देशभर में कई जगहों की होली काफी फेमस है। जैसे मथुरा, वृंदावन और बरसाना की रंगों, गुलाल और कीचड़ या लट्ठमार होली। वहीं काशी के मणिकर्णिका घाट की भष्म होली भी देखने लायक होती है। लेकिन क्या आपने कभी पहाड़ों वाली होली खेली है? पहाड़ों वाली मैगी और मोमो का स्वाद आपने जरूर चखा होगा, लेकिन कभी पहाड़ों वाली होली का आनंद उठाया है!
अगर नहीं तो फिर ज्यादा सोच-विचार न करते हुए इस साल होली पर हिमाचल प्रदेश की ट्रिप पर जाने का प्लान बना लें। यकिन मानिए पहाड़ों वाली होली खेलने के बाद आप भी जरूर कहेंगे कि जीवन में एक बार होली या फिर पहाड़ों से प्यार करने वालों को यहां की होली जरूर खेलनी चाहिए।

हम जिस पहाड़ों वाली अनोखी होली की बात कर रहे हैं, वह खेली जाती है हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले के सांगला में। यहां होली एक नहीं बल्कि 4 दिनों तक मनायी जाती है। सांगला की होली अपनी समृद्ध लोक संस्कृति की वजह से पर्यटकों को बेहद आकर्षित करती है।
इस दौरान लोग यहां एक-दूसरे को सिर्फ रंग-गुलाल में ही नहीं रंगते हैं बल्कि रंग-बिरंगी वेशभूषा में तैयार होकर नाटिकाओं का मंचन भी करते हैं। होली के समय पूरे सांगला वाली समूह बनाकर बैरिंगनाग मंदिर के प्रांगण में इकट्ठा होते हैं। इसके बाद रामायण से लेकर महाभारत तक के चरित्र में तैयार होकर आए कलाकार उन नाटकों को प्रस्तुत करते हैं।

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शहरों की तरह यहां पूरे दिन बस हुड़दंग नहीं मचाया जाता है बल्कि भगवान का आर्शिवाद लेकर एक-दूसरे को स्वादिष्ट व्यंजन और मिठाईयां भी खिलायी जाती हैं। इसके बाद किन्नौरी वाद्ययंत्रों की धुन पर नाच-गाने के साथ होली का त्योहार मनाया जाता है। सांगला की होली इतनी अनोखी होती है कि उस समय यहां सिर्फ गांव के या हिमाचल प्रदेश के निवासी ही नहीं बल्कि यहां घूमने आने वाले पर्यटक भी मंदिर परिसर में खींचे चले आते हैं।

होली के समय ग्रामिण एक समय का भोजन मंदिर में ही करते हैं। अगर आपको भी नयी-नयी जगहों पर घूमने के साथ उनकी संस्कृतियों के बारे में करीब से जानने या उन्हें महसूस करना और स्थानीय उत्सवों में शामिल होने का शौक है तो इस साल पहाड़ों वाली होली जरूर मनाएं।



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