छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र के दंतेवाड़ा जिले में शंखिनी-डंकिनी नदी के संगम तट पर स्थित है देवी दंतेश्वरी का मंदिर। जगदलपुर से करीब 80 किमी की दूरी पर स्थित दंतेवाड़ा के इस मंदिर को काफी महत्वपूर्ण और पवित्र माना गया है। इसी मंदिर में देवी दंतेश्वरी की पूजा-अर्चना के बाद ही जगदलपुर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी सभा को संबोधित किया।

पर क्यों इस मंदिर का इतना ज्यादा महत्व है कि पीएम मोदी ने अपनी सभा से पहले देवी दंतेश्वरी के दर्शन किये? क्या है देवी दंतेश्वरी मंदिर का इतिहास?
51 शक्तिपीठ का है हिस्सा
दंतेश्वरी मंदिर कोई आम मंदिर नहीं बल्कि यह 51 शक्तिपीठ का एक हिस्सा है। माना जाता है कि यहां माता सती के दांत गिरे थे। पौराणिक मान्यता के अनुसार प्रजापति दक्ष ने जब यज्ञ का आयोजन कर महादेव का अपमान करने के उद्देश्य से उन्हें यज्ञ में आमंत्रित नहीं किया, तब एक बेटी होने के नाते माता सती अपने पिता के घर आयी। लेकिन पिता द्वारा पति का अपमान बर्दास्त नहीं कर पाने के कारण उन्होंने अपने योगबल से आत्मदाह कर लिया। इससे दुखी होकर महादेव पत्नी का शव अपनी गोद में लेकर तांडव करने लगे।

तब महादेव को शांत करने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शव के 51 हिस्से कर दिये थे। पूरी पृथ्वी पर देवी सती के शरीर के ये हिस्से जहां-जहां गिरे, वहां शक्तिपीठ का निर्माण किया गया। कहा जाता है कि दंतेश्वरी शक्तिपीठ में माता सती के दांत गिरे थे।
दंतेश्वरी मंदिर का इतिहास
इतिहासकारों के मुताबिक दंतेश्वरी मंदिर का जीर्णोद्धार वारंगल राज्य के राजा अन्नमदेव ने करीब 700 साल पहले करवाया था। इसके बाद महारानी प्रफुल्ल कुमारी देवी ने इसका जीर्णोद्धार 1932-33 में करवाया। लोककथाओं के मुताबिक जब अन्नमदेव वारंगल से दंतेवाड़ा आएं तो उन्हें देवी दंतेश्वरी का वरदान मिला। देवी ने उनसे कहा था कि अन्नमदेव जितनी दूर पैदल चलते जाएंगे, देवी दंतेश्वरी भी उनके पीछे-पीछे चलेंगी और उनके राज्य का उतना ही विस्तार होता जाएगा। लेकिन एक शर्त थी...

शर्त यह थी कि अन्नमदेव पीछे मुड़कर नहीं देख सकते थे। अगर उन्होंने ऐसा किया तो देवी मां उसी स्थान पर स्थापित हो जाएंगी। अन्नमदेव कई दिन और रात चलते रहे। शंखिनी-डंकिनी नदी के तट पर अन्नमदेव आगे बढ़ रहे थे लेकिन नदी के जल के कारण उन्हें देवी मां के पैरों की पायल की आवाज सुनाई नहीं दी। अन्नमदेव ने पीछे मुड़कर देख लिया। इसके बाद देवी मां ने आगे बढ़ने से इंकार कर दिया और वहीं नदी के संगमतट पर ही मूर्ति के रूप में विराजमान हो गयी। मंदिर में देवी दंतेश्वरी के काले ग्रेनाईट पत्थर से बनी 6 भुजाओं वाली मूर्ति है। उनके हाथों में कई तरह के अस्त्र-शस्त्र हैं। मूर्ति वस्त्र और आभूषण से अलंकृत हैं और ऊपर चांदी का छत्र है। मंदिर में कई और भगवान जैसे गणेश जी, शिव जी, विष्णु और भैरव की मूर्तियां भी है।
मनायी जाती है अलग नवरात्रि

पूरे भारत में जहां चैत्र और शारदीय नवरात्रि मनायी जाती है लेकिन दंतेश्वरी मंदिर में तीसरी नवरात्रि भी मनायी जाती है जिसे आखेट नवरात्रि कहा जाता है। 10 दिनों के इस नवरात्रि को फागुन मड़ई भी कहा जाता है। इस महापर्व में आसपास के लगभग 600 गावों के देवी-देवताओं को आमंत्रित किया जाता है। चैत्र और शारदीय नवरात्रि में तो यहां लोगों की भीड़ उमड़ती ही है, लेकिन आखेट नवरात्रि के 10 आदिवासियों की सबसे ज्यादा भीड़ मंदिर में पहुंचती है। कहा जाता है कि दंतेश्वरी मंदिर में सच्चे दिल से की पूजा और मांगी गयी मनोकामना जरूर स्वीकार की जाती है।
कैसे पहुंचे दंतेवाड़ा
दंतेवाड़ा सड़क मार्ग से छत्तीसगढ़ के सभी शहरों से जुड़ा हुआ है। अगर आप ट्रेन से आना चाहते हैं तो जगदलपुर आ सकते हैं। जगदलपुर से दंतेवाड़ा की दूरी महज 80 किमी की है। जगदलपुर से दंतेवाड़ा तक के लिए आपको गाड़ियां आसानी से मिल जाएंगी। दंतेवाड़ा का सबसे नजदीकी एयरपोर्ट रायपुर है।



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