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चित्तौड़ से पहले कौन-कौन सी थी महाराणा प्रताप के मेवाड़ की राजधानियां, कैसे पड़ा चित्तौड़ का नाम!

9 मई 1540 को मेवाड़ के राजपूती राजघराने में उदय सिंह द्वितीय और जयवंता बाई के सबसे बड़े पुत्र प्रताप सिंह का जन्म हुआ। महाराणा प्रताप की वीरता के आगे न तो कोई टिक पाया और न ही उन्होंने कभी भी विपरित परिस्थितियों के सामने अपने घुटने टेके। युद्ध और रणनीति कौशल में पारंगत महाराणा प्रताप की गिनती पहली श्रेणी के राजपूती पराक्रमियों में होती है।

मेवाड़ की रक्षा करते हुए महाराणा प्रताप ने न जाने कितनी लड़ाईयां ही लड़ी थी। साल 1576 में सीमित संसाधनों के साथ भी हल्दीघाटी में मुगल बादशाह अकबर की विशाल सेना के साथ वह भिड़ पड़े थे। जिस समय महाराणा प्रताप ने मेवाड़ की गद्दी संभाली उस वक्त चित्तौड़ मेवाड़ की राजधानी हुआ करता था। लेकिन चित्तौड़ से पहले मेवाड़ की कई और राजधानियां भी रह चुकी हैं।

maharana pratap jayanti

मोहन लाल सुखाडिया विश्‍वविद्यालय के इतिहास विभाग में डॉ. मनीष श्रीमाली ने 'महाराणा प्रताप के व्यक्तित्व' विषय पर शोध किया। मेवाड़ की राजधानी समय-समय पर बदलती रही है। इस शोध के अनुसार चित्तौड़ से पहले महाराणा प्रताप की मातृभूमि मेवाड़ की दो और राजधानियां रह चुकी थी।

मेवाड़ और उसकी राजधानियों के बारे में बात करने से पहले हम आपको उदयपुर राजवंश और उसकी स्थापना के बारे में कुछ जानकारियां दे देते हैं, जो इस शोध के जरिए सामने आयी हैं। शोध के मुताबिक उदयपुर राजवंश, जिसे गुहिलवंश भी कहा जाता है, से ही मेवाड़ में राजाओं की वंशावली शुरू हुई थी।

उदयपुर राजवंश की स्थापना

उदयपुर राजवंश खुद को सूर्यवंशी और रामचंद्र के बड़े बेटे कुश से संबंधित मानता है। इस राजवंश को 'गुहिलवंश या गुहिलोत वंश' भी कहा जाता है। इस शोध के अनुसार ई.सं. 568 के आसपास मेवाड़ में गुहिल नाम का प्रतापी राजा हुआ, जिसके नाम से ही उसका वंश 'गुहिल वंश' कहलाया। उस समय के शिलालेखों में मेवाड़ के राजाओं की वंशावली गुहिल से ही प्रारंभ होती बतायी गयी है। गुहिल से पूर्व की प्रमाणिक जानकारी का अभाव है।

capital of mewar ahar

लेकिन इस बारे में प्रचलित एक अन्य कहानी के अनुसार राजा शीलादित्य की राजधानी वल्लभी पर विदेशियों ने आक्रमण किया था जिसमें शीलादित्य की मृत्यु हो जाती है। उस समय रानी पुष्पावती अंबाजी की यात्रा पर नागदा गांव में थी जहां उन्हें राजा की मृत्यु की खबर मिलती है। उस समय रानी गर्भवती थीं और नागदा गांव में ही उन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया। अपने पुत्र को वह ब्राह्मण विजयादित्य को सौंप कर स्वयं सती हो जाती है। कहा जाता है कि पुष्पावती के इसी पुत्र का नाम गुहिल (गुहदत्त) था जिसने मेवाड़ में गुहिल वंश की नींव रखीं।

गुहिलों की पहली राजधानी - नागदा

शोध में पता चलता है कि मेवाड़ की सबसे पहली राजधानी नागदा थी, जो एकलिंगनाथ जी मंदिर के पास ही स्थित है। नागदा एक समृद्ध एवं बड़ा नगर था जो छठवीं से 13वीं शताब्दी तक मेवाड़ की राजधानी रहा, यद्यपि इस दौरान चित्तौड़ एवं आहाड़ भी मेवाड़ की राजधानी रहे थे। जानकारी के अनुसार नागदा नगर को नागादित्य (626-646) ने बसाया था जिसको संस्कृत शिलालेखों में 'नागहृद' या 'गागद्रह' लिखा है। ' एकलिंग महात्म्यम्' में नागदा को एक प्राचीन और पवित्र नगरी कहा गया है, जिसके अधिष्ठाता देव शिव हैं। यह 2 पहाड़ों के बीच बसा हुआ है।

nagda temple

माना जाता है कि तक्षक नाग द्वारा तक्षक कुण्ड का निर्माण यहीं किया गया था जिस वजह से इस जगह का नाम नागदह माना जाता है। नागदा नगर मेवाड़ की प्राचीन राजधानी होने के साथ ही मेवाड़ महाराणाओं के आराध्य प्रभु एवं राज्य के स्वामी एकलिंगनाथजी का स्थान है। इस वजह से यहां कई निर्माण कार्य हुए जिनके ध्वंसावशेष आज भी मौजूद है। बापा रावल चित्तौड़ के स्वामी होने के बाद नागदा में ही समाधि ली थी, जो आज भी मौजूद है। महाराणा मोकल (1421-1433) ने नागदा के निकट अपने भाई बाघसिंह के नाम से बाघेला तालाब बनवाया, जिससे इस नगर का कुछ अंश जल में डूब गया। नागदा में ही राजस्थान का प्रसिद्ध 'सास-बहू' मंदिर भी मौजूद है।

मेवाड़ की दूसरी सबसे महत्वपूर्ण राजधानी - आहाड़

मेवाड़ राज्य की दूसरी सबसे महत्वपूर्ण राजधानी आहाड़ रही है। यह एक अति प्राचीन नगर है जिसका संबंध ताम्रपाषाण कालीन सभ्यता से रहा है। जैन ग्रंथों तथा प्राचीन शिलालेखों में आहाड़ का नाम आघाटपुट अथवा आटपुर भी मिलता है। आघाट अथवा आहाड़ के संस्थापकों में भर्तृभट्ट (942-943) का पुत्र अल्लट (951-953), जिसे ख्यातों में आलुराव कहते हैं, की गिनती होती है। आहाड़ 2000 ई.पू. के समय से ही समृद्ध कस्बा था, परंतु अल्लट ने इसके महत्व को अपने राज्यकाल की संपन्नता से अधिक बढ़ा दिया था।

ahar

इसलिए इसकी गणना संस्थापकों में की जाती थी। अल्लट के समय प्राप्त शिलालेख में आहाड़ के बराह मंदिर की स्थापना तथा उसके प्रबंध के लिए गोष्ठि का निर्माण तथा मंदिर की व्यवस्था के लिए स्थानीय करों का उल्लेख मिलता हैं। उसके समय में आहाड़ एक अच्छा व्यापारिक केन्द्र भी बन गया था, जहां कर्नाटक, मध्य प्रदेश, लाट, टक्कदेश (पंजाब का एक भाग) आदि से व्यापारी आते-जाते थे। अल्लट के बाद भी मेवाड़ का महत्व बना रहा था। अत: अल्लट के वंशक्रम में आगे शक्ति कुमार (977-993) के समय प्राप्त शिलालेख में राजधानी आहाड़ का महत्व सैनिक छावनी के रूप में था।

शक्तिकुमार के समय परमार शासक मुंज ने मेवाड़ पर आक्रमण कर चित्तौड़ पर अधिकार कर लिया और आहाड़ को नष्ट कर दिया। कुछ समय तक परमारों का मेवाड़ पर अधिकार कायम रहा। गुहिल वंश के शासक वैर सिंह (1103-1107) ने परमारों से आहाड़ लेकर उसके चारों ओर शहरपनाह और दरवाजे बनाकर अपनी शक्ति को सुदृढ़ किया। वैर सिंह के उत्तराधिकारी विजय सिंह (1107-1127) के पालड़ी और कदमाल के भूमिदान से प्रतीत होता है कि गुहिलों का आहाड़ के आस-पास के भागों पर पुनः अधिकार हो गया था।

maharana pratap jayanti 2024

इस समय तक गुहिल शक्तिशाली भी हो गए थे। इस प्रकार गुहिलों ने 13वीं सदी के प्रारम्भिक काल तक, मेवाड़ में कई उथल-पुथल होने पर भी अपने कुल परम्परागत राज्य को बनाए रखा। कभी उनके हाथ से चित्तौड़, कभी आहाड़ और कभी नागदा भी निकलते रहे, परन्तु फिर भी उन्होंने हिम्मत न हारी और धीरे-धीरे एक-एक भाग को वे अपने अधीन करते रहे। शोध में पता चलता है कि ऐसी स्थिति बनने में सोलंकियों, परमारों और चौहानों की निर्बलता भी एक बहुत बड़ा कारण था।

केवल चित्तौड़ इनके अधिकार में पूरी तौर से न आ सका जिस पर विजय प्राप्त करने का श्रेय पद्म सिंह (1211-1213) के पुत्र जैत्र सिंह (1213-1253) को जाता है। चूंकि इस समय इल्तुतमिश के आक्रमण से नागदा नगर नष्ट हो चुका था अतः चित्तौड़ ही गुहिलों की मुख्य राजधानी बन गई थी।

आहाड़ मेवाड़ की राजधानी होने के साथ ही एक प्राचीन सभ्यता का केन्द्र और पवित्र तीर्थ स्थल भी है। यहाँ गंगोद्भेद नामक एक पुरातन तीर्थरूप चतुरस्त कुंड है जिसका उल्लेख भर्तृभट्ट के शिलालेख में भी मिलता है। कुंड के निकट ही महाराणाओं का दाहस्थान है, जिसको यहां 'महासती' कहते हैं। महाराणा प्रताप के बाद कई राणाओं का अंत्येष्टि संस्कार यहीं हुआ था। आहाड़ सांस्कृतिक दृष्टि से भी समृद्ध रहा था।

चित्तौड़ को मिला अपना नाम

वीरता और शौर्य की क्रीड़ास्थली एवं त्याग व बलिदान का पावन तीर्थ एवं राजस्थान का गौरव चित्तौड़ उदयपुर से पूर्व तक मेवाड़ के गुहिल वंश की प्रमुख राजधानी रही है। चित्तौड़ दुर्ग का निर्माण मौर्य राजा चित्रांगद ने करवाया था तथा अपने नाम पर इसका नाम चित्रकोट रखा था, जिसका अपभ्रंश चित्तौड़ कहलाया है।

chittorgarh fort

पहले चित्तौड़ और बाद में उदयपुर बनीं राजधानी

विक्रम संवत् 8वीं शताब्दी के अंत में मेवाड़ के गुहिलवंशी राजा बापा ने राजा मान मौर्य को परास्त कर चित्तौड़ पर अधिकार कर लिया। इस समय से लेकर लगभग 800 वर्षों के लंबे समय तक यह मेवाड़ की राजधानी रहा। हालांकि बीच में कुछ समय के लिए मालवा के परमार राजा मुंज तथा बाद में गुजरात के सोलंकी राज जयसिंह सिद्धराज का अधिकार चित्तौड़ पर रहा था। चित्तौड़ को मुस्लिम आक्रमणों का भी सामना करना पड़ा था।

मुस्लिम आक्रमण में पहला भयंकर आक्रमण अलाउद्दीन खिलजी का हुआ जिसने गुहिलों की रावल शाखा का अंत ही कर दिया था। दूसरा व तीसरा मुस्लिम आक्रमण क्रमश: 1534 ई. में गुजरात के सुल्तान बहादूरशाह एवं 1567 ई. में अकबर का आक्रमण था। प्रथम दो मुस्लिम आक्रमण के बाद पुनः चित्तौड़ गुहिलों की राजधानी बन गई थी। किंतु अकबर के आक्रमण के बाद अब गुहिलों की राजधानी चित्तौड़ से हटकर उदयपुर बन गया।

राणा कुंभा के शासनकाल (1433-1468 ई.) में चित्तौड़ अपनी समृद्धि और कीर्ति की पराकाष्ठा पर पहुंचा। कुंभा ने चित्तौड़ के प्राचीन किले का जीर्णोद्धार करवाया तथा उसकी सुदृढ़ प्राचीर, उन्नत बुर्जों व विशाल प्रवेश द्वारों का निर्माण करवाकर एक अभेद्य दुर्ग बना दिया। उन्होंने चित्रकुट दुर्ग को भी विचित्रकुट अर्थात् रहस्मय और दुर्भेद्य किला बना दिया। चित्तौड़ दुर्ग बेहद मजबूत और दुर्भेद्य किला था जिसे जीतना शत्रु के लिए काफी मुश्किल था।

लेकिन चित्तौड़ दुर्भेद्य तभी तक बना रह सका था जब तक कि युद्ध प्रणाली में तोपों का प्रयोग शुरू नहीं हो गया था। 1534 के गुजरात व 1567 के अकबर के आक्रमण ने चित्तौड़ की अभेद्यता पर प्रश्न चिह्न लगा दिए थे। राजपूत वीरों ने भी बदलते युग और तकनीक के अनुरूप सुरक्षा के उपायों में भी परिवर्तन किया। महाराणा उदयसिंह द्वारा उदयपुर को राजधानी के रूप में चुनना इसका सबसे उपयुक्त उदाहरण है।

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