हर साल दशहरे के दिन मेघनाथ और कुंभकर्ण के साथ रावण का पुतला दहन किया जाता है। इसे बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। बचपन से ही हम सभी ने रावण को बतौर खलनायक, घमंडी राजा और माता सीता के अपहरणकर्ता के तौर पर ही जाना है। लेकिन क्या आप जानते हैं, पौराणिक मान्यताओं में रावण को महापंडित कहा जाता है।
रावण सिर्फ एक खलनायक या घमंडी राजा ही नहीं था बल्कि उसमें ऐसी कई खूबियां भी थी जो उसे अपने समयकाल के दूसरे राजाओं से काफी अलग बनाती है। हालांकि रावण का घमंड ही उसके पतन का कारण बन गया था।

इस साल नवरात्रि पर चलिए हम आपको रावण की उन विशेषताओं के बारे में बताते हैं, जिनकी वजह से वह महापंडित कहलाया और जिन खूबियों की अनदेखी नहीं की जा सकती है।
1. रावण की शिवभक्ति
अपने समयकाल में रावण से बड़ा कोई शिवभक्त नहीं था। कहा जाता है कि रावण भगवान शिव का इतना बड़ा भक्त था कि वह कैलाश पर्वत समेत उन्हें अपनी लंका में लेकर जाना चाहता था। जब वह कैलाश पर्वत को उठाने की कोशिश करने लगा तब भगवान शिव ने अपने पैरों की छोटी ऊंगली से कैलाश को दबा दिया, जिससे पर्वत के नीचे रावण का हाथ भी दब गया था। दर्द से कराह रहे रावण ने उस समय भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए शिव तांडव स्त्रोत की रचना कर डाली थी।
2. महापंडित था रावण
रावण ब्राह्मण परिवार से था। हालांकि अपनी असुरी प्रवृति की वजह से वह राक्षस कहलाता था। रावण भगवान ब्रह्मा का वंशज था। वह भगवान ब्रह्मा के पुत्र प्रजापति पुल्सत्य के पुत्र ऋषि विश्रवा का पुत्र था। इस नाते वह भगवान ब्रह्मा का परपोता था। रावण को अपने समय में दुनिया का सबसे ज्ञानी व्यक्ति माना जाता था। वह वेदों का ज्ञाता होने के साथ-साथ विज्ञान, गणित, ज्योतिष शास्त्र और राजनीति में निपुण था। वह कई शस्त्रों का मालिक था, जिसे उसने अपने तपोबल से प्राप्त किया था। इसके साथ-साथ रावण आयुर्वेद का भी महाज्ञानी था।
3. कुशल शासक था रावण
राक्षसराज रावण के समयकाल में भले ही पूरी दुनिया में उसका आतंक छाया हुआ था, लोग उससे डरते थे, खौफ खाते थे लेकिन रावण अपने लंकावासियों के लिए एक अच्छा व कुशल राजा था। कहा जाता है कि रावण के शासनकाल में लंकावासियों को न तो किसी भी चीज की कमी रहती थी और न ही सुरक्षा का कोई डर सताता था। उसका राज्य इतना समृद्ध था कि लंका के गरीब से गरीब व्यक्ति के पास भी सोने के बर्तन हुआ करते थे।

4. संगीतज्ञ था रावण
रावण संगीत प्रेमी था। वह वीणा बजाने में निपुण भी था। उसने एक वाद्य यंत्र भी बनाया था जिसे बेला कहा जाता है। मान्यताओं के अनुसार बेला ही वायलिन का मूल और प्रारंभिक स्वरूप है। इस वाद्य यंत्र से ही वायलिन का जन्म हुआ था।
5. ज्योतिष का था ज्ञाता
कहा जाता है कि रावण ज्योतिष शास्त्र में पारंगत था। मेघनाथ के जन्म के समय उसने अपने तपोबल से सभी ग्रहों को अपना दास बना लिया था और मेघनाथ की कुंडली में ऐसा योग का निर्माण करवाया था जिससे उसे मारना लगभग असंभव हो गया था। लेकिन ऐन मौके पर शनिदेव ने अपनी चाल बदल दी और मेघनाथ को अमर नहीं होने दिया।
इस वजह से क्रोधित होकर रावण ने शनिदेव पर आघात किया था और उन्हें आजीवन अपने पैरों के नीचे दबा कर रखा था। कई जगहों पर आपको ऐसी तस्वीरें भी देखने को मिलेगी जिसमें रावण के पैरों के नीचे एक व्यक्ति लेटा हुआ नजर आएगा। भगवान हनुमान जब सीता माता का पता लगाने अशोक वाटिका पहुंचे थे, तब उन्होंने शनिदेव को मुक्त करवाया था।
6. वास्तुशास्त्र का था ज्ञानी
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार रावण वास्तुशास्त्र का बहुत बड़ा ज्ञाता था। इसलिए माता पार्वती के लिए भगवान शिव ने रावण से ही सोने की लंका बनाने के लिए कहा था। महादेव ने रावण को ही गृहप्रवेश की पूजा करने के लिए पुरोहित बनने का भी आग्रह किया था। लेकिन पूजा समाप्त होने के बाद जब यजमान से दक्षिणा प्राप्त करने की बारी आयी तो रावण ने भगवान शिव से सोने की लंका ही मांग ली थी।
सिर्फ इतना ही नहीं, रावण पर विजय प्राप्त करने के लिए जब श्रीराम ने यज्ञ करने का फैसला लिया था, तब उस यज्ञ में भी पुरोहित बनने का आमंत्रण श्रीराम ने रावण को ही दिया था जिसे उसने स्वीकार भी कर लिया था।

7. रावण जैसी प्रखर बुद्धि और किसी की नहीं
रावण 10 सिरों वाला था। इसलिए उसकी बुद्धि भी किसी भी आम इंसान के मुकाबले कहीं ज्यादा मानी जाती थी। कहा जाता है कि रावण एक बार जिस चीज को हासिल करने की ठान लेता था वह उसे किसी भी कीमत पर अपनी बुद्धि और चतुराई के बल से प्राप्त करके ही मानता था।
यहीं वजह है कि सीता स्वयंवर में अपमानित होकर वापस लौटने के कई वर्षों बाद जब शूर्पनखा के अपमान का बदला लेने के बहाने रावण को माता सीता का अपहरण कर उन्हें प्राप्त करने का मौका मिला तो उसने एक पल का भी विलंब न करते हुए अपने मामा मारिच के साथ मिलकर पूरा षड्यंत्र रच डाला।
8. धैर्य और वीर था लंकेश
रावण को भले ही घमंडी राजा माना जाता हो लेकिन उसका अपनी वीरता पर घमंड करना व्यर्थ का नहीं था। माता सीता की खोज करने और रावण के बल का पता लगाने के लिए जब हनुमान लंका पहुंचे और रावण से मिलकर जब वह श्रीराम के पास वापस लौटे तो वह भी लंकापति रावण की तारीफ किये बिना नहीं रह सके थे।
कहा जाता है कि उस वक्त भगवान हनुमान ने रावण के चेहरे के तेज, उसके रंग-रुप, सौन्दर्य, धैर्य और एक वीर पुरुष होने के सभी लक्षणों की वर्णना की थी। कहा जाता है कि अगर रावण बुराई के मार्ग पर न चला होता तो वह अपने तपोबल और वीरता की बदौलत देवलोक का स्वामी भी बन सकता था।
9. सभी को समान अधिकार देना चाहता था रावण
कहा जाता है कि रावण सभी जातियों को समान मानते हुए भेदभावरहित समाज की स्थापना करना चाहता था। वह देवों के भोग-विलास वाली यक्ष संस्कृति के सख्त खिलाफ था। वह देवों और राक्षसों को समान अधिकार देने का पक्षपाती था और अपनी रक्षा करने वाली रक्ष संस्कृति की स्थापना करना चाहता था। दरअसल, मूल रूप से रक्ष संस्कृति को मानने वाले ही राक्षस कहलाए।
10. विनम्र था रावण
रावण में भले ही राक्षसी गुण विद्यमान हो, लेकिन उसमें विनम्रता भी भरी हुई थी। रावण की अपनी लंका पर पूरी पकड़ थी। अगर रावण में विनम्रता नहीं होती तो क्या ऐसा संभव था कि राम-रावण युद्ध के दौरान जब लक्ष्मण को मेघनाथ ने नागपाश में बांध दिया तो बिना रावण की मर्जी अथवा उसे बिना भनक लगे ही आयुर्वेदाचार्य सुषेण का अपहरण कर भगवान हनुमान श्रीराम के शिविर में लक्ष्मण के इलाज के लिए ले जा पाते? कहा जाता है कि रावण को इस बात की जानकारी थी लेकिन अपनी विनम्रता की वजह से ही उसने इसका कोई विरोध नहीं किया था।
सिर्फ इतना ही नहीं, जब रावण मृत्यु शैया पर था तब श्रीराम ने लक्ष्मण को रावण से ज्ञान लेने के लिए भेजा था। उस समय लक्ष्मण, रावण के सिर के पास जाकर खड़े हो रहे थे जिसे देखकर रावण ने उनसे अपना मुंह फेर लिया था। दरअसल, रावण लक्ष्मण को विनम्रता का पाठ पढ़ाना चाहते थे। इस बात का अहसास श्रीराम ने अपने अनुज को यह कहते हुए करवाया था कि किसी से जब भी कुछ सीखने जाओ तो उसके चरणों में बैठकर विनम्र भाव से सीखना चाहिए, घमंड से नहीं।



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