बिहू असम का पारंपरिक त्योहार है। साल में एक नहीं बल्कि कई बार बिहू मनाए जाते हैं, जिसकी अलग-अलग मान्यताएं हैं। अप्रैल के महीने में असम में जो बिहू मनाया जाता है, उसे बोहाग या रोंगाली बिहू कहा जाता है। इसे हिंदी कैलेंडर में वैशाख महीने में मनाया जाता है। यह त्योहार फसलों की कटाई और अच्छी पैदावार के लिए किसानों का भगवान को धन्यवाद कहने का तरीका होता है।
पारंपरिक तरीके से इस समय किसान अपनी नई कटी फसल को अग्नि देव को समर्पित करते हैं। हालांकि यह साल का पहला बिहू नहीं होता है। असम में पहला बिहू जनवरी के महीने में मनाया जाता है, जब हिंदी कैलेंडर में माघ का महीना होता है। इसे माघ या भोंगाली बिहू कहा जाता है। इसके बाद अप्रैल में बोहाग या रोंगाली बिहू और अक्टूबर-नवंबर महीने में काती बिहू मनाया जाता है।

कब मनाया जाएगा बोहाग बिहू?
हर साल असम में बोहाग बिहू 14 से 20 अप्रैल तक मनाया जाता है। माघ बिहू सिर्फ फसलों की कटाई से जुड़ा त्योहार होता है लेकिन बोहाग बिहू फसलों की कटाई और बुआई से जुड़ा हुआ त्योहार है। इसके साथ ही यह नए वर्ष के आगमन का प्रतीक भी माना जाता है। असम में 7 दिनों तक बोहाग बिहू का त्योहार मनाया जाता है। इसे खूब धूमधाम के साथ नाचते-गाते हुए मनाया जाता है।
7 दिनों तक बोहाग बिहू के दौरान सिर्फ परिवार के लोग ही नहीं बल्कि घरों के पालतू पशुओं को भी शामिल किया जाता है। सुबह के समय घर की महिलाएं कच्ची हल्दी और उड़द के दाल को पीसकर उबटन तैयार करती हैं। फिर दिन में परिवार के सभी सदस्य इस उबटन को अपने शरीर पर लगाकर नहाते हैं। इसके बाद बुजुर्गों का आर्शिवाद लिया जाता है।

पकते हैं लजीज पकवान
त्योहार कोई भी हो, लेकिन बिना लजीज पकवानों के उसे पूरा कहां माना जाता है। बोहाग बिहू के समय भी तील लारु, पिठा, मुरीर लारु, घिला पिठा और कई तरह की पारंपरिक मिठाईयां खाने की परंपरा है। सप्ताह भर यह त्योहार चलता है, जिसमें अलग-अलग दिन लोग अपने घरों के सामने रंगोली बनाते हैं। महिलाएं हाथों पर मेहंदी रचाती हैं और पारंपरिक लोकगीत गाती हैं। माना जाता है कि गीत-संगीत से भगवान इंद्र को प्रसन्न किया जाता है, जिससे अच्छी बारिश होती है और भगवान से फसल का वरदान मिल सकें।



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