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जन्माष्टमी स्पेशल : श्रीकृष्ण के इस मंदिर के कपाट खोलने के लिए हथौड़ा लेकर जाते हैं पुजारी, क्यों?

क्या कभी आपने किसी ऐसे मंदिर के बारे में सुना है, अहले सुबह जिसके कपाट खोलने के लिए जाते समय पुजारी अपने साथ हथौड़ा लेकर जाते हो? जी हां, ऐसा एक मंदिर केरल में मौजूद है। यह मंदिर श्रीकृष्ण को समर्पित है। लेकिन मंदिर के कपाट खोलने में भला हथौड़े का क्या काम? क्या इस मंदिर में हर दिन चोरी-चकारी होती रहती है या सुबह-सुबह नारियल फोड़ने के बाद ही मंदिर के द्वार खोले जाते हैं?

क्यों श्रीकृष्ण के इस मंदिर के द्वार खोलने जाते समय पुजारी हर दिन अपने साथ एक भारी-भरकम हथौड़ा लेकर जाता है?

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जन्माष्टमी से पहले आइए इस अनोखे मंदिर के बारे में जान लेते हैं :

कहां है यह अनोखा मंदिर?

भगवान श्रीकृष्ण का यह अनोखा मंदिर दक्षिण भारतीय राज्य केरल के कोट्टायम जिले में तिरुवेरपु में मौजूद है। इस मंदिर का नाम 'तिरुवरप्पु श्रीकृष्ण स्वामी मंदिर' है। यह मंदिर एक बेहद रहस्यमयी मंदिर माना जाता है, जिसके बारे में कोई वैज्ञानिक व्याख्या नहीं मिलती है। स्थानीय लोगों के अलावा इस मंदिर में भगवान के दर्शन करने अलग-अलग देशों के राजा भी आया करते हैं। स्थानीय लोगों की मानें तो इस मंदिर का इतिहास करीब 1500 साल से ज्यादा पुराना है। कई लोगों का मानना है कि इस मंदिर का निर्माण किसी इंसान ने नहीं बल्कि स्वयं ईश्वर ने किया था।

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महाभारत काल से जुड़ा है मंदिर का इतिहास

स्थानीय लोगों का मानना है कि वनवासकाल के दौरान पांडव यहां रुके थे। वह भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति की पूजा-पाठ किया करते थे। वनवास खत्म कर यहां से जाते समय पांडवों ने यह मूर्ति स्थानीय मछुआरों को भेंट कर दी थी। इसके बाद मछुआरों ने इस मूर्ति को स्थापित कर इसकी पूजा की। कुछ सालों बाद मछुआरों के गांव पर लगातार संकट आने लगे।

तब वहां से गुजर रहे एक साधु ने मछुआरों को बताया कि श्रीकृष्ण की पूजा ठीक से नहीं हो पा रही है। इसलिए इसे विसर्जित कर देना चाहिए। इसके बाद मछुआरों ने वह मूर्ति नदी में विसर्जित कर दी।

लगभग 1500 साल पहले विल मंगलयम स्वामीयर नामक एक व्यक्ति अपनी नाव से नदी से कहीं जा रहा था। अचानक इस गांव के पास उसकी नाव किसी चीज में फंस गयी और आगे नहीं बढ़ पा रही थी। स्वामीयर नाव से उतरकर उसे छुड़ाने की कोशिश करने लगे। तभी नदी का पानी अपने-आप सूख गया और 5 फीट की यह मूर्ति नदी से बाहर आ गयी।

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स्वामीयर इस मूर्ति को लेकर तिरुवरप्पु गांव पहुंचे और मूर्ति को एक स्थान पर रखकर खुद स्नान करने चले गये। वापस लौटकर जब उन्होंने मूर्ति को उठाने का प्रयास किया तो मूर्ति अपनी जगह से नहीं हिली। इसले बाद इस गांव में ही श्रीकृष्ण का एक भव्य मंदिर बनवाकर उसमें मूर्ति की स्थापना कर दी गयी।

क्या है इस मंदिर का रहस्य?

तिरुवरप्पु मंदिर के रहस्य में ही पुजारी का मंदिर के कपाट खोलने जाते समय हथौड़ा लेकर जाने का रहस्य भी छिपा हुआ है। स्थानीय लोगों का मानना है कि इस मंदिर में स्थापित भगवान को भूख बिल्कुल बर्दास्त नहीं होती है। अगर उन्हें भोग लगाने में थोड़ी सी भी देर हो जाती है तो मंदिर में स्थापित भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति दुबली होने लगती है। इसलिए उन्हें दिन में कम से कम 10 बार भोग लगाया जाता है।

आमतौर पर ग्रहण के समय मंदिर के कपाट को बंद कर दिया जाता है, लेकिन इस मंदिर को ग्रहण के समय भी खुला रखा जाता है। कहा जाता है कि एक बार ग्रहण के समय लंबे समय के लिए मंदिर के कपाट बंद किये गये थे। ग्रहण खत्म होने के बाद जब मंदिर के कपाट खुले तो श्रीकृष्ण के कमर में बंधी पट्टी नीचे खिसकी मिली थी। इसलिए उसके बाद से ग्रहण के समय भी मंदिर खुला रखकर भगवान को भोग लगाया जाता है।

इसके पीछे की मान्यता कहती है कि अपने मामा कंस का वध करने के बाद श्रीकृष्ण को काफी तेज भूख गयी थी। इसलिए उन्हें जल्दी-जल्दी और कम अंतराल पर भोग लगाया गया था।

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क्यों हथौड़ा लेकर जाते हैं पुजारी?

आप जरूर सोच रहे होंगे कि मंदिर के कपाट खोलने और भगवान को जल्दी-जल्दी भोग लगाने के बीच क्या संबंध है? इस मंदिर के कपाट खोलने के लिए पुजारी जब जाते हैं, तब उनके एक हाथ में चाभियों का गुच्छा और दूसरे हाथ में हथौड़ा होता है। मंदिर के कपाट को रात को ठीक 11.58 बजे बंद और उसके ठीक 2 मिनट बाद यानी रात के 12 बजे फिर से खोल दिया जाता है।

स्थानीय लोगों का मानना है कि अगर कपाट खोलने में थोड़ी भी देर होती है, तो मंदिर के पुजारी को यह अधिकार है कि वह दरवाजे का ताला तोड़कर मंदिर के कपाट खोल दे। इसलिए पुजारी हमेशा पूरी तैयारी के साथ ही मंदिर के कपाट खोलने जाते हैं। क्योंकि मंदिर में भगवान को भूख बर्दास्त नहीं होती और भोग न मिलने पर वह दुबले होने लगते हैं।

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