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जूनागढ़ का महाबत मकबरा है इंडो-इस्लामिक और फ्रेंच वास्तुकला का मिश्रित खजाना

आपने इंडो-इस्लामिक या इंडो-फ्रेंच वास्तुकला के ढेर सारे उदाहरण देखे होंगे। लेकिन क्या आपने कभी कोई ऐसी इमारत भी देखी है जिसकी वास्तुकला में इंडो-इस्लामिक और फ्रेंच तीनों प्रकार की वास्तुकला का मिश्रण हो? जी हां, गुजरात के जूनागढ़ में ऐसा ही एक मकबरा है जिसकी वास्तुकला तीनों शैलियों का मिश्रण है। 19वीं सदी में बना महाबत का मकबरा जूनागढ़ की पहचान का अभिन्न हिस्सा है।

mahabat maqbara junagadh

जूनागढ़ जंक्शन से महज कुछ किमी की दूरी पर ही मौजूद महबत का मकबरा को बहादुरुद्दीन भाई हसनभाई का मकबरा भी कहा जाता है। यह गुजरात के उन ऐतिहासिक चुनिंदा जगहों में से एक है, जिन्हें गुजरात घूमने आने वाले हर पर्यटक को अपनी लिस्ट में शामिल करना चाहिए। जानकारी के अनुसार वर्ष 1878 में महाबत खानजी के आदेश पर इस मकबरे का निर्माण शुरू हुआ था।

महाबत खानजी जूनागढ़ के छठवें नवाब थे। 1892 में उनके उत्तराधिकारी बहादुर कांजी ने इसका निर्माण पूरा करवाया था। मकबरे में महाबत खान द्वितीय और नवाब रसूर खानजी के मंत्री बहादुरुद्दीन भाई हसनभाई की कब्रें हैं। वर्ष 1947 में जब भारत को आजादी मिली, तो जूनागढ़ के तत्कालिन शासक महाबत खान तृतिय ने जूनागढ़ भारत के बजाय पाकिस्तान में शामिल होने के लिए सहमत होने की घोषणा कर दी। हालांकि इस राज्य की कोई भी सीमा नये बने देश पाकिस्तान के साथ नहीं मिलती थी।

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लेकिन जूनागढ़ की हिंदू आबादी ने विलय के खिलाफ एक गंभीर विद्रोह छेड़ दिया जिससे शासक का पतन हो गया। अंत में, महाबत खान तृतिय ने भारत छोड़ने का फैसला कर लिया। आजादी के बाद जूनागढ़ को भारत सरकार के हाथों में छोड़कर, वह पाकिस्तान के सिंध प्रांत में बस गए। महाबत का मकबरा अपनी शानदार वास्तुकला के कारण काफी प्रसिद्ध है। मकबरा परिसर की सबसे बड़ी खासियत है कि इसकी फर्श से लेकर लिंटेल तक फ्रेंच वास्तुकला है। दरवाजे और स्तंभों में गॉथिक वास्तुकला का शानदार काम किया गया है।

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मकबरा परिसर में गुंबदनुमा बनावट का जटिल समूह है जिसे देखकर किसी की भी आंखें बस फटी की फटी रह जाती हैं। अगर इस मकबरे को एक झकल देखी जाए तो यह बिल्कुल ताजमहल जैसा ही दिखता है। मुख्य गोलाकार गुंबदनुमा आकृति के चारों तरफ चार मीनारें हैं, जिनके चारों गोलाकार में सीढ़ियां बनी हुई हैं। ये सीढ़ियां इसकी खूबसूरती को कई गुना बढ़ा देती है। मकबरे की मीनारों पर पत्थर से सुन्दर नक्काशी की गयी है। मकबरा के अंदर कई हवेली भी मौजूद हैं, जिनमें लकड़ी का काफी सुन्दर काम किया गया है।

लकड़ी पर की गयी ये नक्काशियां गुजरात की घरेलू वास्तुकला से काफी हद तक मिलती-जुलती है। अगर आप जूनागढ़ में महाबत का मकबरा घूमने जाना चाहते हैं तो सबसे अच्छा समय नवंबर से फरवरी माह के बीच का है, क्योंकि उमस वाली गर्मी से आपको परेशानी नहीं होगी। महाबत का मकबरा में प्रवेश निःशुल्क है। बता दें, बहादुरुद्दीनभाई हसनभाई का मकबरा केवल बाहर से ही देखा जा सकता है।

यह मकबरा जूनागढ़ रेलवे स्टेशन से एकदम पास में एम.जी. रोड के ठीक विपरित में स्थित है।

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