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भगवान राम के अलावा अयोध्या के 101 से अधिक राजाओं के नाम, जो नहीं मिलेंगे विकीपीडिया पर

कहा जाता है कि अयोध्या में राम-राज के दौरान जो सुख-शांति और समृद्धि थी, वैसा कभी नहीं हुई। अयोध्यावासी राजा राम की तारीफें करते हुए नहीं थकते थे। लेकिन क्या आप जानते हैं भगवान राम से पहले अयोध्या के कितने राजा हुए थे? भगवान राम के अलावा अयोध्या के राजाओं की कुल संख्या 101 से भी ज्यादा है।

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अयोध्या के राजपरिवार का इतिहास हजारों साल पुराना है। इस परिवार में सत्यवादी हरिश्चंद्र से लेकर भगीरथ, जिन्होंने गंगा को धरती पर लाया था, तक का नाम शामिल हैं। ये सभी अयोध्या के राजा हुआ करते थे। जी हां, है ना हैरान करने वाली बात। इससे ही पता चलता है कि अयोध्या का इतिहास कितना अधिक महत्वपूर्ण और शुभ रहा है। अयोध्या में करीब 500 सालों के संघर्ष के बाद भव्य राम मंदिर का उद्घाटन होने वाला है और भूतल के गर्भगृह में रामलला की बाल सुलभ शांतिचित्त मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा 24 जनवरी को होगी।

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इसके बाद ही राम मंदिर के प्रथम तल के निर्माण कार्य में तेजी लायी जाएगी, जहां राम-दरबार होगा और 'राजा राम' को स्थापित किया जाएगा। हम भगवान राम के अलावा उन सभी 101 से अधिक राजाओं के नाम बता रहे हैं, जिन्होंने अयोध्या पर शासन किया था। इन राजाओं के नाम आपको इंटरनेट या विकीपीडिया पर भी नहीं मिलेंगे। ये नाम डॉ. राम मनोहर लोहिया अवध विश्‍वविद्यालय, फैजाबाद में अयोध्‍या पर हुए एक शोध से लिये गये हैं। यह शोध यहां के स्कॉलर डॉ. शिव कुमार सिंह ने 2002 में किया था।

आपको बता दें कि इस सूची में केवल अयोध्‍या पर राज करने वाले शासकों के नाम नहीं बल्कि इतिहास के अलग-अलग युग में अयोध्‍या के दायरे में आने वाले राज्यों जैसे श्रावस्ती, अवध क्षेत्र, आदि पर राज करने वाले राजाओं के नाम भी शामिल हैं।

(1) मनु : ऋग्वेद में मनु को आर्यों का श्रेष्ठ पुरूष बतलाया गया है। पुराणों में मनु को ऐक्ष्वाकु के पिता के रूप में उद्धृत किया गया है। महाभारत में इक्ष्वाकु वंश के प्रथम पुरूष के रूप में मनु की गणना की गयी है। रामायण में इक्ष्वाकु के पिता के रूप में मनु का उदाहरण प्राप्त होता है। मनु इक्ष्वाकु वंश के प्रथम शासक थे, जिन्होंने समाज के सम्यक संचालन हेतु आदर्श न्याय संहिता का निर्माण किया, सम्प्रति मनुस्मृति के नाम से जाना जाता है।

(2) इक्ष्वाकु : इक्ष्वाकु मनु के पुत्र थे। इक्ष्वाकु सूर्योपासक थे, इसीलिए इक्ष्वाकु वंश को सूर्यवंश भी कहा गया। ऋग्वेद एवं रामायण में भी इक्ष्वाकु नाम के शासक का उल्लेख हुआ है। महावस्तु में इक्ष्वाकु को काशी का शासक बतलाया गया है।

(3) विकुक्षि : इक्ष्वाकु के सौ पुत्र थे जिनमें से विकुक्षि, निमि एवं दण्ड प्रमुख थे।

(4) पुरज्य : विकुक्षि के उपरांत कोशल राजवंशावलि में पुरन्जय का उल्लेख हुआ है । पुरन्जय को काकुस्थ नाम से भी प्रसिद्धि प्राप्त थी। काकुस्थ राजाओं में श्रेष्ठ और सुन्दर लक्षणों वाले थे।

(5) अनेना : पुराणों में अनेना के लिए अनेनस एवं सुयोधन नाम का भी उल्लेख हुआ है, जो सम्भवतः पुरन्जय के उपरान्त कोशल का शासक बना।

(6) पृथु : पृथु अनेना के उपरांत कोशल के राजसिंहासन पर आसीन हुए।

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(7) विश्वाश्वा : पुराणों में पृथु के बाद विश्वाश्वा का कोशल के राजा के रूप में उल्लेख हुआ है। विश्वाश्वा को विश्वाश्व, विश्वसु विश्वकु विस्तरस्वा विष्ठाराश्व विश्वाक्ष्व आदि नामों से भी जाना जाता है।

(8) अरदा : विश्वाश्व के बाद कोशल राजवंशावलि में अरद्रा का नामोल्लेख हुआ है । उन्हें आद्र, आद्रक, चन्द्रक, आंध्र, आयु एवं चन्द्रमा के नाम से जाना जाता था।

(9) युवनाश्व : कोशल के शासको की सूची में युवनाश्व का भी वर्णन मिलता है। युवनाश्व को अरद्रा का पुत्र बतलाया गया है।

(10) श्रावस्त : श्रावस्त युवनाश्व के बाद अयोध्या का शासक बना। पुराणों के अनुसार उन्‍होंने ही श्रावस्ती को बसाया था।

(11) वृहदाश्व : लगभग सभी पुराणों में वृहदाश्व को कोशल के शासक के रूप में वर्णन हुआ है। वृहदाश्व ने श्रावस्त के उपरान्त राज्य ग्रहण किया।

(12) कुवल्याश्व : कुवल्याश्व को कुलाश्व एवं धुन्धुमार भी कहा गया है, जो वृहदाश्व के बाद कोशल के राज सिंहासन पर आरूढ़ हुआ है।

(13) दृढाश्व : पुराणों में दृढ़ाश्व 33 को इक्ष्वाकु वंशीय शासको की सूची में रखा गया है।

(14) हृयस्व : दृढाश्व के उपरान्त हृयश्व इक्ष्वाकु वंशी अगला शासक हुआ था। मत्स्य पुराण, अग्नि पुराण एवं वायुपुराण से उपर्युक्त तथ्य की पुष्टि होती है।

(15) निकुंभ : इक्ष्वाकु वंश के शासकों की सूची में पन्द्रहवें स्थान पर शासक स्वीकारा गया है। वे हृयस्व के पुत्र थे।

(16) संघतश्रब : संघतश्रव को अमिताश्रव एवं वहणाश्रव नाम से भी जाना जाता है। इक्ष्वाकु वंशीय शासकों की सूची का सोलहवां शासक थे।

(17) कृशाश्व : कृशाश्व को कृताश्व संज्ञा से भी समीकृत किया गया है। कृताश्व के बाद एक बार पुनः राजवंशावलि की सूची में भिन्न-भिन्न अभिमत प्राप्त होता है।

(18) युवनाश्व : यह इक्ष्वाकुवंशीय शासक था जिसने मान्धाता के पूर्व शासन किया।

(19) मान्धाता : युवनाश्व के पुत्र मान्धाता अयोध्या के प्रतापी चक्रवर्ती राजा थे, इनके समय में अयोध्या की समृद्धि हुई और उन्होंने सारे भूमंडल को जीता, ये राजनीतिक क्षेत्र में विख्यात होने के साथ ही विद्वान, धार्मिक तथा यज्ञों के मंत्रकर्ता भी थे। मान्धाता के राज्य में पृथ्वी धन-धान्य से भरी पूरी थी। उसके यज्ञ मंडपों से सारी पृथ्वी व्याप्त थी।

(20) पुरुकुत्स : चक्रवर्ती सम्राट मान्धाता के उपरान्त उनका पुत्र इक्ष्वाकु वंशीय पुरुकुत्स अयोध्या की गद्दी पर बैठा। पुरुकुत्स सम्भवतः सामान्य शासक के रूप में अपनी राज्यावधि को विताया क्योंकि पुराणों में पुरुकुत्स के बारे में नामोल्लेख के अतिरिक्त अन्य साक्ष्य नहीं प्राप्त होते हैं, किन्तु ऋग्वेद में एक स्थल पर पुरुकुत्स का उल्लेख है।

(21) त्रसदस्यु : यह पुरुकुत्स के बाद अयोध्या की गद्दी पर बैठा, किन्तु पुराण में इसे इक्ष्वाकु वंशावली में सम्मिलित नहीं किया है।

(22) सम्भूत : अनरण्य को होते है। त्रसदस्यु के बाद सम्भूत गद्दी पर आसीन हुए।

(23) अनरण्य : सम्भूत के उपरान्त उसका पुत्र अनरण्य अयेध्या का शासक बने।

(24) वृहदाश्व : यह इक्ष्वाकु वंश के चौबीसवाँ शासक थे।

(25) हृयश्व : वृहदाश्व के बाद हृयश्व का उल्लेख हुआ है। विष्णु पुराण में हृयश्व का उत्तराधिकारी हस्त को बतलाया गया है, जिसका नाम किसी अन्य पुराण से प्राप्त नहीं होता। अतः वसुमनस सुमन, वसुमत को अगले शासक के रूप में स्वीकारना उचित प्रतीत होता है।

(26) वसुमनस : हृयश्व के उपरांत वसुमनस को अगला शासक माना गया है। विष्णु पुराण में इसे सुमन और वायु पुराण में वासुमत संज्ञा से अभिहित किया गया है।

(27) त्रय्यारुणि : त्रय्यारुणि का प्रथम उल्लेख ऋग्वेद में त्रय्यारुण नाम का हुआ। पुराणों में त्रय्यारुणि को त्रिशंकु (सत्यव्रत) के पिता के रूप में मान्यता दी गयी है।

(28) सत्यव्रत (त्रिशंकु) : सूर्यवंशी राजा त्रय्यारुणि के पुत्र त्रिशंकु थे। इनका कुलगुरु वशिष्ठ से मतभेद हो गया था। उन्होंने त्रिशंकु को उसके पिता त्रय्यारुणि से आज्ञा लेकर राज्य से निष्कासित कर दिया और हरिजनों की बस्ती में मुंह में कालिख लगाकर निवास करने का आदेश दिया और राजा त्रय्यारुणि का वन में तपस्या करने की सलाह दी।

(29) सत्यरथ : सत्यरथ सम्भवतः सत्यव्रत के उपरान्त शासक हुआ, कुछ पुराण इसकी उपस्थिति के प्रति उदासीन है। पद्म पुराण में सत्यरथ को हरिश्चन्द्र का पूर्ववर्ती शासक कहा गया है। पद्य, मत्स्य और अग्नि पुराणों में सत्यव्रत और उसके उत्तराधिकारी हरिश्चन्द्र के मध्य सत्यरथ की स्थिति है, तथापि अन्य सभी पुराणों ने सत्यरथ को छोड़कर इस क्रम को संदिग्ध बना दिया है। अतः सत्यव्रत के बाद का वंशानुक्रम निम्नवत है।

(30) हरिश्चन्द्र : हरिश्चन्द्र को ऐतरेय ब्राह्मण में इक्ष्वाकु नरेश कहा गया है। राजा हरिश्चन्द्र बड़े ही प्रसिद्ध राजा हुए, वे बड़े सत्यवादी थे। वे स्वप्न में दिये गये दान हेतु हरिश्चन्द्र ने अपना सम्पूर्ण राज्य दान कर दिया था। यही नहीं दक्षिणा में हरिश्चन्द्र को अपनी पत्नी, पुत्र और स्वयं को भी बेंच देना पड़ा, किन्तु उन्होंने सत्य की रक्षा की एवं अपने वचन का पालन किया । उनकी सत्यप्रियता ऐसी थी कि उसके लिए अपनी प्यारी से प्यारी वस्तु त्याग देने में उन्हें सकोच न हुआ।

(31) रोहित : रोहित राजा हरिश्चन्द्र के पुत्र थे। इनका नाम रोहिताश्व भी मिलता है। ऐतरेय ब्राह्मण में भी इनका उल्लेख हुआ है।

(32) हरित : कहा जाता है कि हरित ने अयोध्‍या नगरी पर राज किया लेकिन उनके के नाम पर प्रायः पौराणिक साक्ष्यों में परस्पर मतभेदहै।

(33) चन्चु : पार्जीटर ने चन्चु को धुन्धु हारीत एवं चन्य आदि नामों से समीकृत किया है।

(34) विजय : विजय, चन्चु या धुन्धु के बाद अयोध्या (कोशल) के राजसिंहासन पर आरूढ़ हुआ।

(35) रुरुक : यह सम्भवतः विजय के उपरान्त अगले शासक के रूप में प्रतिष्ठापित हुआ।

(36) धृतक : वायुपुराण में राता धृतक का उल्लेख मिलता है।

(37) बाहु : अयोध्‍या के इतिहास के कई अध्‍याय ऐसे हैं जिनसे प्रतीत होता है कि बाहु इक्ष्वाकु वंश के एक राजा थे।

(38) सगर : बाहु के बाद सगर इक्ष्वाकुवंशीय शासक हुए। सगर सूर्यवंश के दूसरे चक्रवर्ती राजा थे। रामायण में इनका अत्यन्त विषद वर्णन हुआ है। यथा- सगर वीर सैन्य कर्त्ता तथा कुशल राजनीतिक थे।

(39) अंसभञ्ज : राजा सगर का ज्येष्ठ पुत्र असमन्ज था, किन्तु उसके आचरण अच्छे नहीं थे। वह नगर के बालकों को पकड़कर नदी में फेंक देता था और खुश होता था। ऐसा देखकर प्रजाजनों ने राजा सगर से उसके घृणित कार्यों के बारे में बताया, जिससे अप्रसन्न होकर सगर ने अंसमन्ज को नगर से बाहर निकाल दिया।

(40) अंशुमान : असमन्ज के पुत्र अंशुमान हुए। वह बड़े ही पराक्रमी तथा मधुर वचन बोलने वालों तथा सबको प्रिय थे। सगर की मृत्यु के बाद प्रजा ने परम धर्मात्मा अंशुमान को राजा बनाया। अंशुमान का पुत्र दिलीप था, वे दिलीप को राज्य देकर हिमालय पर तपस्या करने चले गये ।

(41) दिलीप : अपने पितामहों के वध का वृत्तांत सुनकर दिलीप बहुत दुःखी रहा करते थे और हमेशा सोचा करते थे कि गंगा जी के जल द्वारा किस प्रकार अपने पितरों का उद्धार करूँ, किन्तु वे भी गंगा जी को पृथ्वी पर न ला सके। दिलीप ने भी बहुत से यज्ञों का अनुष्ठान किया ।

(42) भगीरथ : दिलीप के भगीरथ नामक एक परम धर्मात्मा पुत्र हुए, वे निःसंतान थे। जब उन्हें सगर के साठ हजार पुत्रों के भस्म होने का ज्ञान हुआ, तो वे प्रजा और राज्य की रक्षा कर भार मन्त्रियों पर रखकर गंगा को पृथ्वी पर लाने के प्रयास में गोकर्ण तीर्थ में तपस्या करने चले गये। उन्होंने ब्रह्मा को प्रसन्न किया। इसके उपरान्त उन्होंने ब्रह्मा के कहने पर शंकर की तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया। एक पैर पर खड़ा होकर उन्‍होंने तपस्या की। इस प्रकार से भगीरथ के कठिन तपस्या के बाद गंगा का पृथ्वी पर अवतरण हुआ।

(43) श्रुत : श्रुत का नाम पद्म, मत्स्यपुराण और अग्नि पुराण में नहीं शामिल है।

(44) नाभाग : इक्ष्वाकु वंश में श्रुत के बाद नाभाग राजा बने। भागवत और कल्कि पुराण में इन्हें "नाम" कहा गया है। नाभाग भी इक्ष्वाकु वंश के सामान्य शासक जान पड़ते हैं।

(45) अम्बरीष : इक्ष्वाकुवंश के अम्बरीष नाम के राजा के सम्बन्ध में साक्ष्य ऋग्वेद एवं वायु पुराण में मिलता है, किन्तु कूर्मपुराण, भागवत पुराण व सौर पुराण में इसका वर्णन नहीं किया गया है। लाला सीताराम के अनुसार राजा अम्बरीष भगवान के परम भक्त थे। एक समय द्वादशी के दिन महाराज के यहां दुर्वासा ऋषि आयें।

(46) सिन्धुद्वीप : सिन्धुद्वीप को अम्बरीष के बाद इक्ष्वाकु वंशावली में स्थान दिया है।

(47) अयुतायु : अयुतायु को अग्नि पुराण में श्रुतायु कहा गया है, तथा वहीं ब्रह्मपुराण और शिवपुराण में इसे अयुताजित नान से उद्बोधन किया है। अयुतायु इक्ष्वाकु वंश
का एक सामान्य शासक था।

(48) ऋतुपर्ष : अयुताय के उपरांत इक्ष्वाकु वंशावली में ऋतुपर्ण का वर्णन है। पुराणों में इन्हें नैषध नल का मित्र बताया गया है।202 श्रौत सूत्र में ऋतुवर्ण के नाम का वर्णन हुआ है।

(49) सर्वकर्म : इक्ष्वाकुवंशी शासकों की सूची में सर्वकर्म के नाम का उल्लेख हुआ है। ब्रह्म और हरिवंश पुराण में सर्वकर्म को सर्वकर्मा का पर्याय माना गया है।

(50) सुदास : सुदास का उल्लेख ऋग्वेद में भी हुआ है।

(51) मित्रसह : मित्रसह का समीकरण सौदास, कालमास, पाद आदि नामों से किया जाता है। ब्रह्मपुराण, मत्स्यपुराण, हरिवंशपुराण आदि में वर्णन हुआ है कि मित्रसह और उसके वंशजों ने अयोध्या (कोशल) राज्य पर राज्य किया था।

(52) सर्वकर्मा : सर्वकर्मा मित्रसह कल्याणपाद के बाद कोशल का शासक बना। इसका एक भाई अश्मक था।

(53) अनरण्य : पद्मपुराण अनरण्य या अरण्य को सर्वकर्मा के उपरांत कोशल के शासक के रूप में स्वीकारता है। यद्यपि वायु पुराण मूलक को अगला शासक मानता है, किन्तु अन्य किसी साक्ष्य से इसकी पुष्टि नहीं होती है।

(54) निधन : निधन ने अध्‍योध्‍या पर राज किया लेकिन उनसे जुड़ी जानकारी से जुड़े कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं।

( 55 ) अनमित्र एवं रघु : मत्स्य पुराण के अनुसार अनमित्र निधन के उपरांत कोशल का शासक हुआ। जिसने शीघ्र ही वनगमन किया। तत्पश्चात् रघु प्रथम ने शासक के रूप में शासन किया।

(56) दुलिदुह : शिव, पद्मपुराण, अग्निपुराण, मत्स्य पुराण आदि में दुतिदुह का वर्णन नहीं हुआ है। उपर्युक्त पुराणों ने इक्ष्वाकुवंशीय पीढ़ी में अग्निमित्र के बाद रघु के पुत्र दिलीप द्वितीय को ऐक्ष्वाकु राजा के रूप में माना है।

(57) दिलीप द्वितीय : दिलीप मनु के वंशज थे। ये अत्यंत शक्तिशाली, तेजस्वी एवं पराक्रमी थे। इन्होंने अपनी शक्ति से पूरी पृथ्वी को अपने वश में कर लिया। वें बहुत ही तीव्र दिमाग (बुद्धि) के थे। दिलीप ने रघुवंश के यश में पर्याप्त वृद्धि की एवं अश्वमेध यज्ञ का सम्पादन किया।

(58) रघु : दिलीप के उपरान्त रघु कोशल (अयोध्या) के राजा बने। पिता के द्वारा सभी वीरों के गुण इन्हें प्राप्त थे। कालिदास ने रघुवंश में रघु साम्राज्य को पूरे भरत में फैला हुआ बतलाया है।

(59) अज : अज रघु के पुत्र थे। ब्रह्ममुहूर्त में जन्म लेने के कारण पिता ने ब्रह्मा के नाम पर इनका नाम अज रखा।

(60) दशरथ : 'ऋग्वेद' में दशरथ का वर्णन है, किन्तु इन्हें असुर शासक के रूप में उद्धृत किया गया है। रामायण में दशरथ के सम्बन्ध में पर्याप्त साक्ष्य प्राप्त होता है, जो अयोध्या के शासक थे। इनके अश्वमेध के अवसर पर अनेक इनके अधीन शासक आये थे। कोशल का शासक भानुमन उन्हीं में से एक था। दशरथ ने देवासुर संग्राम में देवताओं का सहयोग किया था।

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(61) श्री राम : मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान के सबसे बड़े अवतार, आदर्श राजा माने जाते हैं।

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भगवान राम ने अयोध्‍या साम्राज्य का बंटवारा किया और लव को श्रावस्ती क्षेत्र व कुश को कुशावती क्षेत्र जो कि कोशल के आधीन था, दे दिया। यहां से आपको कोशल और श्रावस्ती क्षेत्र के राजाओं के नाम मिलेंगे-

(62) लव: राम ने अपने शासन काल में ही अपने पुत्रों को राज्य का बंटवारा कर दिया था लव को श्रावस्ती और कुश को कुशावती का शासक बनाया लेकिन श्रावस्ती और कुशावती दोनों ही कोशल के अधीन थी। कालान्तर में कुश ने इक्ष्वाकु वंश की परम्परा का पालन करते हुए अयोध्या के सिंहासन को सुशोभित किया। लव पूर्ववत् श्रावस्ती पर शासन करते रहे।

(63) पुष्य : पुष्य को कल्कि एवं ब्राह्मण पुराण में पुष्य माना गया है।

(64) ध्रुवसन्धि: पुष्य के बाद श्रावस्ती का शासक ध्रुवसन्धि बना। कल्कि पुराण में (कोशल) ध्रुव 283 और हरिवंशपुराण में अर्थसिद्धि बताया गया है।

(65) सुदर्शन : इक्ष्वाकु शासकों में ध्रुवसन्धि के बाद सुदर्शन का वर्णन मिलता है।

(66) अग्निवर्ण : सुदर्शन के बाद अग्निवर्ण श्रावस्ती के राजा बने। इनका पुराणों में विस्तृत वर्णन नहीं मिलता है।

(67) शीघ्र : शीघ्र इक्ष्वाकु वंश की श्रावस्ती कुल के 67वें स्थान पर आते हैं। ये एक सामान्य राजा थे। जिन्होंने अग्निवर्ण के बाद शासन किया।

(68) मारु : शीघ्र के उपरान्त श्रावस्ती के इक्ष्वाकु वंश में मारू शासक हुआ। जिन्हें वायुपुराण में मनु भी कहा गया है।

(69) प्राशुश्रुत : शिव पुराण में प्रसुश्रुत के लिए पृथुश्रुत नाम भी मिलता है। इन्होंने मारू के उपरान्त इक्ष्वाकुवंशी शासन का पद संभाला।

(70) संधि/सुरोधि : इक्ष्वाकु वंशावली में 70वें स्थान पर आते हैं। संधि का वर्णन पुराणों में भी मिलता है।

(71) अमर्ष या अमर्षण : संधि के उपरान्त श्रावस्ती के राजा अमर्ष हुए। भागवत पुराण में अमर्ष का वर्णन प्राप्त होता है।

(72) महास्वान : इक्ष्वाकु वंश में अमर्ष के उपरान्त अगला राजा महास्वान हुआ। वायु पुराण में हसवान तथा शिव पुराण में मरूत्वान संज्ञा से सम्बोधित महास्वान के उपरान्त विष्णु और वायु पुराणों में विश्रुत्वास तथा वृहदबल को स्थान दिया गया है।

(73) विश्वास्था : विष्णु पुराण में इन्हें विश्रुत्वान नाम समीकृत किया है।

(74) प्रसेनजित : विश्वास्व के उपरान्त प्रसेनजित प्रथम कोशल (श्रावस्ती) का शासक बना। वायु पुराण में इनका वर्णन मिलता है।

(75) तक्षक : इक्ष्वाकु वंशी नरेश तक्षक का वर्णन पुराणों की वंशावली में मिलता है। तक्षक ने एक साधारण राजा के रूप में राज्य किया।

(76) वृहदबल : वृहदबल तक्षक के बाद श्रावस्ती का राजा बना। वृहदबल कौरवों की ओर से महाभारत युद्ध में भी लड़ा था जो कि अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु द्वारा मारा गया।

(77) वृहद्राण : इक्ष्वाकु नरेश बृहद्राण के लिए वृहदतक्षण तथा "वृहत्क्ष्य" नाम का भी प्रयोग किया गया है। इन्होंने वृहदबल के बाद शासन किया।

(78) उरुकक्षया : उरुक्षया इक्ष्वाकु वंशावली में वृहद्राण के बाद रखा गया है।

(79) वत्सवृद्धा : जिन्हें "वत्सयहू" वत्सद्रोह भी कहा गया है। पौराणिक वंशावली में इनका उल्लेख किया है। इन्होंने उरुकक्षया के बाद श्रावस्ती का सिंहासन ग्रहण किया।

(80) प्रतिव्योम : इक्ष्वाकु नरेश प्रतिव्योम का वर्णन वायु पुराण में मिलता है।

(81) दिवाकर : प्रतिव्योम का पुत्र दिवाकर 12 कोशल के शासक बने थे।

(82) सहदेव : कार्यभार सँभाला।

(83) वृहदाश्व : दिवाकर के बाद सहदेव नामक शासक ने कोशल (अयोध्या) का इसका वर्णन मत्स्य पुराण में धवाश्व नाम से किया गया है। यह इक्ष्वाकु वंश का साधारण राजा हुआ।

(84) भानुरथ : भानुरथ भी इक्ष्वाकु वंश का बहुत महत्वाकांक्षी शासक नहीं था। भागवत तथा शिव पुराण में इसे मानुनान और भानुमन भी कहा जाता है। इसका नाम महाभाग भी मिलता है।

(85) प्रतिपाश्व : भानुरथ 'के बाद इक्ष्वाकु वंश वृक्ष में प्रतिमाश्व का नाम आता है। पुराणों में प्रतिकाश्व प्रतिताक्ष्य और प्रतिव्यों" नाम से प्रतिपाश्व को समीकृत किया गया है।

(86) सुप्रतीक : सुप्रतीक, प्रतीपाश्य के बाद इक्ष्वाकु वंश का अगला राजा हुआ। जिसके बारे में अधिक साक्ष्य नहीं मिलते हैं।

(87) मरूदेव : सुप्रतीक के बाद मरूदेव शासक हुआ।

(88) सुनक्षत्र : इक्ष्वाकु वंशीय राजवंशावली में सुनक्षत्र का वर्णन हुआ है। भविष्य पुराण में इसका वर्णन मिलता है।

(89) किनाराश्व या किन्नर : सुनक्षत्र के बाद किन्नराश्व कोशल (अयोध्या) के सिंहासन पर बैठे। शिव और भागवत पुराण इन्हें पुष्कर नान से समीकरण करते हैं।

(90) अन्तरिक्ष : साधारण राजा की तरह केवल वंशावली में शामिल हैं।

(91) सुताप : सुताप के लिए सुर्पण व सुषेण संज्ञा से भी वर्णित किया गया है।

(92) अमित्रजीत : इक्ष्वाकुनरेश सुताप के बाद अमित्रजीत कोशल (अयोध्या) का राजा हुआ। शिव पुराण में इसके लिए अनित्रजीत संज्ञा का वर्णन हुआ है।

(93) वृहदराज : इक्ष्वाकु नरेश वृहदराज को शिव पुराण में वृहदभोज तथा वायु पुराण में भारद्वाज भी कहा गया है।

(94) धर्मिन : भागवतपुराण में वरही तथा मत्स्य पुराण में आपका उल्लेख हुआ है।

(95) कृतन्जय : कृतन्जय ने धर्मिन के बाद कोशल (अयोध्या) के सिंहासन को सुशोभित किया।

(96) रणन्जय : कृतन्जय के बाद कोशल (अयोध्या) के सिंहासन पर रणन्जय आसीन हुआ। गरुण पुराण में इसका नाम धनस्त्रय भी मिलता है।

(97) संजय : संजय का नाम केवल इक्ष्वाकु वंशावली में ही प्रयोग किया गया है।

(98) प्रसेनजीत द्वितीय : तिब्बत के लोग प्रसेनजीत को ब्रह्मदत्त का पुत्र मानते हैं। मान्धाता तथा भगवान राम के बाद ब्रह्मदत्त ही अयोध्‍या के अंतिम महान चक्रवर्ती राजा हुए।

(99) क्षुद्रक या शुद्रक : प्रसेनजित के उपरान्त कोशल (अयोध्या) के राजा हुए।

(100) रणक : भागवतपुराण में शूद्रक के बाद राजा के रूप में रणक का वर्णन है।

(101) सुरथ : रणक के बाद इक्ष्वाकु वंशावली के अगले राजा सुरथ थे।

(102) सुमित्र : सुमित्र इक्ष्वाकु वंशावली का अन्तिम शासक के रूप में जाने जाते हैं। इसके बाद कहीं से भी इक्ष्वाकु वंशीय किसी अन्य शासक का वर्णन नहीं मिलता है।

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अब प्रस्तुत है अयोध्‍या के कोशल क्षेत्र यानी कुशावती क्षेत्र के राजाओं की सूची। चूंकि लव-कुश जुड़वां भाई थे और एक साथ पले बढे थे इसलिए हम यहां से सूची को पुन: नंबर 62 से शुरू कर रहे हैं। इन राजाओं को मिलाकर अयोध्‍या के राजाओं की कुल संख्‍या 102+14 यानी 116 होती है।

अयोध्‍या के कुशावती क्षेत्र के राजाओं की सूची-

(62) कुश : राम के बाद उनके पुत्र कुश को राज्य मिला। राम ने अपने जीवनकाल में ही अपने पुत्रों और भतीजों में बँटवारा कर दिया। जिसमें कुश कुशावती जो कि कोशल के अधीन था, वहाँ का शासक था जो बाद में अयोध्या के शासक बने।

(63) अतिथि : कुश के अतिथि नामक पुत्र हुआ और अयोध्या का राजा बना। वह शक्तिशाली राजाओं पर ही शासन करता था । अतिथि ने अश्वमेध यज्ञ किया था। इस यज्ञ में उन्होंने ब्राह्मणों का इतना सत्कार किया कि वे इन्हें कुबेर ही कहने लगे।

(64) निषध : राजा अतिथि के निषध नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ। निषध भी अद्वितीय वीर थे। जिन्होंने सागर तक फैला पृथ्वी का भोग किया।

(65) नल : निषेध के बाद अग्नि के बाद तेजस्वी पुत्र नल राजा बना। वे इतने यशस्वी थे कि आकाश में गन्धर्व लोग उनका गुणगान एवं यश गाते थे।

(66) नभ : निषेध को नभ के समान साँवला पुत्र पैदा हुआ था। नल ने उसे उत्तर कोशल (अयोध्या) का राज्य सौंप दिया। वे अपने पूर्वजों की तरह ही बड़े ही प्रतापी व शक्तिशाली राजा थे।

(67) पुण्डरीक : नभ के बाद पुण्डरीक इक्ष्वाकु राजा हुए। इनका वर्णन कूर्मपुराण में पुण्डरीकाश नाम से भी हुआ है। जिस प्रकार हाथियों में पुण्डरीक सर्वश्रेष्ठ होता है उसी प्रकार राजाओं में वे श्रेष्ठ थे।

(68) क्षेमधन्वा : क्षेमधन्वा को अग्निपुराण में सुधन्वा भी कहा गया है। पंचविश ब्राह्मण में क्षेमधृत्वा पाण्डरीक नाम का वर्णन है।

(69) देवानीक : रघुवंश में इन्हें प्रिय वचन बोलने वाला व प्रजा रक्षक कहा गया है।

(70) अहिनग : अहिनग बड़े ही प्रभावशाली राजा थे। उन्होंने कभी नीच लोगों का साथ नहीं दिया। युवावस्था में ही पूरी पृथ्वी का भार सँभाला था।

(71) परियात्र : हरिवंश और ब्रह्मपुराण में सम्भवतः सुधन्वा को परियात्र माना गया है। अहिनग के उपरान्त परियात्र ने अयोध्या का राज्य सँभाला।

(72) शंखण / शंखन : वज्रनाभ के बाद शंखण राजा हुआ। उन्हें पुराणों में शंखण शंख, अगुण भी बताया गया है। इसके बारे में विस्तृत जानकारी नहीं प्राप्त होती है।

(73) ध्युविताश्व/ब्युषिताश्व : वज्रनाभ के उपरान्त इक्ष्वाकु वंशावली में विधऋति और विधरित में कहा गया है।

(74) विश्वसह : व्युषिताश्व के बाद विश्वसह राजा बना। रघुवंश में उन्हें सम्पूर्ण पृथ्वी पर शासन करने वाला कहा गया है।

(75) हिरण्यनाभ : हिरण्यनाभ इक्ष्वाकु वंशी शासकों की वंशावली का जिसकी राजधानी अयोध्या थी, का अन्तिम राजा था। इसके बाद अयोध्या का राजधानी का गौरव समाप्त हो गया एवं श्रावस्ती कोशल की नई राजधानी के रूप में स्थापित हुई।

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