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रामलला के लिए अयोध्या आयी बहन शांता की भेजी रेशम के धागों वाली राखी, जानिए क्या है यह परंपरा!

रक्षाबंधन के दिन किसी भी भाई की कलाई कभी भी सूनी नहीं रहती है। प्यार से बांधी गयी बहन की राखी इस दिन भाईयों की कलाईयों की शोभा को कई गुना बढ़ा देती है। ऐसे में भला अयोध्या में रामलला (बालक राम) की कलाई कैसे सुनी रह सकती है। देशभर के अलग-अलग जगहों के बहनों ने अयोध्या में रामलला के लिए राखियां भेजी है।

इसके साथ ही भगवान श्रीराम की बड़ी बहन यानी माता शांता के आश्रम से भी रामलला के लिए रेशम के धागों वाली राखी भेजी गयी है। सिर्फ रामलला ही नहीं, ये राखियां सभी चारों भाईयों और उनकी पत्नियों के लिए आया है।

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कौन है शांता?

बालक राम के लिए आयी राखियों और उपहारों के बारे में बात करने से पहले आपको बता दें कि शांता कौन हैं? दरअसल, शांता राजा दशरथ और माता कौशल्या की सबसे बड़ी पुत्री थी। महारानी कौशल्या की बहन वर्षिणी और उनके पति रोमपाद, जो अंग देश के राजा थे, निःसंतान थे।

शांता के जन्म के बाद उन्होंने शांता जैसी ही एक पुत्री की कामना की थी। इसलिए महाराज दशरथ और महारानी कौशल्या ने शांता को उन्हें गोद दे दिया था। बड़ी होने पर शांता का विवाह ऋषि श्रृंगी से करवाया गया। यहीं वह ऋषि हैं, जिनके नेतृत्व में राजा दशरथ ने पुत्रेष्ठी यज्ञ करके चारों राजकुमारों को पाया था।

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क्या-क्या आया है रामलला के लिए?

हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में ऋषि श्रृंगी और माता शांता का आश्रम है। वहां से हर साल रामलला के लिए राखियां आती हैं। इस साल भी हिमाचल प्रदेश के आश्रम के साथ-साथ अयोध्या और अंबेडकर नगर जनपद के बॉर्डर पर मौजूद प्राचीन श्रृंगी आश्रम और माता शांता के मंदिर से भी बड़ी संख्या में महिलाएं राखी बनाकर अयोध्या लायी हैं।

बताया जाता है कि राखियों के साथ महिलाओं और बहन शांता की तरफ से 56 भोग और फल समर्पित किया गया है। इसके साथ ही माता शांता ने अपने भाई के लिए माला और बांसुरी भी उपहार में भेजा है। इस बारे में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के मुख्य पुजारी आचार्य सत्येंद्र दास ने बताया कि राखियों को रामलला की कलाई पर रक्षाबंधन के दिन बांधा जाएगा।

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20 दिनों में बनी हैं राखियां

इन सभी राखियों का निर्माण श्रृंगी ऋषि के आश्रम के आसपास में रहने वाली महिलाओं ने किया है। बताया जाता है कि इन राखियों को बनाने में करीब 20 दिनों का समय लग गया है। सभी राखियां रेशम के धागों से बनायी गयी है जिसके ऊपर मोती लगायी गयी है। बताया जाता है कि इन राखियों को बनाने से पहले पूरे रीति-रिवाज के साथ पूजा की जाती है, उसके बाद ही राखियों को बनाने का काम शुरू होता है।

रक्षाबंधन के समय शुभ मुहूर्त पर ही इन राखियों को रामलला की कलाई पर बांधी जाएगी। राखी का बनाने वाली एक महिला ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि सावन महीने की शुरुआत होते ही राखियां बनाने का काम शुरू कर दिया गया था। रामजन्मभूमि मंदिर में बालक राम के प्राण प्रतिष्ठा के बाद यह पहली राखी है।

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