। कर्नाटक के दक्षिण कन्‍नड़ क्षेत्र यह नृत्य प्राचीन काल से प्रसिद्ध है। चूंकि तुलू भाषा केरल के भी कुछ हिस्‍सों में बोली जाती है, इसलिए वहां भी इस नृत्‍य को आसानी से देखा जा सकता है।

Kola Dance

आम तौर पर कोला नृत्‍य का आयोजन सामूहिक समारोहों एवं पर्वों पर होती है। ऐसे पर्व जो क्षेत्र के लिए महत्‍व रखते हों, उनमें इस नृत्य का आयोजन किया जाता है। कोला नृत्‍य पूजा के समय किया जाता है जिसके माध्‍यम से भगवान से गांव व पूरे क्षेत्र को दैविक आपदाओं एवं प्राकृतिक आपदाओं से बचाये रखने के लिए प्रार्थना की जाती है। साथ में लोग ईश्‍वर से सुख एवं समृद्ध‍ि की प्रार्थना भी करते हैं। आम तौर पर यह नृत्‍य पुरुष ही करते हैं।

कोला को लेकर क्‍या है मान्‍यता?

कोला नृत्‍य को लेकर लोगों में अलग-अलग मान्‍यताएं हैं। कुछ मानते हैं कि इस नृत्‍य को करने से आत्‍माएं प्रसन्न होती हैं और क्षेत्र के लोगों को परेशान नहीं करतीं, जबकि कुछ लोग कोला नृत्‍य करने वाले को भगवान का रूप मानते हैं। कहा जाता है कि जो शुद्ध रूप से पूरी तन्‍मयता के साथ कोला नृत्‍य करते हैं, ईश्‍वर उनके अंदर समा जाते हैं। हालांकि ऐसा कांतारा मूवी में भी दिखाया गया है। जब कोला नृतक के ऊपर दैव (क्षेत्र के भगवान) हावी होते हैं, तो पूराी गांव हाथ जोड़ कर प्रार्थना करने लगता है।

Kola Dance

कर्नाटक व केरल के जनजातीय इलाकों में आज भी मान्‍यता है लोगों की रक्षा कोई और नहीं बल्कि उनके दैव करते हैं और उनको प्रसन्‍न करने के लिए हर साल एक समारोह का आयोजन किया जाता है। लोग मानते हैं कि इस नृत्‍य को करने वाल व्‍यक्ति ईश्‍वर को मनुष्‍यों से मिलाता है।

कोला नृत्‍य का इतिहास

कोला की शुरुआत कब से हुई इसका वर्णन इतिहासकारों के पास नहीं है, लेकन हां पुरातत्‍वविदों द्वारा किये गये खनन में प्राप्‍त कोला नृत्‍य के दौरान पहने जाने वाले मुकुट, मुखौटे, कंगन, व अन्‍य आभूषणों से पता चलता है कि इस नृत्‍य का आयोजन 1800 वीं सदी से पहले से होता आ रहा है। तुलुनाडु, यानि तुलु भाषी क्षेत्र, में उत्खनन में कोला से जुड़ी चीजें तमाम चीजें पायी गईं, जो म्‍यूजियम में रख दी गईं।

क्‍या होता है पंजुरली कोला?

पंजुरली कोला भूता कोला का ही एक भाग होता है, जिसमें एक जंगली सुअर की पूजा की जाती है। तुलू भाषा में पुंजरली का मतलब जंगली सुअर होता है। कांतारा मूवी में भी इस नृत्‍य को दिखाया गया है, जब अंत में जंगली सुअर का मुकुट लगाकर कोला नृत्‍य का मंचन किया जाता है। इतिहास की बात करें तो सदियों से जंगली सुअर किसानों के दुश्‍मन होते हैं, क्‍योंकि ये सुअर फसल खराब करने में जरा भी समय नहीं लगाते हैं। ऐसी मान्‍यता है कि जंगली सुअर की पूजा करने से देवता प्रसन्‍न होते हैं और फसलें खराब होने से बच जाती हैं।

किन-किन शहरों से ताल्‍लुक रखता है कोला नृत्‍य

कोला नृत्‍य खास तौर से वेस्‍टर्न घाट के उस इलाके से ताल्‍लुक रखता है, जो केरल और कर्नाटक की सीमा पर पड़ता है। वेस्‍टर्न घाट घने जंगलों का इलाका है, जहां जंगली सुअर अधिक संख्‍या में पाये जाते हैं। इन क्षेत्रों में जंगली इलाकों में रहने वाले जनजाति समूह इस नृत्‍य को पूरी निष्‍ठा के साथ करते हैं। शहरों की बात करें तो उडुपी, दक्षिण कन्‍नडा, मैंगलोर, वायनाड, कासरगोड, आदि जिलों से इस नृत्‍य का इतिहास जुड़ा है।

भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कोला नृत्‍य

दक्षिण के कई क्षेत्रों में भगवान शिव और पार्वती माता की पूजा के दौरान भी कोला नृत्‍य किया जाता है। पूरे दक्षिण भारत में करीब 350 प्रकार के कोला नृत्‍य किए जाते हैं।

कोला जैसे अन्‍य नृत्‍य

स‍िर पर सुअर के मुख का मुकुट और कमर पर धान की पगडंडियों की कमर पेटी व पीले रंग से पुता हुआ मुंह का मतलब कोला नृत्‍य नहीं होता है। कोला के जैसे अन्‍य नृत्‍य भी हैं, जो सदियों से इन क्षेत्रों के गांवों में होते आ रहे हैं।

कोला नृत्य - ये वो नृत्‍य है जो स्‍थानीय दैव की पूजा के दौरान होता है।

बांदी नृत्‍य - यह कोला नृत्‍य जैसा ही होता है, लेकिन इसमें नर्तक एक रथ पर सवार होता है, जिसे गांव वाले पूरी श्रद्धा के साथ पूरे गांव में घुमाते हैं।

नेमा नृत्‍य - यह नृत्‍य आम तौर पर बंद जगहों पर एकांत में किया जाता है। इस पूजा का आयोजन साल में या दो साल में एक बार ही किया जाता है।

अगेलु तंबिला - यह नृत्‍य लोग अपने पूर्वजों की पूजा के दौरान उनकी आत्‍मा की शांति के लिए करते हैं।

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