भारत को सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश कहा जाता है और चुनाव या मतदान को लोकतंत्र और राजनीति का आधार माना जाता है। हमारे देश में केंद्र सरकार से लेकर हर राज्य की अलग सरकार तक को चुनने, पंचायत, नगर निकाय और कॉलेज-यूनिवर्सिटी में छात्र संगठनों तक के चुनाव होते रहते हैं। लेकिन क्या आपने कभी यह सोचा है कि चुनाव या मतदान से अपना नेता ढूंढने की इस प्रक्रिया कितनी पुरानी है?
किसने यह सोचा होगा कि सिर्फ राजा का बेटा राजा नहीं बनेगा बल्कि जिस व्यक्ति को आम जनता चाहती है, वह उसे अपना नेता चुनेगी? पुराने जमाने में भी क्या कागजों पर मुहर लगाकर ही चुनाव हुआ करते थे या चुनाव करवाने की कोई और प्रक्रिया होती थी? क्या विदेशियों ने भारतीयों को चुनाव के बारे में बताया और समझाया था? अगर इस सवाल का आपका जवाब हाँ है, तो आप गलत सोच रहे हैं।

नई नहीं है चुनाव प्रक्रिया
भारत में चुनाव आधुनिक समय की देन या आजादी के समय शुरू हुई कोई प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इसकी शुरुआत चोल साम्राज्य के समय में ही हो गयी थी। साल 1995 में भारतीदासन यूनिवर्सिटी में तिरुनावुक्कारसु एस द्वारा किये गये शोध के ऐसे कई दस्तावेज लाईब्रेरी में उपलब्ध हैं, जिसमें यह बताया गया है कि मध्यकालिन युग में चुनाव की प्रक्रिया कितनी कुशल हुआ करती थी।
हालांकि उस समय की शासन प्रणाली और आज की लोकतांत्रिक शासन प्रणाली में काफी अंतर है। इस शोध में बताया गया है कि चोल, पल्लव और विजयनगर साम्राज्य में कई तरह की सरकारी संस्थाएं हुआ करती थी।
केंद्र सरकार के अधिकारी बैठकों में लेते थे हिस्सा
दक्षिण भारत पर लंबे समय तक जिन राजवंशों (चोल, पल्लव और विजयनगर) आदि का शासनकाल था, उनके साम्राज्य में सरकारी संस्थाएं जैसे नगरम, नाडु, मंडलम, सुभाष, उर आदि हुआ करते थे। जब इनकी महत्वपूर्ण कार्यों को निपटाने की बैठकें होती थी, तब उसमें केंद्र के अधिकारी भी शामिल होते थे। इस प्रशासन पर केंद्र सरकार की पूरी निगरानी रहा करती थी। ऋग्वेदिक भारत में 'सभा' बहुत सक्रिय हुआ करती थी।
इन सभाओं का मुख्य और अनिवार्य कर्तव्य न्याय व्यवस्था को बनाए रखना था। संगम साहित्य में मनराम और पोधियिल का उल्लेख मिलता है। लेकिन चोल साम्राज्य के समय स्थानीय स्वशासन का उल्लेख मिलता है, जो कुशलता के साथ अपना काम किया करती थी।
कैसी होती थी चोल साम्राज्य में चुनाव की प्रक्रिया?

के. ए. नीलकांत शास्त्री के मुताबिक चोल साम्राज्य के समयकाल में स्थानीय स्वशासन को चुनने की प्रक्रिया 'कुडावोलाई मुराई' कहलाती थी। इस प्रक्रिया में चुनाव लड़ने वाले सभी उम्मीदवारों के नाम ताड़ के पत्तों पर लिख दिया जाता था। लेकिन आधुनिक समय में बैलेट पेपर पर मुहर लगाकर अपने मताधिकार का प्रयोग करना फिर मतों की गिनती जैसी कोई भी प्रक्रिया तब नहीं होती थी। फिर कैसे होता था चुनाव?
एक बच्चे को बुलाकर ताड़ के पत्तों में से एक पत्ता बाहर निकालने या चुनने के लिए कहा जाता था। जिस भी उम्मीदवार का नाम उस पत्ते पर लिखा होता था, उसे ही चुनाव जीता हुआ माना जाता था। इसके बाद निर्वाचित सदस्य विभिन्न समितियों, जिन्हें 'वेरियम' कहा जा था, का गठन करते थे। जैसे झील समिति के लिए 'एरिवेरियम', उद्यान समिति के लिए 'थोट्टावेरियम', स्वर्ण समिति के लिए 'पोनवेरियम' आदि। समितियों का गठन होने के बाद सभी निर्वाचित सदस्य अपनी-अपनी जिम्मेदारियों का पालन करते थे।
कहां होता था नगर निकाय का ऑफिस?
आज के समय की तरह चुनी हुई सरकार 5 सालों के लिए नहीं बल्कि चोल साम्राज्य के समय में सदस्यों का निर्वाचन मात्र 1 साल के लिए ही होता था। 1 साल की अवधि पूरी होने के बाद फिर से इसी प्रक्रिया को दोहराई जाती थी, जहां ताड़ के पत्तों पर लिखे उम्मीदवारों के नामों में से एक नाम कोई बच्चा चुनाकर बताता था।
नगर निकाय का चुनाव होने के बाद निर्वाचित सदस्यों को काम करने के लिए ऑफिस भी जाना पड़ता था। गांव में सबसे बड़ा जो बरगद का पेड़ होता था अथवा गांव का मंडप ही नगर निकाय का ऑफिस हुआ करता था। जहां बैठकर निर्वाचित सदस्य शासन व्यवस्था को संभालते थे।
इन बातों से ही यह साबित होता है कि प्राचीन काल में पंचायतें ग्रामीण प्रशासन की कुशल इकाइयां हुआ करती थी। इन पंचायतों अथवा नगर निकायों का काम सभी नागरिकों की सुविधाओं का ध्यान रखना और निष्पक्ष होकर न्याय का संचालन करना होता था।



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