श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के कुछ दिनों बाद ही भाद्रपद शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को बरसाना में उनकी प्रिय सखी राधा रानी का जन्मोत्सव मनाया जाता है। इस दिन को राधाष्टमी के नाम से जाना जाता है। इस साल 11 सितंबर यानी आज राधाष्टमी मनाया जा रहा है। आज हम आपको श्रीराधा-कृष्ण के एक ऐसे मंदिर के बारे में और उसके इतिहास के बारे में बताने वाले हैं, जो संभवतः दुनिया का इकलौता मंदिर है जहां राधाकृष्ण के साथ रुक्मिणी की भी पूजा होती है।
ऐसा क्यों होता है, इसकी एक बड़ी ही दिलचस्प वजह है। सिर्फ इतना ही नहीं, यह मंदिर झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का मायका भी कहलाता है जबकि इसकी स्थापना उनकी सास ने की थी। ऐसा भला क्यों होता है, वजह जानकर हैरान रह जाएंगे आप।

मुरली मनोहर मंदिर और उससे जुड़ी दिलचस्प जानकारियों के लिए विस्तार से पढ़ें -
बरसाना में उमड़ी भक्तों की भीड़
राधाष्टमी के मौके पर बरसाना के ब्रह्माचल पर्वत पर राधारानी लाडली मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ रही है। इस मंदिर को श्री जी दरबार के नाम से भी जाना जाता है। पूरे साल में राधाष्टमी ही वह खास दिन होता है, जब बरसाना के इस मंदिर में राधारानी के दिव्य चरणओं के शुभ दर्शन होते हैं। साल के दूसरे सभी दिन राधा जी के पैर ढंके रहते हैं। मंदिर में अहले सुबह पंचामृत अभिषेक के साथ उनके जन्मोत्सव की शुरुआत हुई। कुछ ऐसा ही उत्साह राधा-कृष्ण के सभी मंदिरों में होता है। चलिए अब मुरली मनोहर मंदिर के बारे में विस्तार से जान लेते हैं।
राधाकृष्ण के साथ होती है रुक्मिणी की भी पूजा
दुनियाभर के लगभग सभी मंदिरों में श्रीकृष्ण के साथ उनकी प्रिय सखी श्रीराधा की पूजा होती है। लेकिन उत्तर प्रदेश के झांसी में मौजूद मुरली मनोहर मंदिर संभवतः दुनिया का इकलौता ऐसा मंदिर है, जहां राधाकृष्ण के साथ-साथ देवी रुक्मिणी की पूजा होती है। यह मंदिर अपनी इसी विशेषता की वजह से दुनिया में लोकप्रिय है। जन्माष्टमी हो या राधाष्टमी इन अवसरों पर मंदिर में भगवान के दर्शन करने के लिए दूर-दूर से लोग यहां पहुंचते हैं।
क्या है इस मंदिर का इतिहास?
झांसी के बड़े बाजार क्षेत्र में स्थित मुरली मनोहर मंदिर की स्थापना रानी लक्ष्मीबाई की सास और महाराज गंगाधर राव की माताजी ने करवाया था। News18 Local से बात करते हुए मंदिर के पुजारी वसंत गोलवलकर ने बताया कि इस मंदिर का निर्माण 1780 में शुरू हुआ था और 5 वर्ष बाद 1785 में मंदिर का निर्माण कार्य पूरा हुआ, जिसके बाद मंदिर में सभी प्रतिमाओं की स्थापना की गयी। बताया जाता है कि मंदिर के पहले पुजारी रामचंद्र राव प्रथम थे जो मराठा राजवंश के राजपुरोहित थे।

क्यों होती है राधाकृष्ण के साथ रुक्मिणी की भी पूजा?
मंदिर के पुजारी गोलवलकर ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि इस मंदिर में राधारानी के साथ देवी रुक्मिणी की पूजा एक खास वजह से होती है। दरअसल, इस मंदिर में दोनों की पूजा उत्तर और दक्षिण को एक साथ लाने के प्रयास के रूप में की जाती है। उत्तर भारत में राधा रानी की पूजा सबसे ज्यादा होती है और दक्षिण भारत में रुक्मिणी की होती है। इसलिए इस मंदिर में श्रीकृष्ण के साथ राधा-रुक्मिणी की पूजा कर उत्तर और दक्षिण को एक डोर में बांधने का प्रयास किया गया है। बताया जाता है कि इस मंदिर में श्रीकृष्ण के दायीं ओर राधा रानी और बाईं ओर रुक्मिणी की प्रतिमा स्थापित है।
क्यों कहलाता है लक्ष्मीबाई का मायका?
जब गंगाधर राव की आयु 27 वर्ष हो गयी तो उनकी माता ने राजपुरोहित रामचंद्र राव प्रथम को उनके लिए किसी मराठा परिवार की लड़की को चुनने की जिम्मेदारी सौंपी। राजपुरोहित, जो रिश्ते में लक्ष्मीबाई के मौसा लगते थे, ने अपने साढू भाई मोरोपंत तांबे की बेटी मनु बाई का विवाह गंगाधर राव से करने का फैसला लिया और मनु लक्ष्मीबाई बनकर झांसी आ गयी।
बेटी मनु की शादी के बाद उनके पिता मोरोपंत तांबे भी झांसी आ गये और मुरली मनोहर मंदिर में रहने लगे। बताया जाता है कि मंदिर के ऊपरी तल पर बने बड़े कक्ष में मोरोपंत रहा करते थे। रानी लक्ष्मीबाई भी अक्सर राधाकृष्ण के दर्शन करने और पिता से मिलने इस मंदिर में आया करती थी। इस वजह से ही मुरली मनोहर मंदिर को रानी लक्ष्मीबाई का मायका कहा जाता है।



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