हाल ही में एक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने ट्रेन हादसों और उनके आपसी टक्कर को रोकने के लिए भारतीय रेलवे की 'कवच प्रणाली' (Kavach System) की तारीफ करते हुए इसे भारतीय रेलवे के इतिहास में मील का पत्थर करार दिया है। मामले की सुनवाई के दौरान सु्प्रीम कोर्ट ने रेल हादसों को रोकने की दिशा में केंद्र सरकार द्वारा उठाये गये कदम पर अपना संतोष व्यक्त किया है।
सुप्रीम कोर्ट ने कवच प्रणाली पर दी गयी अपनी टिप्पणी में कहा, "हम भारतीय रेलवे द्वारा उठाये गये कदमों की सराहना करते हैं। हम संतुष्ट हैं कि सार्वजनिक हित में भारत और भारतीय रेलवे ने इस तरह के कदम उठाए हैं।" लेकिन इतनी देर से हम भारतीय रेलवे की जिस महत्वपूर्ण प्रणाली कवच के बारे में बात कर रहे हैं, आखिर वह है क्या और काम कैसे करता है?

आइए इसके बारे में विस्तृत जानकारी पर डालते हैं एक नजर -
कवच बनाने का फैसला कब लिया गया?
रेलवे दुर्घटनाओं और ट्रेनों की सीधी टक्कर को रोकने के लिए एक प्रणाली होनी चाहिए, इस बारे में सबसे पहले साल 2012 में सोचा गया था। उस समय इसे ट्रेन कोलिशन अवॉयडेंस सिस्टम के रूप में बताया गया था। समय के साथ इसमें बदलाव किया गया और इस प्रणाली को और बेहतर बनाकर इसे ऑटोमेटिक ट्रेन प्रोटेक्शन सिस्टम यानी कवच में परिवर्तित किया गया। रिचर्स डिजाइन एंड स्टैंडर्ड ऑर्गनाइजेशन के साथ मिलकर भारतीय रेलवे ने अपनी सुरक्षात्मक प्रणाली को बेहतर बनाया जो आज कवच के रूप में हमारे सामने है।
कैसे काम करता है कवच?
कवच के बारे में सबसे दिलचस्प और महत्वपूर्ण जो फिचर है, वो यह कि इसमें खुद-ब-खुद ब्रेक लग जाने की क्षमता है। इतना ही नहीं ट्रेन को चलाते समय लोको पायलट निर्धारित स्पीड से ही ट्रेन को चलाए, इसे भी यह सुनिश्चित करता है।
इस वजह से किसी भी आपातकाल या सीधी टक्कर की स्थिति में यह ट्रेन के यात्रियों समेत रेलवे के सभी कर्मचारियों की सुरक्षा को भी सुनिश्चित कर पाता है। कवच ट्रेन की इंजन में लगने वाला एक प्रणाली है, जिसका सबसे पहले ट्रायल रन फरवरी 2016 में किया गया था। जुलाई 2020 में इसे पूरी तरह स्वीकार करते हुए काम में लगाया जाने लगा।
कवच के टेक्नीकल तत्व :

रेडियो फ्रिक्वेंसी आईडेंटिफिकेशन (RFID) टैग : ये छोटे इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस की तरह होते हैं, जो पटरियों के किनारे चलती रेलों पर लगायी जाती हैं। ये RFID तकनीक का उपयोग कर बिना छुए रेडियो तरंगों का संचार करती हैं।
क्या काम करता है : RFID टैग पटरी पर तेज गति से दौड़ रही ट्रेन के लोको मोटिव तक पटरी की स्थिति, गति की सीमा और दूसरी जानकारियों को सटिकता के साथ पहुंचाने का काम करता है।
RFID रिडर : यह ट्रेन के इंजन यानी लोकोमोटिव में लगा होता है, जो RFID सिग्नल को पकड़ता और उन्हें पढ़कर पटरियों पर लगे RFID टैग द्वारा भेजे गये संदेश की जानकारी देता है।
कम्प्यूटर सिस्टम : लोकोमोटिव में एक कम्प्यूटर भी होता है जिसकी जिम्मेदारी प्राप्त जानकारी को अच्छी तरह से समझकर सुरक्षा से जुड़ी जानकारियों से ड्राईवर को अवगत कराना होता है।
ब्रेक इंटरफेस इक्विपमेंट : यह ट्रेन की ब्रेकिंग सिस्टम से सीधा जुड़ा होता है, जो ट्रेन की गति बढ़ जाने या किसी भी अन्य सुरक्षात्मक परिस्थिति में ट्रेन में खुद से ब्रेक लगा देने की क्षमता रखता है।
UHF और GSM रेडियो लिंक : इस लिंक का काम चलती ट्रेन के लोकोमोटिव और कंट्रोल रूम (सेंट्रल मॉनिटरिंग संचरना) के बीच संपर्क को हर वक्त बनाए रखना। इस लिंक की मदद से सभी प्रकार के डाटा, आदेशों और ट्रेन के स्टेटस से संबंधित जानकारियों का लोकोमोटिव और रेलवे नेटवर्क के बीच आदान-प्रदान होता है।
रेडियो संचरना : यह रेलवे स्टेशनों पर लगे टावर और मोडेम होते हैं, जिन्हें ट्रेन और रेलवे कंट्रोल रूम के बीच संपर्क को बनाए रखने, डाटा व आदेशों का आदान-प्रदान को बिना किसी बाधा के सुनिश्चित करवाने के लिए लगाया जाता है।
केंद्रीय मॉनिटरिंग
कवच एक श्रृंखलाबद्ध मॉनिटरिंग सिस्टम है, जो ट्रेनों की गतिविधियों पर केंद्रीयकृत रूप से निगरानी करता है। यह सिस्टम लोको पायलट को 'लाल सिग्नल', जरूरी होने पर ऑटोमेटिक ब्रेक लगाना, गति पर नियंत्रण रखने से संबंधित सूचना आदि के बारे में जागरुक करता रहता है।
अगर किसी कारणवश आपातकाल की स्थिति में सिस्टम के विफल होने की स्थिति में यात्रियों और ट्रेन में सवार रेलवे दल की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए भी कवच इमरजेंसी ब्रेक लगा सकता है।
ट्रेनों में कवच प्रणाली का इस्तेमाल शुरू होना निश्चित रूप से भारतीय रेलवे के लिए एक मील का पत्थर है। यह एक एडवांस्ड और सबसे महत्वपूर्ण रूप से ट्रेनों की सीधी टक्कर, किसी भी मानवीय भूल से ट्रेनों का दुर्घटनाग्रस्त होने जैसी संभावनाओं को कम कर रेलवे को 'जीरो एक्सीडेंट' का लक्ष्य हासिल करने में मदद कर रहा है।



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