हिंदू मान्यताओं के अनुसार दिवाली का त्योहार काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। इसे अंधेरे पर प्रकाश की जीत के प्रतिक के तौर पर भी मनाया जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार 14 सालों का वनवास खत्म कर भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण के साथ जिस दिन अयोध्या वापस लौटे थे, उस दिन अयोध्यावासियों ने दीयों से पूरी अयोध्या नगरी को सजाया था।

इसके साथ ही माना जाता है कि समुद्र मंथन के बाद मां लक्ष्मी का जन्म भी दिवाली के दिन ही हुआ था। इस वजह से ही दिवाली के दिन खास तौर पर देवी लक्ष्मी की पूजा की जाती है। इस साल दिवाली 12 नवंबर को मनायी जाएगी।
कब है दिवाली की पूजा का मुहूर्त
हिंदू कैलेंडर के अनुसार इस साल दिवाली 12 नवंबर 2023 को मनायी जाएगी। 12 नवंबर की दोपहर 2 बजकर 44 मिनट से 13 नवंबर दोपहर 2 बजकर 56 मिनट तक अमावश्या की तिथि रहेगी। 12 नवंबर 2023 की शाम को 6.11 बजे से रात 8.15 बजे तक लक्ष्मी पूजा का शुभ मुहूर्त है। दिवाली 1 दिन का त्योहार नहीं बल्कि यह 5 दिनों का त्योहार होता है।

इसकी शुरुआत धनतेरस (10 नवंबर 2023) के साथ होती है। दूसरे दिन छोटी दिवाली या नरक चतुर्दशी (11 नवंबर 2023) मनायी जाती है। तीसरा दिन दिवाली (12 नवंबर 2023) होता है। चौथे दिन गोवर्धन पूजा (13 नवंबर 2023) होती है। 5वें और आखिरी दिन भाई दूज (14 नवंबर 2023) को मनायी जाती है।
अलग-अलग राज्यों की दिवाली समारोह के बारे में बताने से पहले हम आपको बता दें, दिवाली से कुछ दिनों बाद ही मुख्य रूप से वाराणसी में बड़े ही धुमधाम से देव दिवाली मनायी जाती है।
कब और क्यों मनायी जाती है देव दिवाली
हिंदू कैलेंडर के अनुसार इस साल वाराणसी में देव दिवाली 26 नवंबर 2023 को मनायी जाएगी। मुख्य रूप से काशी के गंगा घाटों, मंदिरों, कुंडों, तालाबों के किनारे मनाए जाने वाला यह पर्व सिर्फ वाराणसी ही नहीं बल्कि विश्व विख्यात है। अगर हम यह कहें कि दिवाली से ज्यादा वाराणसी में देव दीपावली की धुम रहती है, तो यह कहना गलत नहीं होगा।

माना जाता है कि इस दिन स्वर्ग से सभी देवी-देवताएं पवित्र गंगा में डुबकी लगाने के लिए धरती पर उतरते हैं। इसलिए देवी गंगा की विशेष पूजा आयोजित की जाती है और सभी गंगा घाटों को दीयों से रोशन किया जाता है। नदी के किनारों पर दीयों को सजाने के साथ-साथ मन को मोह लेने वाली रंगोली भी बनायी जाती है। इसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग इस समय यहां पहुंचते हैं।
अब बताते हैं विभिन्न राज्यों में कैसे मनायी जाती है दिवाली
पश्चिम बंगाल
दिवाली के दिन पश्चिम बंगाल में मां काली की पूजा की जाती है। चुंकि दिवाली अमावश्या की रात को मनायी जाती है, इसलिए माना जाता है कि मां काली की पूजा या तंत्र साधना के लिए यह दिन बिल्कुल उचित होता है। स्थानीय लोग इसे 'श्यामा पूजा' के नाम से जानते हैं। इस दिन कोलकाता समेत राज्य भर के हर एक काली मंदिर की खास तौर पर सजावट की जाती है और मां काली की विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है।

इसके अलावा विभिन्न श्यामा पूजा क्लब भी काली पूजा का आयोजन करते हैं। आम तौर पर इस पूजा का मुहूर्त रात को 10 बजे के बाद से ही शुरू होता है। भक्त पूरी रात जागकर रात भर चलने वाली इस पूजा में हिस्सा लेते हैं। मां काली को गुड़हल या जवाकुसुम और अपराजिता के फूलों से सजाया जाता है।
गुजरात
गुजरात में दिवाली को नववर्ष के तौर पर भी मनाया जाता है। इस दिन गुजराती साल खत्म होता है और अगले दिन नववर्ष की शुरुआत होती है। इसलिए गुजरात में दिवाली पर दोहरी खुशियां मनायी जाती है। गुजराती नववर्ष बेस्टु वरस मनाया जाता है जिसके उत्सव की शुरुआत वाग बरस से होती है। वाग बरस के अगले दिन से क्रमशः धनतेरस, नर्क चतुर्दशी, दिवाली, बेस्टु वरस और भाई बिज मनाया जाता है।

चुंकि गुजरात में अधिकांश व्यक्ति व्यवसाय से जुड़े होते हैं, इसलिए यहां दिवाली पर लक्ष्मी-गणेश की पूजा का विशेष प्रावधान है। दिवाली के दिन हर घर में घी के दीये जलाए जाते हैं जो पूरी रात जलती है। अगली सुबह इस दीये की लौ से कालिख एकत्र कर महिलाएं उससे काजल बनाती हैं, जिसे आंखों में लगाती हैं। इसे गुजरात में बहुत शुभ प्रथा मानी जाती है।
गोवा
गोवा में दिवाली पूरी तरह से भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित माना जाता है। गोवा में, दिवाली भगवान श्रीकृष्ण के सम्मान में मनायी जाती है। इस दिन को श्रीकृष्ण के नरकासुर वध से जोड़कर यहां मनाया जाता है। दिवाली से एक दिन पहले जब पूरे देश में नर्क चतुर्दशी मनाया जाता है, उस दिन गोवा में नरकासुर की विशाल मूर्ति बनाकर, उसे रावण दहन के तर्ज पर जलाया जाता है।

कई लोग इसके बाद अपने शरीर पर नारियल तेल लगाते हैं और मानते हैं कि इससे वे पाप मुक्त हो जाएंगे। माना जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर का वध करने के बाद अपने शरीर से तेल के धब्बों को मिटाने के लिए तेल से स्नान किया था। ऐसा कर्नाटक में भी किया जाता है।
तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्रप्रदेश
दक्षिण भारत के राज्यों में दिवाली 5 नहीं 2 दिनों का त्योहार होता है। यहां लोग दिवाली के दिन सुबह के समय अपने घरों को साफ करके सबसे पहले रंगोली बनाते हैं। परंपरानुसार अगर घर में कोई नवविवाहिता होती है, तो उस जोड़े को दिवाली मनाने के लिए वधु के घर जाना पड़ता है जहां उनका स्वागत परंपरागत तरीके से किया जाता है। शाम के वक्त शगुन के रूप में पटाखे फोड़े जाते हैं।

तमिलनाडु में दिवाली पर दीपक जलाने, नर्क चतुर्दशी के दिन पारंपरिक स्नान, रंगोली का काफी ज्यादा महत्व है। आंध्र प्रदेश में माना जाता है कि नरकासुर का वध श्रीकृष्ण की पत्नी सत्यभामा ने किया था। इसलिए इस दिन सत्यभामा की मिट्टी से बनी मूर्ति तैयार कर विशेष पूजा की जाती है। कर्नाटक में नर्क चतुर्दशी को अश्विजा कृष्ण चतुर्दशी कहा जाता है। इस दिन तेल से स्नान करने का प्रावधान है।

दिवाली के दिन को बाली पदयमी के नाम से जाना जाता है, जो भगवान विष्णु के वामनावतार से जुड़ा हुआ है। इस दिन महिलाएं घरों को गाय के गोबर से लिपती और रंगोली से सजाती हैं। मंदिरों में विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है।
दिवाली का त्योहार देश के सभी राज्यों में चाहे जैसे भी मनाया जाता हो, लेकिन हर राज्य जश्न में कुछ चीजें कॉमन होती हैं। दिवाली पर विशेष पूजा आयोजित करना, घर की साफ-सफाई, रंगोली से सजाना, दीयों से सजाना, खास पकवान बनाना और ढेर सारे पटाखे छुड़ाना। ये कुछ चीजें हैं जो भारत को विविधताओं में भी एक सूत्र में बांधे रखता है।



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