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जाने एक ट्रैवलर के नजरिये से विदिशा में क्या है खास

By Goldi

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से करीबन 56 किमी की दूरी विदिशा एक प्राचीन और ऐतिहासिक शहर है। कहा जाता है कि, करीबन करीब 2600 साल पहले यह जगह व्यपार का प्रमुख केन्द्र था।

अगर इतिहास के पन्नों को पलटकर देखा जाये तो , इस जिले पर 1000 साल पहले सम्राट अशोक विदिशा के गवर्नर हुआ करते थे। बता दें, विदिशा में ही शाहरुख़ खान अभिनीत फिल्म अशोका की शूटिंग सम्पन्न हुई थी ।

भारत के प्राचीन नगरों में शुमार विदिशा हिंदू तथा जैन धर्म के समृद्ध केन्द्र के रूप में जानी जाती है। अज भी इस नगर में जीर्ण अवस्था में बिखरी पड़ी कई खंडहरनुमा इमारतें इस क्षेत्र के ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक दृष्टि को बताती है। अगर बात विदिशा के पर्यटन की, की जाये तो यह इतिहास प्रेमियों के लिए एकदम उपयुक्त स्थान है। इस नगर को घूमते हुए पर्यटक यहां कई कई प्रसिद्ध मूर्तियां, शिलालेख, खंडहर और पुरातात्विक कार्यस्थल को देख सकते हैं, इसके अलावा यहां कुछ महत्वपूर्ण मंदिरों में गिरधारी मंदिर, उदयेश्वर मंदिर, दशावतार मंदिर, मालादेवी मंदिर, के साथ प्रमुख तीर्थस्थल बीजामंडल है जो अब खंडहर में तब्दील हो चुका है। आइये जानते हैं कि, गर्मियों की छुट्टियों में आपको विदिशा की यात्रा क्यों करनी चाहिए

दशावतार मंदिर

दशावतार मंदिर

गाडरमल मंदिर

गाडरमल मंदिर

विदिशा का प्रमुख आकर्षणों में से एक गाडरमल मंदिर, विजयमंदिरा मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। 11वीं शताब्दी में बने इस मंदिर में परमार काल के एक बड़े मंदिर के अवशेष देखे जा सकते हैं। इसकी आधी अधूरी बनावट और आधारशिला को देखकर यह समझा जा सकता है कि इसका निर्माण कार्य पूरा नहीं हो पाया।

मंदिर के पास में ही एक मस्जिद स्थापित है, मस्जिद को आलमगीर मस्जिद कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि इसका निर्माण मुगल बादशाह औरंगजेब के शासनकाल में किया गया था। इस परिसर में सातवीं शताब्दी की एक सीढ़ी वाली बावड़ी भी है, जो इस मंदिर को और भी समृद्ध बना देती है। बावड़ी में दो लंबे स्तंभ हैं, जिन पर कृष्ण के जीवन दृश्यों का वर्णन किया गया है। ऐसा माना जाता है कृष्ण के ये जीवन दृश्य मध्य भारत की प्रारंभिक कला की निशानी है।

सोला खंबी मंदिर

सोला खंबी मंदिर

बदोह कस्बे के कुरवाई में स्थित सोला खंबी मंदिर का संबंध गुप्त काल से है। एक स्थानीय झील के उत्तरी छोर पर स्थित यह मंदिर बेहद खूबसूरत दिखता है। इस मंदिर सोला खंबी मंदिर नाम इस मंदिर के 16 खम्बों से बनकर मिला है, करीबन 8 वर्ग मीटर में फैला यह मंदिर 1.5 मीटर के आधार पर टिका है।

भद्दिलपुर

भद्दिलपुर

जैनियों के दसवें तीर्थंकर भगवान शीतलनाथ की पावन जन्मभूमि के कारण, भद्दिलपुर जैनियों का प्रमुख धार्मिक तीर्थ स्थल है।

उदयगिरी की गुफायें

उदयगिरी की गुफायें

विदिशा से 6 किमी दूर बेतवा और वैस नदी के बीच में उदयगिरी की गुफायें बेहद जटिल नक्काशी के लिए जानी जाती है। भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण द्वारा सुरक्षित इन गुफाओं में कई बौद्ध अवशेष भी पाये गये हैं, और इन गुफा में की गई नक्काशी और अभिलेख का खास ऐतिहासिक महत्व है। इस गुफा में पाए जाने वाली अधिकांश मूर्ति भगवान शिव और उनके अवतार को समर्पित है। गुफा में भगवान विष्णु के लेटे हुए मुद्रा में एक प्रतिमा है, जिसे जरूर देखना चाहिए। पत्थरों को काट कर बनाई ये गुफाएं गुप्त काल के कारीगरों के कौशल और कल्पनाशीलता का जीता जागता उदाहरण है।

लोहंगी पीर

लोहंगी पीर

चट्टानों से निर्मित लोहंगी पीर पूरे विदिशा में फैला हुआ है। चट्टान की यह संरचना 7 मीटर ऊंची है और इसकी चोटी चिपटी है, जिसका व्यास करीब 10 मीटर है। यहां लोहंगी पीर के नाम पर एक कब्र भी है। इस पहाड़ी चट्टान से विदिशा के चारों को देखा जा सकता है। इस जगह को घूमते हुए पर्यटक ईसा पूर्व पहली शताब्दी का एक टेंक और एक विशाल बेल केपिटल भी देख सकते हैं।

गरुण स्तंभ

गरुण स्तंभ

Pc:Dilipkumarftii1977

विदिशा रेलवे स्टेशन से 4 किमी दूर पर स्थित गरुण स्तंभ भगवान वासुदेव को समर्पित है, जिसका निर्माण हेलियोडोरस ने कराया था। खम्बे पर दर्ज अभिलेखों की माने तो लियोडोरस ऐसे पहले विदेशी थे जो भगवान विष्णु की पूजा करते थे। स्थानीय लोगों के बीच यह खंबा बाबा के नाम से जाना जाता है। इस स्तंभ की चोटी पर गरुड़ की एक मूर्ति बनी हुई है। हल्के भूरे रंग के इस स्तंभ के तीन भाग हैं- फलकित छड़, बेल केपिटल और गरुड़ की मूर्ति जो कि एक क्षतिग्रस्त एबेकस पर स्थित है।

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