मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल, लगभग 107 सालों तक (1819 से 1926 के बीच) यहां 4 बेगमों का शासन रहा है। भोपाल की गद्दी पर बैठने वाली चार बेगमें कुदसिया बेगम, सिकंदर बेगम, शाहजहां बेगम और सुल्तान जहां बेगम रही हैं। कहा जाता है कि इन चारों बेगमों ने बिल्कुल किसी बाघिन की तरह ही भोपाल की राजगद्दी संभाली थी। सालों बाद इन बेगमों या यूं कहें बाघिनों की कहानी तो इतिहास के किसी पन्ने में दर्ज हो गयी है लेकिन अब भोपाल में गश्त लगाती हैं असली बाघिन।
जी हां, मीडिया रिपोर्ट्स में किये गये दावों को अगर सच मानें तो भोपाल दुनिया का एकमात्र ऐसा महानगर है जिसकी नगरनिगम चौहद्दी के अंदर बाघ और बाघिन खुलेआम गश्त लगाते हैं।

29 जुलाई को अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस (International Tiger Day) पर हम आपको भोपाल के बारे में कुछ ऐसी बातें बताने वाले हैं, जिसे जानकर हमारी तरह आप भी चौंक उठेंगे। Ei Samay में किये गये दावे के अनुसार मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में रात के वक्त एक या दो नहीं बल्कि पूरे 25 बाघ या बाघिन घूमते हैं।
लेकिन इंसानों के इतने करीब पहुंचने के बावजूद बाघों के साथ भोपाल में कभी भी इंसानों के किसी भी संघर्ष की कोई खबर सामने नहीं आयी है। इस वजह से भोपाल के आसपास रहने वाले इन बाघों को Urban Tiger का नया नाम दिया गया है।
दरअसल, मीडिया रिपोर्ट में बताया गया है कि भोपाल शहर का दक्षिणी हिस्सा रातापानी सेंचुअरी से सटा हुआ है। इस सेंचुअरी में कुल 25 बाघ-बाघिन अपने शावकों के साथ रहते हैं। बताया जाता है कि रात के समय ये बाघ जंगल से सटे टिले और उसके आसपास के क्षेत्र में घूमते हैं लेकिन रात ढलते ही ये सभी बाघ नियॉन लाइट्स से सटे कंक्रिट के जंगल यानी भोपाल शहर की चौहद्दी में प्रवेश कर जाते हैं।

मीडिया रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि इस दावे की पुष्टि मध्य प्रदेश वन विभाग की तरफ से भी की जा चुकी है, जब रात के अंधेरे में भोपाल शहर की चौहद्दी के अंदर बाघों की तस्वीरें कैमरे में कैद की गयी थी।
बताया जाता है कि भोपाल में इंसानों की बस्ती से लगभग 20 किमी की दूरी पर ही रातापानी अभयारण्य मौजूद है। इस वजह से बाघों को भोजन की कोई कमी नहीं होती है और बाघों की उपस्थिति से भोपालवासियों को भी कोई समस्या नहीं होती है।
क्या कहना है विशेषज्ञों का?
वर्ष 2017 से भोपाल शहर के बाघों को लेकर शोध कर रहे दुर्गाप्रसाद श्रीवास्तव ने मीडिया से बातचीत में बताया कि भोपाल के दक्षिण का फॉरेस्ट पैच इलाके में लोग पूरे दिन बाईक व गाड़ियों से आवाजाही करते हैं। सिर्फ गाड़ियां ही क्यों, लोग पैदल भी इस इलाके से गुजरते हैं। छुट्टियों के दिनों में जंगल से सटे पिकनिक स्पॉट पर भी लोगों की भीड़ उमड़ती है, शोर-शराबा भी होता है।

दिनभर बाघ इन्हें देखते हैं लेकिन बाहर नहीं निकलते क्योंकि उन्हें पता होता है कि सूरत ढलते ही यह शोर थम जाएगा। वनकर्मी भी सभी लोगों को बाहर निकालकर चेकपोस्ट बंद कर देते हैं। उसके बाद ही इन इलाकों में बाघ बाहर निकलते हैं। बाघ या फिर इंसान कोई भी किसी का रास्ता नहीं काटता है। शिकार के लिए बाघों को जंगल में ही चितल, एंटीलोप और जंगली सुअर आदि जानवर मिल जाते हैं। कभी-कभी जंगल से सटे इलाकों में लोगों के पालतू जानवरों का भी बाघ शिकार कर लेता है, जिसके लिए राज्य सरकार मुआवजा भी देती है।
आंकड़ों पर डाले एक नजर :
- भोपाल शहर का आयतन - 300 वर्ग किमी
- भोपाल में रहने वाले नागरिकों की कुल संख्या - लगभग 25 लाख
- भोपाल के आसपास रहने वाले बाघों की कुल संख्या - लगभग 25
- बाघों का विचरण स्थल - लगभग 150 वर्ग किमी के दायरे में

बताया जाता है कि रातापानी अभयारण्य में फिलहाल लगभग 96 बाघ हैं। इनमें से भोपाल शहर के आसपास घूमने-फिरने वाले बाघों में 3 पुरुष वयस्क बाघ, 5 बाघिन और 17 शावक हैं। इन शावकों में से 6 शावक अब जवान होने वाले हैं।
भोपाल के डीएफओ आलोक पाठक ने मीडिया से बातचीत करते हुए बताया कि भोपाल शहर का दक्षिण पूर्व इलाका, जो जंगल से सटा हुआ है, वहां हमने 18 किमी के क्षेत्र में लगभग 12 फीट ऊंची फेंसिंग लगा रखी है। ताकि बाघ सीधे शहर के अंदर प्रवेश न कर सकें। इससे इंसानों और बाघों के बीच जो संतुलन बना हुआ है उसके बिगड़ जाने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।



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