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कौन है मुंबई का सबसे पुराना गणेशोत्सव मंडल? कहां हुआ था पहला सार्वजनिक गणेशोत्सव आयोजित?

मुंबई में गणेश चतुर्थी को लेकर तैयारियां अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुकी है। अलग-अलग पूजा पंडालों में विघ्नहर्ता प्रथम पूज्य भगवान गणेश की आकर्षक मूर्तियों के पहुंचने का सिलसिला भी शुरू हो चुका है। इस साल गणेश चतुर्थी का उत्सव 7 सितंबर से मनाया जाएगा। मुंबई और महाराष्ट्र में जितने उत्साह के साथ बड़े पैमाने पर गणेशोत्सव मनाया जाता है, उस तरह देश के किसी भी और राज्य में नहीं मनाया जाता है।

पूरे महाराष्ट्र में 10 लाख से भी ज्यादा छोटे-बड़े गणेशोत्सव मंडल हैं जो 10 दिनों तक गणेश चतुर्थी का त्योहार मनाने में जी-जान से जुटे रहते हैं। कहा जाता है कि बाल गंगाधर तिलक ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई के एक हथियार के तौर पर सार्वजनिक गणेशोत्सव की शुरुआत की थी।

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लेकिन महाराष्ट्र में सार्वजनिक गणेशोत्सव पहली बार कब मनाया गया था? क्या बाल गंगाधर तिलक से पहले महाराष्ट्र में सार्वजनिक तौर पर गणेश चतुर्थी का त्योहार नहीं मनाया जाता था? किसने सबसे पहले सार्वजनिक गणेशोत्सव की शुरुआत की थी?

आइए इन सभी सवालों के जवाब एक-एक कर ढूंढते हैं :

किसने की थी सार्वजनिक गणेशोत्सव की शुरुआत?

मुंबई में या यूं कहे महाराष्ट्र में पहली बार सार्वजनिक गणेश चतुर्थी की शुरुआत स्वतंत्रता सेनानी बाल गंगाधर तिलक ने वर्ष 1893 में की थी। उस समय उन्होंने गणेश चतुर्थी को अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लोगों को एक धागे में बांधने के लिए एक मजबूत धागे के तौर पर की थी। उस समय उनका साथ मुंबई के गिरगांव में मौजूद केशवजी नायक चौल में रहने वाले कुछ व्यक्तियों और पुणे के कुछ लोगों ने दिया था।

जिसके बाद सार्वजनिक रूप से मुंबई और पुणे के अलावा दूसरी जगहों पर भी गणेशोत्सव को मनाए जाने की शुरुआत हुई। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या उससे पहले महाराष्ट्र में गणेश चतुर्थी का उत्सव नहीं मनाया जाता था और किसने अंग्रेजों के खिलाफ जाकर सार्वजनिक गणेशोत्सव मनाने के तिलक के आइडिया का किया था समर्थन?

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कहां और किसने पहली बार आयोजित किया था गणेशोत्सव?

महाराष्ट्र में पहली बार सार्वजनिक तौर पर गणेशोत्सव मनाने की हिम्मत श्री सार्वजनिक गणेशोत्सव संस्थान ने की थी। संस्थान के आधिकारिक वेबसाइट से मिली जानकारी के अनुसार बाल गंगाधर तिलक के प्रोत्साहन से पहली बार मुंबई, गिरगांव के केशवजी नायक चौल के निवासियों और पुणे निवासी श्री भाऊ रनगारी, श्री खजगीवाले और श्री घोटवाडेकर ने सार्वजनिक गणेशोत्सव की शुरुआत वर्ष 1893 में की थी।

वर्ष 1894 से धीरे-धीरे गणेश चतुर्थी का उत्साह महाराष्ट्र के दूसरे शहरों में भी फैलने लगा और साल-दर-साल गणेशोत्सव आयोजित करने वाले मंडलों की संख्या भी बढ़ती गयी। इस तरह से कहा जा सकता है कि महाराष्ट्र में सार्वजनिक गणेशोत्सव का त्योहार पिछले 132 सालों से मनाया जा रहा है।

क्या उससे पहले नहीं होता था गणेशोत्सव?

ऐसे में आपके मन में यह सवाल जरूर आया होगा कि क्या वर्ष 1893 से पहले महाराष्ट्र में सार्वजनिक तौर पर गणेश उत्सव का आयोजन नहीं किया जाता था? दरअसल, उक्त संस्थान के आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार महाराष्ट्र में जब पेशवाओं का राज था, तब गणेश चतुर्थी का त्योहार सार्वजनिक रूप से मनाया जाता था। पेशवाओं के कुल देवता भगवान गणेश को ही माना जाता था। इसलिए भाद्रपद की पहली तारीख से लेकर अनंत चतुर्दशी तक गणेशोत्सव का आयोजन बड़े ही धूमधाम से किया जाता था।

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उस समय इस उत्सव का आयोजन धनी और जरूरतमंद दोनों तरह के परिवारों में समान उत्साह के साथ किया जाता था। लेकिन वर्ष 1815 में पेशवा के जमाने में जब बाजीराव II का शासनकाल था, तब आखिरी बार सार्वजनिक रूप से गणेश चतुर्थी का आयोजन किया गया था। वर्ष 1818 में पुणे के शनिवार वाड़ा पर ब्रिटिश झंडा फहराया गया और उस समय से फिर सार्वजनिक रूप से गणेशोत्सव नहीं मनाया गया।

उक्त संस्थान का कहना है कि अंग्रेजों ने शनिवार वाड़ा से जो बेशकीमती वस्तुएं चुराई थी उनमें शुद्ध सोने से बनी भगवान गणेश की एक मूर्ति भी थी, जिसकी आंखों में चुन्नी (रुबी) और मूर्ति पर हीरे जड़े हुए थे। कहा जाता है कि उस समय इस मूर्ति की कीमत लगभग 50,000 रुपए थी। पेशवा का शासनकाल खत्म होने के बाद यानी वर्ष 1818 से लेकर 1892 तक गणेशोत्सव का आयोजन सिर्फ पारिवारिक रूप से किया जाता था। इसे सार्वजनिक रूप से फिर से मनाने की शुरुआत बाल गंगाधर तिलक के प्रोत्साहन के बाद वर्ष 1893 में हुई।

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