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मध्य प्रदेश के इस मंदिर में श्रीराम के बिना ही होती है मां जानकी की पूजा, जानिए क्यों होता है ऐसा?

राधा कृष्ण हो, गौरी शंकर हो, लक्ष्मी नारायण या फिर सियाराम। आपने गौर किया होगा कि हर जगह देवी-देवताओं के नाम उनके जोड़ीदार के साथ लिया जाता है। कहा जाता है कि भगवान की पूजा जोड़ी में करने पर फल भी दोगुना मिलता है। लेकिन क्या आपको पता है मध्य प्रदेश में भारत का एकलौता मंदिर है, जहां माता जानकी की पूजा भगवान श्रीराम के साथ नहीं होती है।

temple in madhya pradesh

जी हां, दिवाली के समय इस मंदिर में माता सीता के दर्शन करने के लिए भक्तों की भीड़ भी उमड़ती है जो मंदिर में अकेली स्थापित माता सीता की पूजा कर खुद को धन्य मानते हैं। इस मंदिर मन्नत पूरी होने के बाद बड़ी ही अनोखी रस्म निभायी जाती है, जिसे कभी बॉलीवुड स्टार सुनील दत्त ने अपने बेट संजय दत्त के लिए भी निभाया था।

कहां है यह अनोखा मंदिर

मध्य प्रदेश के अशोकनगर जिले में स्थित करीला में माता सीता का यह मंदिर स्थित है, जिसे करीला माता का मंदिर कहा जाता है। यह मंदिर अशोकनगर से करीब 35 किमी की दूरी पर मुंगावली तहसील की एक निर्जन पहाड़ी पर मौजूद है। इस मंदिर में भगवान राम के बिना माता सीता की अकेली प्रतिमा स्थापित है। मंदिर में माता सीता के दोनों पुत्र लव और कुश की भी पूजा की जाती है लेकिन रघुनंदन श्रीराम की कोई प्रतिमा इस मंदिर परिसर में कहीं भी स्थापित नहीं है।

क्यों नहीं है प्रभु श्रीराम की प्रतिमा

मध्य प्रदेश का करीला कोई आम जगह नहीं है। इस स्थान का संबंध रामायणकाल से माना जाता है। छिपकर जब राजा राम ने अपनी एक प्रजा धोबी की बातें सुन ली उसके बाद उन्होंने अपनी पत्नी माता सीता को जंगल में छोड़ आने का आदेश दिया। इस आदेश का पालन करने की जिम्मेदारी उनके छोटे भाई लक्ष्मण को सौंपी गयी। दरअसल, करीला को ही वह स्थान माना जाता है जहां लक्ष्मण ने माता सीता, जो उस समय गर्भावस्था में थी, को गहरे वन में छोड़ दिया था।

goddess sita

इस स्थान पर कभी महर्षी वाल्मीकि का आश्रम हुआ करता था, जहां माता सीता के दोनों पुत्रों लव और कुश का जन्म हुआ था। इस स्थान पर ही लव-कुश ने अंजाने में ही अपने पिता श्रीराम के अश्वमेध यज्ञ के घोड़े को पकड़ लिया था। इसलिए करीला माता मंदिर में भगवान श्रीराम नहीं बल्कि माता सीता की पूजा अकेले होती है और इस मंदिर में लव-कुश की पूजा भी की जाती है।

मन्नत पूरी होने पर निभाया जाता है अनोखा रस्म

इस मंदिर के बारे में मान्यता है कि यहां सच्चे दिल से मांगी पर हर मन्नत जरूर पूरी होती है। मन्नत पूरी होने के बाद एक अनोखी रस्म निभाई जाती है, जिसका पालन कभी बॉलीवुड स्टार सुनील दत्त ने भी किया था। करीला माता मंदिर में होली के समय रंगपंचमी का मेला लगता है। इस मेले को लव-कुश के जन्म के उत्सव के तौर पर मनाया जाता है जिसमें बधाई के गीत गाये जाते हैं। कहा जाता है कि जब लव-कुश का जन्म हुआ था, तब अप्सराएं धरती पर कराली में उतर आयी थी और उन्होंने रंगपंचमी के उत्सव की शुरुआत की थी।

sita temple

मंदिर की पुरानी मान्यताओं के अनुसार अगर किसी व्यक्ति की मन्नत पूरी हो जाती है तो वह करीला मंदिर में राई और बधाई नृत्य करवाता है, जिसे बेड़िया जाति की महिलाएं मंदिर के अंदर नाचती हैं। आर्म्स ऐक्ट के तहत जब बॉलीवुड एक्टर संजय दत्त को जेल हुई थी, तब उनके पिता सुनील दत्त ने इस मंदिर में मन्नत मांगी थी। जब संजय दत्त जेल से रिहा हो गये तो उन्होंने बेड़नियों द्वारा राई और बधाई नृत्य करवाया था। कहा जाता है कि रंगपंचमी के मेले के समय करीब 25 लाख लोग माता जानकी के दरबार में हर रोज अपनी हाजिरी लगाते हैं।

सपने में मिला था वीरान आश्रम होने की जानकारी

मध्य प्रदेश के करीला में मां जानकी के मंदिर से जुड़ी करीब 200 साल पुरानी एक कथा खूब प्रचलित है। इस कहानी के मुताबिक मध्य प्रदेश के विदिशा जिले में दीपनाखेड़ा गांव में महंत तपसी महाराज रहा करते थे। उन्हें एक रात को सपना आया कि करीला ग्राम में टीले पर एक आश्रम है, जहां माता जानकी अपने दोनों पुत्रों लव और कुश के साथ कुछ समय तक रही हैं।

यह महर्षी वाल्मीकि का आश्रम है, जो वीरान पड़ा हुआ है, उसे फिर से जीवित करे। अगली सुबह ही महंत करीला टीला की तरफ निकल पड़े और उन्हें वास्तव में वहां वीरान आश्रम मिला। वह खुद इस आश्रम की सफाई में जुट गये और फिर धीरे-धीरे पूरे गांव के लोगों ने मिलकर इस आश्रम की सफाई की और यहां माता जानकी का मंदिर स्थापित किया।

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