महाराणा प्रताप की गौरव गाथा से आज भारत का बच्चा-बच्चा परिचित है। राणा सांगा के पौत्र और महाराणा उदय सिंह के पुत्र महाराणा प्रताप को राजस्थान का वीर शिरोमणी कहा जाता है। राजस्थान और मेवाड़ की गौरव गाथा जब भी गायी जाती है, उसमें महाराणा प्रताप (1572-1597) का उल्लेख जरूर आता है।
9 मई को महाराणा प्रताप की जयंती धुमधाम से मनायी जाएगी। क्या आप जानते हैं महाराणा प्रताप किसके गुणगान गाते थे? किसी भी युद्ध में जाने से पहले महाराणा प्रताप किसके दर्शन करने जाते थे? अपने जीवन के हर छोटे-बड़े फैसलों से पहले महाराणा प्रताप एकलिंगनाथ जी की शरण में जाते थे, जिन्हें मेवाड़ राज्य के महाराणाओं और राजपूतों का कुल देवता माना जाता है।
बॉलीवुड की कई फिल्मों में भी महाराणा प्रताप की एकलिंगनाथ जी पर गहरी आस्था का सटिक चित्रण किया जा चुका है। लेकिन वह सिर्फ एकलिंगनाथ जी ही नहीं बल्कि कई अन्य मंदिरों में भी नियमित रूप से दर्शन करने जाया करते थे।
मोहन लाल सुखाडिया विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में डॉ. मनीष श्रीमाली द्वारा "महाराणा प्रताप और उनके व्यक्तित्व" पर किये गये शोध के अनुसार मेवाड़ में कई प्राचीन मंदिर ऐसे भी हैं, जहां महाराणा प्रताप के दर्शन व पूजा करने के लिए जाने की प्रबल संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता है। इस शोध के मुताबिक पूरे मेवाड़ क्षेत्र में 1000 से भी ज्यादा मंदिर हैं। इनमें से अधिकांश मंदिरों का निर्माण प्राचीन वास्तु परंपरा एवं हिन्दू धार्मिक ग्रंथो के अनुसार ही हुआ है।
मेवाड़ में स्थित प्राचीन प्रमुख मंदिर, जहां महाराणा प्रताप भी दर्शन व पूजा करने के लिए जाते थे -
1. एकलिंगनाथ जी का मंदिर
उदयपुर से 13 मील उत्तर कैलाशपुरी गांव में एकलिंग जी का प्रसिद्ध मंदिर है, जो दो पहाड़ियों के बीच में बना हुआ है। कहा जाता है कि एकलिंग जी मेवाड़ राजवंश के इष्टदेव है एवं मेवाड़ राजवंश के स्वामी भी है। मान्यता है कि मेवाड़ के महाराणा एकलिंग जी के दीवान के रूप में शासन करते हैं। एकलिंगनाथ जी मंदिर का निर्माण मंदिर नगर शैली के आधार पर किया गया है। मंदिर के अहाते में ही छोटे-बड़े लगभग 108 मंदिर हैं।
मुख्य मंदिरों में विष्णु मंदिर, लक्ष्मीनारायण मंदिर, सीताराम तथा गणपति का मंदिर मुख्य है। मंदिर के पीछे परकोटे के बाहर हारीत राशि की गुफा, हारीत राशि की मूर्ति एवं विन्ध्यवासिनी देवी की प्राचीन मूर्तियां एवं मंदिर बने हुए है। एकलिंगजी के मंदिर के दक्षिण में लकुलीश का मंदिर हैं जिसका निर्माण 971 ई. में पाशुपत सम्प्रदाय के साधुओं द्वारा की करवाया गया है।
जनश्रुति है कि सर्वप्रथम बापा ने ही अपने अधिष्ठाता देव एकलिंगजी के मंदिर निर्माण करवाया था। पता चलता है कि यह अपनी प्रारंभिक अवस्था में एक सामान्य मंदिर रहा होगा किंतु समय-समय पर शत्रुओं के आक्रमण ने इसे काफी नुकसान पहुंचाया है। मंदिर के जीर्णोद्धार के कारण इसका रूप परिवर्तित होता रहा है। महाराणा मोकल (1421-1433) ने एकलिंगजी मंदिर की सुरक्षा हेतु किलेनुमा परकोटा बनाया तथा तीन द्वार बनवाये। महाराणा कुंभा ने एकलिंग मंदिर जो खण्डित हो गया था उसे मण्डप, तोरण, ध्वजादण्ड और कलशों से अंलकृत किया तथा एकलिंग मंदिर के पूर्व में कुभं श्याम (विष्णु मंदिर ) के मंदिर का निर्माण किया।
वर्तमान में मंदिर का जो स्वरूप है, बहुत हद तक उसका निर्माण महाराणा रायमल (1473-1509) के समय हुआ था। एकलिंगजी के पाषाण निर्मित प्रासाद एवं प्राचीन पूजा विधान की जीवित समृद्ध परंपरा की वजह से आज भी आमजन को मेवाड़ के गौरवशाली अतीत से परिचित होने का अवसर मिल पाता है।
नागदा
गुहिल वंश (मेवाड़ राजवंश) की प्रांरभिक राजधानी एवं बापा रावल की कर्म-स्थली नागदा ही था। यहां मंदिरों के प्रारंभिक पुरावशेष प्राप्त होते हैं। प्राचीन काल में अनेक शिव, विष्णु एवं जैन आदि के मंदिर बने हुए थे, जिनमें से कई अभी तक विद्यमान है। नागदा के मंदिरों में सर्वाधिक प्रसिद्ध सास-बहु का मंदिर है। अमरकाव्यम् में इसके निर्माता कुंभा की माँ एवं पत्नी को बताया है किंतु पुरात्वेत्ता इसका समय 11वीं शती बताते हैं। सास-बहु मंदिर पंचायतन श्रेणी के विष्णु मंदिर है। दोनों ही मंदिरो के शिखर ईंटो के बने थे। दोनों मंदिरो के गर्भ गृह में बहुत कम प्रतिमाएँ जड़ी है।
मंदिर में राम, बलराम शिव, विष्णु एवं ब्रह्मा का पर्याप्त चित्रांकन किया गया है। यहाँ से मिली तीन प्रतिमाएँ कला की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है- आसनस्थ हरिहर आसनस्थ, त्रिमुखी विष्णु (नृसिंह-वराह - विष्णु) आसनस्थ अर्थ नारीश्वर प्रमुख हैं। इसकी एक अन्य महत्वपूर्ण कृति इसका हिण्डोला तोरण द्वार है। नागदा परिक्षेत्र में मंदिर निर्माण की समृद्ध परंपरा दृष्टिगत होती हैं। यहाँ ई. सन् 6 शती से 10-11 शती तक देवालयों के निर्माण में स्थानीय पत्थरों के प्रयोग के साक्ष्य और मंदिर निर्माण में सफेद पत्थरों का प्रयोग होने लगा था।
बाड़ोली के मंदिर
मेवाड़ में ही नहीं, किंतु भारतवर्ष में भी कारीगरी के विचार से बाड़ोली के मंदिरों (चितौड़गढ़) की समता करने वाला आबू के प्रसिद्ध जैन मंदिरों तथा नागदा के मंदिरों को छोड़कर और कोई नहीं है। इनमें मुख्य घटेश्वर का सास-बहू शिवालय है। घटेश्वर मंदिर के गर्भगृह के ऊपर संतुलित पंचरथ शिखर है, एक सीढ़ीयुक्त व गोल छत से युक्त अंतराल और मंडप कोण स्तूपाकार छत से युक्त है।
मंडप में मकर तोरण द्वार से प्रवेश किया जाता है। बताया जाता है कि अप्सरा-आकृतियों की डिजाइन, मकर तोरण स्तंभों की व्यवस्था, आंतरिक छत व शिखर से युक्त यह मंदिर खजुराहों के लक्ष्मण मंदिर के समान है। यह मंदिर 9वीं सदी के अंतिम चरण में निर्मित प्रतीत होता है।
अंबिका माता का मंदिर, जगत
जगत का अंबिका माता मंदिर उदयपुर में अरावली की पहाड़ियों के मध्य स्थित है। अंबिका माता मंदिर डिजाइन में उत्कृष्ट एवं वर्णित मंदिरों के अलंकरणों से युक्त है। यह थोड़ा विकसित भी है। मंदिर के चारों दिशाओं और कोणों पर क्रमश: स्त्री-आकृतियों और शासकों की मूर्तियां मिलती हैं, जो वेदिकाओं से घिरे हैं जैसे कि खजुराहों में पाई गयी है।
इस मंदिर का निर्माण 925 ई. के आसपास हुआ बताया जाता है। कुछ लोग इसे 'शाक्त' के स्थान पर "तंत्र" से जोड़ते हैं किंतु जब इसके स्थापत्य को देखते हैं इसमें हिंदू स्थापत्य के पांचों मूलभूत तत्व दिखाई देते हैं जो इसे शाक्त का बताते हैं।

कुंभा कालीन मंदिर
मेवाड़ में मंदिर निर्माण की समृद्ध परंपरा रही है। यहाँ विभिन्न शासकों के काल में विभिन्न धर्मो व विभिन्न देवताओं के मंदिरों का निर्माण हुआ है। यहाँ शैव वैष्णव मंदिर के साथ ही सूर्य मंदिर एवं जैन मंदिरों का निर्माण भी बहुतायत में हुआ है। कुंभा का काल (1433-1468) मंदिर स्थापत्य की दृष्टि से भी अद्भूत था। इनके राज्य काल में कई प्रमुख हिंदू व जैन मंदिर बने।
उनमें सबसे प्रमुख उनके आराध्य देव विष्णु के मंदिर प्रमुख है। विष्णु के मंदिर कुंभश्याम मंदिर के नाम से जाने जाते हैं। कुंभा ने चितौडगढ़', कुंभलगढ एवं अचलगढ़ तीनों दुर्गों में कुंभ श्याम मंदिर का निर्माण किया। कुंभा द्वारा कीर्ति स्तंभ को उपेन्द्र नाथ डे ने तो विष्णुस्तंभ ही कहा क्योंकि इसके प्रवेश द्वार पर विष्णु की प्रतिमा स्थापित है।
कुंभा के काल में जैनों को खूब सरंक्षण मिला यहीं वजह है कि इस समय कई जैन मंदिरों का निर्माण भी हुआ। कुंभाकालीन जैन मंदिरों में सर्वप्रथम रणकपुर का जैन मंदिर है। रणकपुर के जैन मंदिर में कुल पांच मंदिर है जिनमें से 4 मंदिर है : आदिनाथ, पार्श्वनाथ, शांतिनाथ व सूर्य मंदिर था। रणकपुर के इस चौमुखा मंदिर का निर्माण हिंदू मंदिर वास्तु शैली 'नलिनी गुल्मा प्रसाद' शैली के आधार पर हुआ हैं।
रणकपुर के सूर्य मंदिर का निर्माण कुंभा की इच्छा पर करवाया गया था। यहां सूर्य की 60 प्रतिमाएं हैं। मेवाड़ में चितौड़ व कुंभलगढ़ दुर्ग में भी सूर्य मंदिर हैं। चित्तौड़ में स्थित कालिका माता मंदिर प्राचीन सूर्य मंदिर था जिस परिवर्तित कर कालिका माता मंदिर बना दिया गया। कहा जाता है कि कुंभा के काल में यहां 700 जैन मंदिर था।



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