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अहमदाबाद का 200 साल पुराना रिवाज, नवरात्रि में चनिया-चोली पहन पुरुष करते हैं गरबा, क्यों है ऐसी परंपरा?

शारदीय नवरात्रि की शुरुआत हो चुकी है। और उसके साथ ही गरबा की धूम मचनी भी शुरू हो चुकी है। नवरात्रि में अगर किसी शहर में सबसे ज्यादा गरबा खेला जाता है तो वह है अहमदाबाद। नवरात्रि से पहले स्थानीय बाजारों की सभी दुकानें रंग-बिरंगी चनिया-चोली से पट जाती हैं, जहां हर उम्र की महिलाओं से लेकर युवतियां और छोटी बच्चियां अपनी पसंद की चनिया-चोली की खरीदारी करती हैं।

लेकिन महिलाओं की इस भीड़ में कुछ पुरुष भी शामिल होते हैं जो अहमदाबाद की 200 साल पुरानी परंपरा को निभाते हुए चनिया-चोली की खरीदारी करने इन बाजारों में पहुंचते हैं। पर क्यों? क्यों अहमदाबाद के पुरुष नवरात्रि के दौरान महिलाओं के परिधान खरीदते हैं? क्या परिवार की महिलाओं को ये परिधान उपहार में देने का अहमदाबाद में कोई खास रिवाज है? और क्या है नवरात्रि पर मानी जाने वाली 200 साल पुरानी परंपरा?

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पुरुष पहनते हैं साड़ी और चनिया-चोली

अहमदाबाद में नवरात्रि के दौरान एक खास समुदाय के पुरुष पिछले 200 सालों से एक विशेष परंपरा को निभाते चले आ रहे हैं। इस परंपरा का पालन अहमदाबाद में 'साडू माता नी पोल' में किया जाता है। नवरात्रि की आठवीं रात यानी महाष्टमी की रात को बरोट समुदाय के पुरुष महिलाओं की तरह साड़ी व चनिया-चोली पहनकर गरबा नृत्य करते हैं।

साडू माता नी पोल, जहां करीब 1000 लोग रहते हैं। दुर्गाअष्टमी की रात को लोग अपने-अपने घरों से बाहर निकलते हैं और पोल की सभी गलियों और रास्तों जमा होने लगते हैं। इस दौरान पुरुष महिलाओं की तरह न सिर्फ साड़ियां पहनते हैं बल्कि वे संगीत की धून पर गुजरात का परंपरागत शेरी गरबा भी करते हैं। पर ऐसा क्यों किया जाता है?

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क्यों पुरुष साड़ी व चनिया-चोली पहन करते हैं गरबा?

पिछले लगभग 200 सालों से अहमदाबाद के बरोट समूदाय के पुरुष साड़ी और चनिया-चोली पहनकर नवरात्रि के दौरान गरबा नृत्य कर 'साडू माता' द्वारा दिये गये एक श्राप का प्रायश्चित करते आ रहे हैं। जी हां, सुनने में बड़ा अजीब लग रहा हो लेकिन यह सच है। दरअसल, यह किस्सा तब का है जब भारत में मुगलों का शासन हुआ करता था। साडूबेन नाम की एक महिला पर एक मुगल की बुरी नजर पड़ गयी थी।

वह उसे अपने पास रखना चाहता था। साडूबेन ने मुगल से अपनी रक्षा के लिए बरोट समुदाय से मदद मांगी थी। दुर्भाग्यवश पुरुषों ने उन्हें मुगलों के हाथों से नहीं बचाया था। इस वजह से उनके बच्चे की मौत हो गयी थी। साडूबेन ने तब बरोट समुदाय के पुरुषों को श्राप देते हुए कहा था कि उनकी आने वाली पीढ़ियां कायर होंगी। इसके बाद वह आत्मदाह कर सती हो गयी।

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साडूमाता के श्राप से मुक्ति के लिए हर साल पुरुष खेलते हैं गरबा

साडूमाता की मौत के बाद उनकी आत्मा को खुश करने और श्राप से मुक्ति के लिए अहमदाबाद में उनका एक मंदिर बनाया गया। हर साल दुर्गाष्टमी की रात को बरोट समुदाय के पुरुष साडू माता नी पोल में इकट्ठा होते हैं और साड़ी अथवा चनिया-चोली पहनकर प्रायश्चित के रूप में गरबा करते हैं। पिछले 200 सालों से यह सिलसिला आज भी जारी है। बड़ी संख्या में शहरी इलाकों से लोग इस परंपरा को देखने के लिए उस समय साडू माता नी पोल में एकत्र होते हैं।

आमतौर पर पुरुषों द्वारा महिलाओं के कपड़े पहनने को जहां हीन नजरों से देखा जाता है लेकिन बरोट समुदाय के पुरुष इसे महिलाओं के प्रति विनम्रता और सम्मान के प्रतीक के तौर पर देखते हैं। मान्यताओं के अनुसार शेरी गरबा के दौरान जिन व्यक्तियों ने व्यापार में उन्नति, अच्छा स्वास्थ्य, स्वस्थ बच्चे का जन्म आदि की मनोकामनाएं मांगी थी, उनकी इच्छाएं भी बड़ी जल्दी पुरी हुई हैं। मनोकामनाओं के पूरा होने पर साडू माता का धन्यवाद करने के लिए भी पुरुष इस अनुष्ठान में हिस्सा लेते हैं।

इस साल अगर आप भी दुर्गाष्टमी के समय अहमदाबाद या आसपास के क्षेत्र में मौजूद रहते हैं तो साडू माता नी पोल में जाकर पुरुषों द्वारा महिलाओं के सम्मान में किये जाने वाले शेरी गरबा के इस अनोखे दृश्य का आनंद उठाना मत भूले।

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