हमारे देश में प्रकृति से लेकर भूमि और हर एक जीव-जंतु में भगवान का वास मानकर उनकी पूजा की जाती है। प्रथम पूज्य के रूप में हाथी के मस्तक वाले भगवान गणेश और उनकी वाहन की पूजा होती है तो महादेव के वाहन के रूप में नंदी बैल और माता दुर्गा व अंबा के वाहन के रूप में शेर और बाघ की पूजा की जाती है। ऐसे कई और उदाहरण भी हैं। इसे एक तरह से इंसानों और प्रकृति के बीच के आपसी संबंधों को गहरा बनाने की पद्धति के तौर पर भी देखा जाता है।
इसी क्रम में भारत में नागपंचमी पर जहरीले सांपों की भी पूजा होती है। इस साल नागपंचमी का त्योहार 9 अगस्त को मनाया जाता है। इस दिन न सिर्फ विधि-विधान के साथ सांपों के बिल पर जाकर लोग सांपों की पूजा करते हैं, बल्कि उन्हें दूध भी चढ़ाया जाता है। अक्सर आपने सांपों के दूध पीने की फोटो या वीडियो देखकर दांतो तले अपनी ऊंगली भी दबा ली होगी।

लेकिन क्या आपने कभी किसी को इन जहरीले सांपों को अपने दांतों से पकड़ते हुए देखा है? क्या आपने कभी भी सांपों के मेले के बारे में सुना, ऐसा मेला जिसमें बच्चे से लेकर बुढ़े तक हर किसी के हाथों में बड़े-बड़े और कुछ तो जहरीले सांप भी होते हैं।
आइए आपको ऐसे मेले के बारे में बताते हैं, जहां असली के जिंदा सांपों को लेकर किसी खेल-खिलौने जैसे लोग नाचते-झूमते हैं।
कहां लगता है यह मेला?
बिहार के समस्तीपुर जिले में नागपंचमी के मौके पर यह मेला लगता है, जिसमें जुटने वाले 'भगत' इन सांपों के कई करतब दिखाते हैं। कोई यहां अपने हाथों में सांपों को लपेटकर करतब दिखाता है तो कोई मुंह में सांपों को पकड़कर ऐसे करतब दिखाता है कि देखने वाले लोग बस मंत्रमुग्ध सा देखते रह जाते हैं। हर साल नागपंचमी के समय लगने वाले इस मेला में लोग बड़ी ही श्रद्धा के साथ शामिल होते हैं और भगतों के कारनामे देखकर अचंभित हो जाते हैं।

कौन हैं भगत और क्या करते हैं कारनामे?
बिहार में स्थानीय स्तर पर सपेरों को लोग भगत के नाम से पुकारते हैं। इस मेले में शामिल होने वाले भगत नदी में डुबकी लगाते हैं और कोई अपने हाथों में तो कोई मुंह में दांतों से सांपों को पकड़कर बाहर निकलते हैं। सबसे अचंभे की बात यह होती है कि इस दौरान सांप किसी को भी नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। नदी से अलग-अलग प्रजातियों के सांप मुंह में दबाकर जब भगत बाहर आते हैं, तो लोग खुशी से तालियां बजाने लगते हैं।
300 साल पुराना है मेले का इतिहास
समस्तीपुर से लगभग 23 किमी की दूरी पर मौजूद सिंधिया घाट पर नागपंचमी के दिन यह अनोखा मेला लगता है। स्थानीय लोगों का मानना है कि समस्तीपुर के नागपंचमी मेले का इतिहास करीब 300 साल पुराना है। मान्यता है कि बरसों पहले इस क्षेत्र में रहने वाले ऋषि-मुनी कुश का सांप बनाकर पूजा किया करते थे। लेकिन अब लोग असली का सांप पकड़कर उसकी पूजा और उससे करतब दिखाते हैं।
सबसे पहले भगत सिंघिया बाजार में मां भगवती के मंदिर में पूजा करने जाते हैं। इसके बाद ढोल-ताशे और मृदंग की धुन पर झूमते हुए बूढ़ी गंडक नदी में डुबकी लगाने और सांपों को मुंह में दबाकर बाहर निकलने का सिलसिला शुरू होता है। प्रतियोगिता भी आयोजित होती है, जिसमें कौन कितनी जल्दी सांप लेकर नदी से बाहर आता है। इस काम में सिर्फ युवा ही नहीं बल्कि बच्चे और बुढ़े भी शामिल होते हैं। इन सांपों में कई बार कोबरा जैसे जहरीले सांप भी शामिल होते हैं।
क्यों किया जाता है ऐसा?
स्थानीय लोग नदी से सांपों को बाहर निकालने को अपनी श्रद्धा से जोड़कर देखते हैं। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार कहा जाता है कि अगर इस दिन सांपों को पकड़कर उनकी पूजा की जाए तो इस दिन भगवान से मांगी गयी हर मुराद पूरी होती है। हालांकि भगतों का कहना है कि परंपरागत रूप से पूजा-पाठ की पूरी प्रक्रिया संपन्न होने के बाद सांपों को सुरक्षित स्थानों पर छोड़ दिया जाता है।
भगत यह भी दावा करते हैं कि आज तक इन सांपों ने किसी को भी नहीं काटा या नुकसान पहुंचाया है। कहा जाता है कि पूरे देश में एकमात्र समस्तीपुर ही वो जगह है, जहां नागपंचमी के दिन सांपों का ऐसा मेला आयोजित किया जाता है। इस वजह से इस मेले का महत्व भी काफी ज्यादा बढ़ जाता है।



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