दुनिया भर में मौजूद बौद्ध धर्म को मानने वाले हर व्यक्ति के लिए बिहार का बोधगया बेहद खास है। हर साल लाखों की संख्या में लोग बोधगया के महाबोधि मंदिर में आते हैं। इस मंदिर को बिहार में 'महान जागृति मंदिर' के नाम से भी जाता है। इस मंदिर की गिनती भारत के 10 सबसे अधिक प्रसिद्ध मंदिरों में होती है।
बिहार या पटना में घूमने या फिर अगर किसी काम से भी आते हैं, तो बोधगया के महाबोधि मंदिर को अपनी Itinerary में जरूर रखिए। बोधगया का महाबोधि मंदिर यूनेस्को की धरोहर लिस्ट में भी शामिल हो चुका है।
किसने बनवाया था यह मंदिर?
बिहार के बोधगया में स्थित बोधिवृक्ष (पीपल के पेड़) के नीचे ही कपिलवस्तु के राजकुमार सिद्धार्थ को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी और वह एक आम इंसान से गौतम बुद्ध बन गये थे। बोधगया में वर्तमान महाबोधी का निर्माण किसने करवाया था, इस बारे में तो कोई सटिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। लेकिन यहां सबसे पहले सम्राट अशोक ने महाबोधि मंदिर का निर्माण तीसरी शताब्दी में करवाया था। वर्तमान मंदिर का निर्माण 5वीं-6वीं शताब्दी में किया गया था।
पूरे मंदिर का निर्माण ग्रेनाइट पत्थरों से किया गया है, जिसपर हाथी, मोर, फूल आदि के चित्र मौजूद हैं। महाबोधि परिसर में ही वह पवित्र बोधिवृक्ष भी मौजूद है जिसके नीचे गौतम बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। इसके अलावा मंदिर के उत्तरी भाग में वह तालाब भी मौजूद है, जिसके बारे में कहा जाता है कि जहां-जहां गौतम बुद्ध ने अपने कदम रखे थे, वहां कमल खिल गये। कहा जाता है कि जब बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए सम्राट अशोक ने अपनी बेटी संघमित्रा को श्रीलंका भेजा था, तब वह अपने साथ बोधिवृक्ष की एक डाली लेकर गयी थी। वहां उसने इसे अनुराधापुर शहर में रोपा था।
यहीं बैठकर बुद्ध ने लगाया था ध्यान
बोधिवृक्ष के ठीक बगल में बलुआ पत्थर से बना एक मंच है, जिसे वज्रासन या हीरा सिंहासन कहा जाता है। यह मंच मुख्य मंदिर से बिल्कुल जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि सम्राट अशोक इस सिंहासन को ठीक उस स्थान को चिन्हित करने के लिए बनाया था, जहां बैठकर बुद्ध ने ध्यान लगाया था। दक्षिण में मुख्य मंदिर की ओर जाने वाले रास्ते में ही एक छोटा सा मंदिर भी है, जिसमें काले पत्थर पर बुद्ध के पदचिन्ह खुदे हुए हैं।
यूनेस्को के मुताबिक यह तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व के ही हैं, जब अशोक ने बौद्ध धर्म की घोषणा की थी। इसके अलावा अलग-अलग जगहों पर बुद्ध और उनके शिष्यों की विभिन्न मुद्राओं में मूर्तियां स्थापित की गयी हैं, जो यह दिखाती हैं कि उस समय इस जगह कितने बड़े-बड़े कुलीन राजा-राजकुमारों का आना-जाना लगा रहता था।
(सभी जानकारियां UNESCO के आधिकारिक वेबसाइट के आधार पर)

कैसे पहुंचे बोधगया
यूनेस्को के मुताबिक महाबोधि मंदिर परिसर का संबंध सीधे तौर पर गौतम बुद्ध के जीवन से है। बोधगया में कोई एयरपोर्ट नहीं है। इसलिए यहां से सबसे नजदीकी एयरपोर्ट गया या फिर पटना एयरपोर्ट है। गया एयरपोर्ट बोधगया से महज 10 किमी की दूरी पर है। पटना बोधगया से 115 किमी की दूरी पर मौजूद है। पटना से बोधगया तक जाने के लिए आपको कैब, टैक्सी या किराए पर गाड़ियां आसानी से मिल जाएंगी। गया रेलवे स्टेशन बोधगया से 13 किमी और पटना रेलवे स्टेशन बोधगया से 110 किमी दूर है।



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