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केदारनाथ धाम मंदिर के अनसुलझे और अनसुने रहस्य - कोई भी तर्क नहीं सुलझा पायी है ये गुत्थी

उत्तराखंड में स्थित केदारनाथ धाम को लेकर लोगों के मन में अपार श्रद्धा है। हर साल कई महीनों तक चलने वाली केदारनाथ धाम की यात्रा में बड़ी संख्या श्रद्धालु ऊंचे पहाड़ों की चढ़ाई कर बाबा केदारनाथ के दर्शन करने जाते हैं। सिर्फ देश ही नहीं बल्कि केदारनाथ धाम की यात्रा पर बड़ी संख्या में विदेशों से आने वाले श्रद्धालु भी होते हैं।

छोटा चार धाम की यात्रा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा केदारनाथ धाम न सिर्फ पंच केदार बल्कि द्वादश ज्योतिर्लिंग का भी अभिन्न हिस्सा है।

kedarnath dham mandir

केदारनाथ धाम को लेकर लोगों के मन में जितना श्रद्धा का भाव होता है, ठीक उतना ही इसके प्रति कौतूहल भी होता है। दरअसल, केदारनाथ धाम व मंदिर से जुड़े कई ऐसे रहस्य हैं, जिन्हें अगर विज्ञान के तर्क से सुलझाने की कोशिश की जाए तो ये उलझने सुलझने के बजाए और भी उलझती जाती हैं। हम आपको यहां केदारनाथ धाम मंदिर से जुड़े कुछ ऐसे ही रहस्यों से रू-ब-रू करवा रहे हैं।

क्या है केदारनाथ धाम का इतिहास?

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार महाभारत का युद्ध समाप्त होने के बाद जब पांडव स्वर्ग की ओर चल पड़े तो महादेव ने एक भैंसे के रूप में उन्हें दर्शन दिया था। कहा जाता है कि बाद में वह धरती में समा गये। धरती में पूरा समाने से पहले ही भीम ने महादेव को पहचान लिया और उनकी पीछे से उनकी पूंछ पकड़ ली। जिस स्थान पर यह घटना घटी, उसी स्थान को वर्तमान में केदारनाथ धाम के नाम से जाना जाता है। सबसे पहले इस स्थान पर केदारनाथ मंदिर का निर्माण पांडवों ने ही किया था।

kedarnath dham snow

बर्फ में पूरा दब गया था केदारनाथ धाम

मान्यतानुसार पांडवों के निर्माण के बाद यह मंदिर लुप्त हो गया था। इसके बाद लगभग 8वीं सदी में आदिगुरु शंकराचार्य ने इस मंदिर को ढूंढ निकाला और फिर से भगवान शिव के इस मंदिर का निर्माण करवाया। केदारनाथ मंदिर के पीछे ही आदि शंकराचार्य की समाधि है। माना जाता है कि केदारनाथ धाम लगभग 400 सालों तक बर्फ में पूरी तरह से दबा रहा। वैज्ञानिकों का मानना है कि 13वीं सदी से लेकर 17वीं सदी तक छोटा सा हिमयुग आया था। इसी दौरान यह मंदिर बर्फ में पूरी तरह से दबा रहा लेकिन इस वजह से केदारनाथ मंदिर को कोई नुकसान नहीं पहुंचा।

baba kedarnath s doli

6 महीने नहीं बुझता दीपक!

आदि शंकराचार्य के बाद लगातार समय-समय पर इस मंदिर का जीर्णोद्धार होता रहा। कहा जाता है कि पहले 10वीं सदी में मालवा के राजा भोज और बाद में 13वीं सदी में भी इस मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया। केदारनाथ मंदिर के कपाट मई के महीने में खुलते हैं और दीवाली के बाद भाईदूज के समय शीतकाल के लिए केदारनाथ मंदिर के कपाट को बंद कर दिया जाता है।

इस समय भगवान की शीतकालीन गद्दी उखी मठ में होती है, जहां बाबा केदार की चल विग्रह को स्थापित किया जाता है। मान्यता है कि 6 महीने के लिए जब मंदिर को बंद किया जाता है तो मंदिर के गर्भगृह में एक दीपक जला दिया जाता है जो अगले 6 माह तक जलता रहता है। शीतकाल के बाद जब मंदिर के कपाट खुलते हैं तो दीपक भी जलता हुआ ही मिलता है।

आश्चर्य की बात है कि जिस समय मंदिर के कपाट बंद रखा जाता है, तब इस मंदिर के चारों ओर बर्फ की मोटी परत जमी रहती है। यहां किसी भी इंसान का कोई नामोंनिशान नहीं होता फिर भी दीपक कैसे जलता हुआ मिलता है।

मंदिर से क्यों नहीं टकराई भीमशीला?

16 जून 2013 की रात, जब केदारनाथ धाम पर प्रकृति का कहर बरपा था। उस समय आए जल प्रलय ने केदारनाथ घाटी के आसपास के कई गांवों को पूरी तरह से तबाह कर दिया था। केदारनाथ मंदिर के आसपास मौजूद होटल से लेकर घर और दुकान तक, सब कुछ ताश के पत्तों की तरह पानी में बह गया था। लेकिन केदारनाथ मंदिर के किसी भी हिस्से को जरा भी नुकसान नहीं पहुंचा।

आश्चर्य की बात यह भी है, कि पानी के बहाव के साथ पहाड़ी से एक विशालकाय चट्टान मंदिर की तरफ आयी लेकिन मंदिर के ठीक पीछे वह चट्टान रुक गयी। इस चट्टान ने पानी के बहाव को दो हिस्सों में बांट दिया जिससे मंदिर को कोई नुकसान नहीं पहुंचा। इस जल प्रलय ने जहां 10 हजार से भी ज्यादा लोगों की जान पल भर में छिन ली लेकिन मंदिर को जरा भी नुकसान नहीं पहुंचा पायी। क्यों?

kedarnath dham 2013 photo

क्यों वह विशालकाय पत्थर पानी के बहाव में आगे नहीं बढ़ा? क्योंकि अगर वह पत्थर तेज रफ्तार के साथ मंदिर से टकराता तो मंदिर को निश्चित रूप से नुकसान पहुंचता लेकिन इस पत्थर का अंगद के पैरों की तरह मंदिर के पीछे जम जाना ही अपने आप में सबसे बड़ा रहस्य है, जिसे सुलझाया नहीं जा सका है। वर्तमान समय में इस पत्थर को भीमशीला के रूप में पूजा जाता है जो आज भी मंदिर के पीछे मौजूद है।

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