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बिहार का विक्रमशिला विश्वविद्यालय, जहां शुरू हुई थी सबसे पहले प्रवेश परीक्षा, तंत्र सीखने आते थे विदेशी

भारत के प्राचिन और सबसे महत्वपूर्ण शैक्षणिक केंद्रों की बात जब भी होती है, तब सबसे पहला नाम नालंदा यूनिवर्सिटी का आता है। जिसकी स्थापना गुप्तकाल के समय कुमारगुप्त प्रथम ने किया था और बख्तियार खिलजी ने जिसे पूरी तरह से जलाकर नेस्तानाबूत कर दिया था। लेकिन नालंदा विश्वविद्यालय से करीब 260 किमी की दूरी पर स्थित बिहार के भागलपुर में स्थित विक्रमशिला विश्वविद्यालय के बारे में अक्सर चर्चाएं नहीं होती है।

काफी कम लोगों को ही पता होगा कि नालंदा विश्वविद्यालय का संपूर्ण प्रशासनिक कार्य विक्रमशिला विश्वविद्यालय से ही किया जाता था। नालंदा विश्वविद्यालय की तरह ही बख्तियार खिलजी विक्रमशिला विश्वविद्यालय की भी बर्बादी का कारण बना था।

vikramshila university

इतिहासकारों का मानना है कि नालंदा विश्वविद्यालय की खराब छात्रवृत्ति के जवाब में ही नालंदा से लगभग 24 मील दूर भागलपुर में पालवंश के शासक धर्मपाल ने (775-800 ई.) में करवाया था। उन्होंने विक्रमशिला को बौद्ध शिक्षा के महान शिक्षण केंद्र के रूप में विकसित किया था। धर्मपाल के उत्तराधिकारी 13वीं शती तक इसे राजकीय संरक्षण प्रदान करते रहते थे।

इस वजह से विक्रमशिला विश्वविद्यालय लगभग 400 सालों से अधिक समय तक एक अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय बना रहा। सिर्फ देश ही नहीं बल्कि विदेशों से भी विक्रमशिला विश्वविद्यालय में तंत्र, व्याकरण, न्याया, तत्त्वज्ञान, दर्शन, बौद्ध धर्म आदि की शिक्षाएं प्राप्त करने छात्र आते थे।

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प्रवेश परीक्षा प्रथा की यहीं हुई थी शुरुआत

माना जाता है कि विक्रमशिला विश्वविद्यालय कई मायनों में बेहद खास था। विक्रमशिला विश्वविद्यालय की प्रशासनिक परिषद ही नालंदा विश्वविद्यालय के कार्यों की देख-रेख के लिए विक्रमशिला विश्वविद्यालय के आचार्यों को नियुक्त किया करती थी। इतना ही नहीं, विक्रमशिला विश्वविद्यालय ही पहली शैक्षणिक संस्थान मानी जाती है, जहां कुलपति की नियुक्ति की गयी थी। विक्रमशिला के सबसे अधिक उल्लेखनिय आचार्यों में दीपंकर श्रीज्ञान का नाम आता है, जो इस विश्वविद्यालय के कुलपति भी थे।

ruins of vikramshila university

इतिहासकारों का मानना है कि वर्तमान समय की तरह ही विक्रमशिला में भी अध्ययन खत्म होने के बाद दीक्षांत समारोह आयोजित किया जाता था, जिसमें समकालीन पाल शासक कुलाधिपति के रूप में उपस्थित होते थे। बताया जाता है कि स्नातक उत्तीर्ण छात्रों को पंडित की उपाधि और उसके बाद महापंडित, उपाध्याय, आचार्य आदि की उपाधियां प्रदान की जाती थी। विक्रमशिला विश्वविद्यालय में प्रवेश मिलना इतना आसान भी नहीं था। कहा जाता है कि यहीं से एडमिशन के लिए प्रवेश परीक्षाओं की शुरुआत हुई थी।

विश्वविद्यालय की संरचना

जानकारी के मुताबिक विक्रमशिला विश्वविद्यालय में कुल 6 महाविद्यालय थे। हर महाविद्यालय में एक केंद्रीय कक्ष होता था और कुल 108 अध्यापक होते थे। महाविद्यालय में जब नये छात्र दाखिल होते थे, तो उन्हें मुख्य द्वार पर बैठे द्वारपंडितों के सवालों का जवाब देकर ही अंदर आने की अनुमति मिलती थी।

यह एक प्रकार का प्रवेश परीक्षा ही होता 6 महाविद्यालयों के मुख्य द्वारों के नाम थे, पूर्व द्वार, पश्चिम द्वार, उत्तर द्वार, दक्षिण द्वार, प्रथम केंद्रीय द्वार और द्वितीय केंद्रीय द्वार। बताया जाता है कि विश्वविद्यालय में कुल मिलाकर लगभग 3000 शिक्षक होते थे और छात्रों की संख्या इससे तीन गुना होती थी।

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नालंदा के बाद ही नष्ट कर दी गयी विक्रमशिला

वर्ष 1199 में कुतुबुद्दीन ऐबक का सेनापति और तुर्की का आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी ने नालंदा विश्वविद्यालय में तहस-नहस कर दिया। वहां उसने पुस्तकालय में भी आग लगा दी। जिसके बारे में कहा जाता है कि वह अगले कई महीनों तक लगातार जलती रही। इसके ठीक कुछ सालों बाद यानी 1203 में बख्तियार खिलजी ने ही विक्रमशिला विश्वविद्यालय को भी नष्ट कर उसमें आग लगा दी। बताया जाता है कि उस समय विक्रमशिला विश्वविद्यालय के कुलपति शाक्यश्रीभद्र थे। कहा जाता है कि वे अपने कुछ अनुयायियों के साथ किसी तरह से बचकर तिब्बत भाग गये।

कालांतर में लगभग 100 एकड़ के क्षेत्र में फैली विक्रमशिला विश्वविद्यालय परिसर सिर्फ खंडहर का ढांचा बन गया। वर्ष 1972 से 1982 तक 10 वर्षों में भारतीय पुरातत्व एवं सर्वेक्षण विभाग की ओर से यहां खुदाई का काम किया गया। बिहार में विक्रमशिला विश्वविद्यालय के ध्वंसावशेषों को देखने के लिए आज भी पर्यटक भागलपुर आते रहते हैं।

FAQs
बख्तियार खिलजी ने विक्रमशिला विश्वविद्यालय को नष्ट क्यों किया?

कहा जाता है कि नालंदा विश्वविद्यालय में ज्ञान की व्यापकता को देखकर बख्तियार खिलजी गुस्से से भर गया था। इसलिए उसने नालंदा यूनिवर्सिटी को जला डाला था। लेकिन विक्रमशिला यूनिवर्सिटी को उसने नष्ट क्यों किया, इसका कोई कारण नहीं मिल पाया है। संभवतः विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना के बाद से ही मिल रही अंतर्राष्ट्रीय ख्याति उसे परेशान कर थी। 

क्या नालंदा और विक्रमशिला विश्वविद्यालय अलग-अलग है?

हां, नालंदा विश्वविद्यालय और विक्रमशिला विश्वविद्यालय दोनों अलग-अलग है। विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना धर्मपाल ने की थी जो पाल वंश के शासक थे। नालंदा विश्वविद्यालय की गलत छात्रवृत्ति के खिलाफ ही उन्होंने विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना की थी। 

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