Search
  • Follow NativePlanet
Share
» »यकीनन आप अमृतसर के इन गुरु-द्वारों से वाकिफ नहीं होंगे!

यकीनन आप अमृतसर के इन गुरु-द्वारों से वाकिफ नहीं होंगे!

By Goldi

सिखों के प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में शुमार अमृतसर भारत के पवित्र शहरों में से एक है। स्वर्ण मंदिर के लिए विख्यात अमृतसर, भारत का एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल है, जहां हर सालों लाखों की तादाद में देशी और विदेशी पर्यटक पहुंचते हैं।

इस शहर की स्थापना 16वीं शताब्दी में चौथे सिक्ख गुरू, गुरू रामदास जी ने किया था और इसका नाम यहां के एक पवित्र तालाब अमृत सरोवर के नाम पर पड़ा। 1601 में गुरू रामदास जी के उत्तराधिकारी गुरू अर्जुन देव जी ने अमृतसर का विकास किया। उन्होंने यहां एक भव्य मंदिर का निर्माण कार्य भी पूरा किया, जिसकी शुरुआत गुरू रामदास जी ने की थी।

धार्मिक आस्था का महत्वपूर्ण केन्द्र होने के कारण यहां विश्व के अलग-अलग हिस्से से हर दिन करीब एक लाख पर्यटक आते हैं। अमृतसर के स्वर्ण मंदिर से तो सभी वाकिफ हैं, लेकिन आज हम आपको अपने लेख से बताने जा रहे हैं अमृतसर के अन्य कुछ खास गुरु द्वारों के बारे में, जहां भरी तादाद में श्रद्धालु मत्था टेकने पहुंचते हैं।

गुरुद्वारा बाबा दीप सिंह

गुरुद्वारा बाबा दीप सिंह

Pc:Sandeep Singh Amritsar
अमृतसर में चटविंद गेट के बाहर स्थित गुरुद्वारा बाबा दीप सिंह एक प्रसिद्ध गुरु द्वारा है। बताया जाता है कि, वर्ष 1757 सिखों की शान को बचाते हुए बाबा दीप सिंह जी ने मरते दम तक अपने शत्रुयों से युद्ध किया था। सरदार जस सिंह रामगढ़िया ने शहीद बाबा दीप सिंह की याद में स्मारक बनावाया था, जिसे 1 9वीं शताब्दी में अकाली फुला सिंह ने स्मारक मंच को एक शानदार गुरुद्वारा में बदल दिया। आज यह गुरु द्वारा अमृतसर के प्रसिद्ध गुरुद्वारों में शुमार है।

गुरुद्वारा पिपली साहिब

गुरुद्वारा पिपली साहिब

Pc: Dennis Jarvis
अमृतसर के मुख्य रेलवे स्टेशन से गुरुद्वारा पीपली साहिब 1.5 किमी पूर्व में स्थित है। इस तीर्थस्थल का नाम पीपल के एक बड़े वृक्ष पर पड़ा है, जो कभी गुरुद्वारा के स्थान हुआ करता था। 20वीं सदी की शुरुआत में बनाए गए इस गुरुद्वारे से तीन प्रमुख सिख गुरू, गुरू रामदास जी, गुरू अर्जुन देव जी और गुरू हरगोविंद जी की स्मृति जुड़ी हुई है। इस क्षेत्र के एक प्रमुख त्यौहार बसंत पंचमी के दिन इस गुरुद्वारा को घूमना सबसे अच्छा माना जाता है।

गुरुद्वारा माता कौलन

गुरुद्वारा माता कौलन

गुरुद्वारा हरमंदिर साहिब के दक्षिणी किनारे पर स्थित गुरुद्वारा माता कौलन का निर्माण गुरू हरगोविंद की पूजा करने वाले पाकिस्तान के एक काजी की बेटी बीवी कौलन की याद में किया गया है। अन्य गुरुद्वारों की तरह ही गुरुद्वारा माता कौलन कौलसर सरोवर नामक पवित्र तालाब के किनारे पर बना है। छठे सिक्ख गुरू, गुरू हरगोविंद सिंह जी ने श्रद्धालुओं को यह निर्देश दिए थे कि वह स्वर्ण मंदिर में प्रवेश से पहले कौलसर सरोवर में स्नान जरूर करें। यह गुरुद्वारा सिक्ख श्रद्धालुओं के बीच काफी पूज्य है और अगर आप अमृतसर घूमने जा रहे हैं तो यहां जरूर जाएं।

सिख धर्म के यश वैभव और शालीनता को बखूबी दर्शाता है अमृतसर का स्वर्ण मंदिर

गुरुद्वारा बाबा अटल

गुरुद्वारा बाबा अटल

Pc:jasleen_kaur
गुरुद्वारा बाबा अटल स्वर्ण मंदिर के दक्षिण में स्थित है। यह गुरुद्वारा गुरु हरगोबिंद के पुत्र बाबा अटल राय के युवा जीवन की याद में बनाया गया था। यह नौ मंजिला अष्टकोणीय टावर है जो 40 मीटर ऊंचा है और अमृतसर में सबसे ऊंची इमारत माना जाता है। गुरू ग्रंथ साहिब को अष्टभुजीय स्तंभ के अंतर्गत रखा गया है। अपनी उत्कृष्ट वास्तुशिल्पीय बनावट के लिए चर्चित इस गुरुद्वारा को अमृतसर जाने के दौरान जरूर घूमना चाहिए।

गुरुद्वारा तरनतारन

गुरुद्वारा तरनतारन

Pc:Giridhar Appaji Nag Y

पंजाब के तरन-तारण जिले म स्थित गुरुद्वारा तरन-तारण स्वर्ण मंदिर से करीबन 22 किमी की दूरी पर स्थित है। इस गुरुद्वारा का निर्माण पांचवें सिख गुरु, अर्जुन देव ने किया था। ऐसा कहा जाता है कि इस गुरुद्वारा में सरोवर सबसे बड़ा है। यह गुरुद्वारा वास्तुशिल्प की दृष्टि से काफी उत्कृष्ट है और इसका ऊपरी हिस्सा सोने के वर्क से बनाया गया है। इसके अलावा इसका गुंबद कमल के आकार में है, जिसपर छतरीनुमा सोने के कलश बने हुए हैं। वहीं गुरुद्वारे के अंदरूनी हिस्से में संगमरमर का चूना किया गया है। इसका प्रवेश द्वार मेहराब के आकार में है और गुरुद्वारा को संगमरमर के चबूतरे पर बनाया गया है। पंजाब में घूमने की जगह

गुरुद्वारा सारागढ़ी साहिब

गुरुद्वारा सारागढ़ी साहिब

स्वर्ण मंदिर से कुछ ही दूरी पर गुरुद्वारा सारागढ़ी साहिब है। यह केसर बाग में स्थित है और आकार में बहुत ही छोटा है। इस गुरुद्वारे को 1902 ई.में ब्रिटिश सरकार ने उन सिक्ख सैनिकों को श्रद्धांजलि देने के लिए बनाया था जो एंग्लो-अफगान युद्ध में शहीद हुए थे। पंजाब के लेफ्टिनेंट गवर्नर सर चार्ल्स पेव्ज ने 1902 में इस गुरुद्वारा का अनावरण किया था। उन 21 शहीद सैनिकों का नाम गुरुद्वारा के दीवार पर स्थापित संगमरमर के पत्थर पर उकेरा गया है।हर साल 12 सितंबर को इस गुरुद्वारा में एक धार्मिक और सेवानिवृत्त सैनिकों के समागम का आयोजन किया जाता है।
अमृतसर में हिन्दू धर्म की पवित्र स्थली: माँ दुर्गियाना मंदिर!

यात्रा पर पाएं भारी छूट, ट्रैवल स्टोरी के साथ तुरंत पाएं जरूरी टिप्स

We use cookies to ensure that we give you the best experience on our website. This includes cookies from third party social media websites and ad networks. Such third party cookies may track your use on Nativeplanet sites for better rendering. Our partners use cookies to ensure we show you advertising that is relevant to you. If you continue without changing your settings, we'll assume that you are happy to receive all cookies on Nativeplanet website. However, you can change your cookie settings at any time. Learn more