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पलक्‍कड़ में कलपाथी रथोलसवम उत्‍सव की धूम

By Namrata Shatsri

केरल</a></strong> के <strong><a href=पलक्‍कड़ " title="केरल के पलक्‍कड़ " />केरल के पलक्‍कड़

ये त्‍योहार भी किसी प्राचीन मंदिर की तरह ही पुराना है और सालों से इसमें कोई बदलाव नहीं आया है। कलपाथी रथोल्‍सवम को पर्यटन मानचित्र में साल 1986 में नींव रखी गई थी। इसके बाद इसे राज्‍य सरकार की सूची में मंदिरों के उत्‍सव में शामिल किया गया।

मालाबार क्षेत्र में स्थित मंदिर भगवान शिव के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक है। ये मंदिर कलपाथी और नीला नदी के तट पर स्थित है। अग्रहरम को इसका नाम इसी नदी से मिला है और यह केरल राज्य में सबसे पहले तमिल ब्राह्मण बस्तियों में से एक है। इस उत्‍सव को सिर्फ यहीं नहीं बल्कि अन्‍य पड़ोसी क्षेत्रों में भी मनाया जाता है। ये उत्‍सव दस दिनों के लिए आयोजित किया जाता है।

मंदिर से जुड़ी कहानियां

मंदिर से जुड़ी कहानियां

किवदंती है कि सेखारीपुरम की लक्ष्‍मी अम्‍मा नामक विधवा स्‍त्री तीर्थयात्रा पर काशी गई थी। यात्रा से लौटने के बाद उसने इतिकोंबी राजा को 1320 सोने के सिक्‍के दिए और उनसे शिव मंदिर का निर्माण करने को कहा जहां वो स्‍त्री काशी से लाए शिवलिंग को स्‍थापित करना चाहती थी। काशी में गंगा नदी के तट पर प्रसिद्ध विश्‍वनाथ मंदिर बसा है, उसी तरह वह विधवा स्‍त्री भी कलपाथी नदी पर शिव मंदिर बनवाना चाहती थी। इस वजह से कलपाथी को कासियिल पाथी कलपाथी कहा जाता है जिसका मतलब है कि कलपाथी काशी का आधा हिस्‍सा है।PC:Mullookkaaran

केरल में तमिल ब्राह्मण कैसे आए

केरल में तमिल ब्राह्मण कैसे आए

मान्‍यता है कि इस मंदिर को 1426 ईस्‍वीं में बनवाया गया था और इसमें भगवान शिव और वीशालक्षी की मूर्ति की स्‍थापना की गई थी। कहा जाता है कि एक बार मंदिर के पुजारी का स्‍थानीय शास‍क से मतभेद हो गया था और राजा को थंजावुर के ब्राह्मण से मंदिर में रोज़ की पूजा और संस्‍कार के लिए सहायता मांगनी पड़ी थी। इस तरह थंजावुर के ब्राह्मण परिवार यहां आकर बसे।

केरल में तमिल ब्राह्मण कैसे आए

केरल में तमिल ब्राह्मण कैसे आए

इस जगह पर जल्‍द ही अग्रहरम का निर्माण किया गया। पहले थंजावुर के मायावरम में रथालसवम उत्‍सव का आयोजन किया जाता था और जल्‍द ही ये पलक्‍कड़ तक पहुंच गया। यहां पर स्‍थानीय लोग इसे बड़ी धूमधाम से मनाते हैं। कुछ समय बाद ही इसे कलपाथी का रथोलसवम से लोकप्रियता हासिल हो गई।

 उत्‍सव की धूम

उत्‍सव की धूम

कलपाथी की सड़कों पर श्रद्धालु बड़ी धूमधाम से इस उत्‍सव को मनाते हैं। दस दिन तक चलने वाले इस उत्‍सव में पहले चार दिनों में कई तरह के संस्‍कार किए जाते हैं। इस उत्‍सव के सबसे खास दिन अंतिम तीन दिन होते हैं जिसमें पास के मंदिरों से रथयात्रा निकाली जाती है।

शानदार रथयात्रा

शानदार रथयात्रा

इस उत्‍सव का मुख्‍य आकर्षण 6 शानदार रथ होते हैं। इनमें से तीन विश्‍वनाथ स्‍वामी मंदिर से होते हैं जिनमें से पहला मुख्‍य देवी-देवता विश्‍वनाथ और वीशलक्षी का होता है।

दूसरा रथ गणपति जी का और तीसरा सुब्रमण्‍या का होता है। बाकी तीन रथ मनथाक्‍करा महा गणपति, प्राचीन कलपाथी का लक्ष्‍मी नारायण पेरुमल और छथापुरम के महा गणपति मंदिर के होते हैं।

सभी रथों को फूलों, झंडों, गन्‍नों, नारियल आदि से सजाया जाता है और इसे हज़ारों श्रद्धालुओं द्वारा खींचा जाता है। सभी 6 रथों को एकसाथ देवरथ समागम कहा जाता है।

मान्‍यता है कि इन रथों को खींचने से श्रद्धालुओं के इस जन्‍म के ही नहीं पिछले और अगले जन्‍म के पाप धुल जाते हैं।

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