देवभूमि उत्तराखंड में एक ऐसा मंदिर है, जिसने अपने मूल स्थान से हटने से इंकार कर दिया था और जब उसे जबर्दस्ती अपनी जगह हटाया गया तो जल प्रलय ही आ गया। यह मंदिर है धारी देवी का मंदिर। धारी देवी चारों धामों की रक्षक मानी जाती है।

उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में झील के बीचोंबीच धारी देवी का मंदिर है, जिस पर स्थानीय लोगों की काफी आस्था है। अगली बार आप जब भी देवभूमि और केदारनाथ जाएं तो धारी देवी का दर्शन जरूर करें।
अलकनंदा नदी के बीच में स्थापित है मंदिर
धारी देवी का मंदिर श्रीनगर से लगभग 15 किमी दूर कलियासौड़ इलाके में अलकनंदा नदी के बीचों बीच स्थापित है। देवी काली को समर्पित ना सिर्फ इस मंदिर को चमत्कारी माना जाता है बल्कि मंदिर में स्थापित देवी मां की मूर्ति भी काफी विचित्र है। माना जाता है कि मूल मंदिर में मां धारी की प्रतिमा द्वापर युग में स्थापित की गयी थी।

कहा जाता है कि राजा अजयपाल पंवार ने धारी देवी के आर्शिवाद से ही 52 गढ़ों को हराकर गढ़वाल की स्थापना की थी। आदि गुरु शंकराचार्य जी, जिन्हें वैधों ने लगभग मरा हुआ ही मान लिया था, धारी देवी की शरण में आने के बाद ही स्वस्थ्य हो गये और उन्होंने चार धामों की स्थापना की।
मूर्ति की खासियत
धारी देवी को स्थानीय लोग चमत्कारी देवी के तौर पर पूजते हैं। मां काली को समर्पित इस मंदिर में देवी धारी की मूर्ति का सिर्फ ऊपरी हिस्सा ही स्थित है। मूर्ति का निचला आधा हिस्सा कालीमठ में स्थित है, जहां वह देवी काली के रूप में पूजी जाती हैं।

कहा जाता है कि धारी देवी की मूर्ति दिन में 3 बार अपना स्वरूप बदलती है। सुबह के समय वह एक छोटी बच्ची, दोपहर में युवती और शाम के समय वह बुढ़ी औरत के रूप में नजर आती है। यह स्थान 108 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है।
मंदिर से जुड़ी कई लोक कथाएं
बाढ़ में बहकर आयी थी मूर्ति

धारी देवी मंदिर के स्थापना से जुड़ी एक पौराणिक कथा के अनुसार एक बार भीषण बाढ़ में एक मंदिर बह गया था। मंदिर की मूर्ति पानी में बहती हुई आयी और धारो गांव के पास एक चट्टान के पास रुक गयी थी। फिर मूर्ति के अंदर से एक दिव्य आवाज आयी, जिसने गांववालों से मूर्ति को स्थापित करने का आदेश दिया। इसके बाद गांववालों ने धारीदेवी की स्थापना की।
जब भी मंदिर से हुई छेड़छाड़ आयी भारी तबाही
धारी देवी मंदिर में लोग पूरी निष्ठा और नियमों का पालन करते हुए पूजा-पाठ करते हैं। हालांकि देवी मां ने कभी भी पूजा-पाठ की वजह से ग्रामिणों को दंडित नहीं किया है लेकिन लोग भक्तिभाव से सभी नियमों का पालन करते हैं। 18वीं सदी में एक बार मंदिर से छेड़छाड़ हुई थी, जिसके बाद भारी तबाही हुई थी।

कहा जाता है कि श्रीनगर जैसे पहाड़ी क्षेत्र को भी उस प्रलय ने उजाड़कर मैदानी रूप दे दिया था। कहा जाता है कि 1882 में ऐसा ही प्रयास एक स्थानीय राजा ने भी की थी जिसके बाद आए भूस्खलन में केदारनाथ समतल बन गया था।
मंदिर को मूल स्थान से हटाया गया तो आ गया जल प्रलय
16 जून 2013 को अलकनंदा हाइड्रो पावर द्वारा निर्मित अलकनंदा हाइड्रो इलेक्ट्रिक बांध के निर्माण के लिए कंपनी ने धारी देवी मंदिर को मूल स्थान से हटाकर 611 मीटर की ऊंचाई पर एक कंक्रीट के मंच पर स्थानांतरित कर दिया था। हालांकि स्थानीय लोगों ने इसका भारी विरोध किया था लेकिन कंपनी ने उनकी बात नहीं मानी।

मान्यता है कि देवी की मूर्ति को स्थानांतरित करने के कुछ घंटों बाद ही बादल फटने की वजह से केदारनाथ में जल प्रलय आया था। इसमें केदारनाथ मंदिर के अलावा बाकी सब कुछ बह गया था, हजारों लोगों की जान चली गयी थी। इसे धारी देवी का ही प्रकोप माना जाता है जिसके बाद मंदिर को उसके मूल स्थान पर फिर से बनाया गया।



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