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क्यों ISRO अपने ज्यादातर रॉकेट श्रीहरिकोटा से ही लॉन्च करता है?

चंद्रमा की धरती पर चंद्रयान 3 का रोवर प्रज्ञान चहलकदमी कर रहा है तो लैंडर विक्रम सारी जानकारियों को इसरो तक पहुंचा रहा है। चंद्रयान 3 की सफलता के बाद अब इसरो अपने अगले मिशन 'आदित्य L1' को लॉन्च करने वाला है। 2 सितंबर की सुबह 11.50 बजे इसरो के श्रीहरिकोटा केंद्र से लॉन्च किया जाएगा।

aditya l1 launchin

जी हां, इसरो का वहीं केंद्र जहां से चंद्रयान 2 और 3 को लॉन्च किया गया था। पिछले कुछ सालों में इसरो के ज्यादातर रॉकेटों को श्रीहरिकोटा केंद्र से ही लॉन्च किया जाता है। पर क्यों? श्रीहरिकोटा में ऐसा क्या खास है कि इसरो अपनी ज्यादातर रॉकेट को यहीं से लॉन्च करता है?

लोकेशन है USP

श्रीहरिकोटा का लोकेशन ही उसकी सबसे खासियत और USP है। यह जगह भूमध्य रेखा यानी इक्वेटर के सबसे पास मौजूद है। भारत ही नहीं बल्कि दुनिया भर से जितने भी रॉकेट व सैटेलाइट अंतरिक्ष में भेजे जाते हैं, वे सभी भूमध्य रेखा को केंद्र बनाकर उसके आसपास ही पृथ्वी का चक्कर लगाते हैं।

sriharikota launching station

दक्षिण भारत में भूमध्य रेखा के इतने पास और कोई भी जगह मौजूद नहीं है। इसलिए जब श्रीहरिकोटा से रॉकेट को लॉन्च किया जाता है तो उसकी लागत कम आती है। ज्यादातर सैटेलाइट या रॉकेट पूर्व की दिशा में ही लॉन्च किया जाता है और श्रीहरिकोटा समुद्र के पूर्वी तट पर ही स्थित है, इसलिए इसे अतिरिक्त 0.4 किमी/सेकंड की वेलोसिटी मिलती है।

समुद्र से मिलती है बड़ी राहत

श्रीहरिकोटा की आबादी बहुत कम है। यहां या तो इसरो के अधिकारी रहते हैं या फिर कुछ मछुआरे। यह जगह आंध्रप्रदेश का एक द्वीप है जो दो तरफ से समुद्र से घिरा हुआ है। ऐसे में अगर रॉकेट को लॉन्च करते वक्त कोई भी तकनीकि गड़बड़ी होती है तो लोगों के जान का खतरा कम रहता है। मिशन को अगर किसी कारणवश अबॉर्ट करना पड़ा तो रॉकेट को समुद्र की तरफ आसानी से मोड़ा जा सकता है।

aditya l1 isro

इसके अलावा रॉकेट लॉन्च करने के बाद उसके अवशेष समुद्र में ही गिरते हैं। श्रीहरिकोटा में अगर बारिश का मौसम छोड़ दिया जाए तो पूरे साल मौसम एक समान ही बना रहता है। यह मौसम किसी रॉकेट या सैटेलाइट को लॉन्च करने के लिए मददगार साबित होता है। इसी वजह से इसरो अपने ज्यादातर मिशन को लॉन्च करने के लिए श्रीहरिकोटा का ही चुनाव करता है।

श्रीहरिकोटा कब बना लॉन्चिंग स्टेशन

इसरो ने 1969 को श्रीहरिकोटा को अपने लॉन्चिंग स्टेशन के तौर पर चुना। इसके बाद 1971 में सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र की स्थापना की गयी। उसी वर्ष RH-125 साउंडिंग रॉकेट को पहली बार यहां से लॉन्च किया गया। 10 अगस्त 1979 को पहला ऑर्बिट सैटेलाइट रोहिणी 1A को लॉन्च किया गया। हालांकि कुछ खामियों की वजह से 19 अगस्त को वह सैटेलाइट नष्ट हो गया था। 1971 के बाद से लेकर अब तक श्रीहरिकोटा के लॉन्चिंग स्टेशन से ही इसरो ने अपने ज्यादातर सैटेलाइट और रॉकेट को लॉन्च किया गया है।

aditya l1 satellite

बता दें, इसरो के श्रीहरिकोटा लॉन्चिंग स्टेशन से ही 2 सितंबर 2023 को 'आदित्य L1' को लॉन्च किया जाएगा। सूर्य और उससे निकलने वाली रोशनियों के बारे में जानकारी इकट्ठा करने के लिए ही इसरो यह अभियान शुरू कर रहा है। इसके लिए इसरो के अंतरिक्ष यान को सूर्य के सामने L1 बिन्दु तक पहुंचना होगा, जिसके लिए उसे धरती से लगभग 15 लाख किमी की दूरी करनी होगी। इस दूरी को तय करने में 'आदित्य L1' को 100 दिनों से अधिक का समय लग सकता है।

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