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आंध्र प्रदेश के अद्भुत शिव मंदिर, जानिए इन मंदिरों की खासियत

दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश स्थित प्रसिद्ध शिव मंदिर। Famous Shiva Temples in Andhra Pradesh.

दक्षिण भारत के हर राज्य अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के साथ-साथ अपने सांस्कृतिक महत्व के लिए काफी प्रसिद्ध हैं। धर्म-आस्था को लेकर यहां दक्षिण भारतीय काफी ज्यादा सक्रिय हैं। यहां साल के हर महीने छोटे-बड़े धार्मिक आयोजन होते रहते हैं। दक्षिण भाषाई भिन्नता होने के बावजूद यहां के निवासी एकजूट होकर अनुष्ठान करने में विश्वास रखते हैं, जो भारत की मुख्य विशेषताओं में शामिल है।

अगर आप यहां के धार्मिक पहलुओं को करीब से जानने की कोशिश करें तो पता चलेगा कि यहां प्रमुख हिन्दू देवी-देवताओं के साथ स्थानीय इष्ट देवताओं को भी बड़ा दर्जा मिला हुआ है, जिनके मंदिर भी काफी बड़े और भव्य रूप में बनाएं गए हैं। मुख्य हिन्दू देवी-देवताओं के कई अवतारों की पूजा दक्षिण भारत में की जाती है।

यहां आप वैष्णव मंदिरों के साथ-साथ कई भव्य शैव मंदिरों को भी देख सकते हैं। आज इस विशेष लेख में जानिए आंध्र प्रदेश के चुनिंदा सबसे खास भगवान शिव के मंदिरों के बारें में, जानिए इन पवित्र स्थानों की खासियतें।

भगवान मल्लिकार्जुन मंदिर

भगवान मल्लिकार्जुन मंदिर

आंध्र प्रदेश के श्रीशैलम स्थित भगवान शिव का यह प्रसिद्ध मंदिर देश में बारह ज्योतिर्लिंगस में से एक है और इसलिए यह महादेव के अनुयायियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। ज्योतिर्लिंग होने के अलावा, यहां विराजमान देवी भ्रामारम्बा के कारण यह मंदिर अष्टदास महा शक्ति पीठ (अठारह महा सक्ति पीठ) में भी गिना जाता है। ज्योतिर्लिंगम और महा सक्ति पीठ के इस अद्वितीय संयोजन के कारण यह स्थान हिन्दू श्रद्धालुओं के लिए एक पवित्र तीर्थस्थल माना जाता है।

श्रीशैलम का यह मंदिर शहर के नल्लामाला पर्वत की एक पहाड़ी पर स्थित है। यह मंदिर कृष्णा नदी के तट पर राज्य के कुर्नूल जिले में स्थित है। महा शिवरात्रि के दौरान यहां सात दिनों तक भव्य आयोजन किया जाता है, जिसमें शामिल होने के लिए दूर-दूर से भक्त गण पहुंचते हैं।

तिरुपति के पास श्री कालहस्ती

तिरुपति के पास श्री कालहस्ती

PC-Krishna Kumar Subramanian

आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में स्थित श्री कालहस्ती मंदिर राज्य के चुनिंदा सबसे खास शिव मंदिरों में गिना जाता है। यह पवित्र मंदिर शहर के स्वर्णमुखी नदी तट पर स्थित है और प्रसिद्घ तिरुपति के बहुत ही करीब है। इतिहास पर नजर डालें तो पता चलता है कि इस मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में चोल राजवंश के शासनकाल के दौरान हुआ था। माना जाता है कि इस प्राचीन मंदिर में भगवान शिव वायु रूप में मौजूद हैं,जिनकी पूजा कालहस्तेश्वर के रूप में की जाती है।

यहां शिवलिंग की पूजा वायूर लिंगम के रूप में और माता पार्वती की पूजा श्री ज्ञान प्रसुणम्बा के रूप में की जाती है। मुख्य देवताओं के अलावा, यह मंदिर राहु और केतु की विशेष पूजा के लिए जाना जाता है।

श्री राजा राजेश्वर स्वामी मंदिर

श्री राजा राजेश्वर स्वामी मंदिर

PC- RAJUKHAN SR RAJESH

श्री राजा राजेश्वर स्वामी मंदिर भगवान शिव को समर्पित एक प्राचीन प्रसिद्ध मंदिर है। भगवान शिव का यह मंदिर राज्य (अब तेलंगाना) के करीमनगर जिले के अंतर्गत वेमुलावाड़ा नामक एक छोटे शहर में स्थित है। मंदिर के प्रमुख देवता भगवान राजा राजेश्वर स्वामी यहां नीला लोहित शिव लिंगम के रूप में हैं विराजमान हैं।

यह स्थान दक्षिण काशी के नाम से भी जाना जाता है। यहां महाशिवरात्रि का आयोजन बहुत ही भव्य रूप में किया जाता है। इस दौरान दूर-दूर से शिवभक्त मंदिर में प्रवेश करते हैं।

भीमेश्वर स्वामी मंदिर

भीमेश्वर स्वामी मंदिर

PC- Palagiri

द्राक्षरमं भीमेश्वर स्वामी मंदिर दक्षिण भारत के सबसे महत्वपूर्ण शिव मंदिरों में से एक है। यह स्थान हिंदुओं के लिए एक पवित्र स्थान है, क्योंकि इस मंदिर की गिनती शिव पंचरामों और 'अष्टदास महा सक्ति पीठ' की होती है। इसलिए यह मंदिर न केवल प्रसिद्ध शिव खेत्रम बल्कि एक महत्वपूर्ण सक्ति पीठ भी है।

भगवान शिव की इस मंदिर में पूजा भगवान भिमेश्वर के रूप में की जाती है। मंदिर की मुख्य देवी माणिक्यम्बा हैं। यह पवित्र तीर्थस्थान आंध्र प्रदेश के पूर्वी गोदावरी जिले में स्थित है। महा शिव रात्रि यहां मनाएं जाने वाला सबसे प्रमुख त्योहार है।

यज्ञती मंदिर

यज्ञती मंदिर

PC-Saisumanth532

उपरोक्त मंदिरों के अलावा आंध्र प्रदेश के कुर्नूल जिले में स्थित श्री यज्ञती उमा महेश्वर मंदिर भी भगवान शिव के प्रसिद्ध मंदिरों में गिना जाता है। इस मंदिर का निर्माण वैष्णव परंपराओं के अनुसार बनाया गया था। यह भगवान शिव का एक प्राचीन मंदिर है, जिसका निर्माण विजयनगर साम्राज्य के हरिहारा बुक्का राया ने 15वीं शताब्दी के दौरान करवाया था। इस मंदिर को लेकर कई पौराणिक किवदंतियां भी जुड़ी हुईं हैं, माना जाता है कि ऋषि अगस्त्य यहां भगवान वेंकटेश्वर का मंदिर बनाने चाहते थे, बाद में मूर्ति बनाई गई लेकिन उसकी स्थापना नहीं हो सकी क्योंकि मूर्ति की पैर की एक उंगली का नाखून टूट गया था।

ऋषि काफी दुखी हुए और उन्होंन भगवान शिव का तपस्या की। बाद में ऋषि की भगवान शिव से की गई प्राथना के अनुसार यज्ञती उमा महेश्वर के रूप में यहां माता पार्वती विराजमान हुईं।

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