[Kerala Story] उत्तर केरल के कन्नूर जिले का प्राचीन कोट्टियूर शिव मंदिर वेस्टर्न घाट के पहाड़ी क्षेत्र में स्थित है। अगर आप घने जंगलों में स्थित इस मंदिर में जाएंगे तो बार-बार आपको कन्नड़ मूवी कांतारा के शॉट याद आयेंगे, कि जिस तरह फिल्म में ग्रामीण लोग जंगलों के बीच दैव पूजा करते थे, ठीक वैसे ही यहां पर स्थानीय लोग भगवान शिव की पूजा करते हैं।

केरल के लोग भगवान शिव के इस मंदिर को काशी के बराबर मानते हैं। इस मंदिर से कई पौराणिक कथाएं जुड़ी हुई हैं, जिनमें एक कथा है सती नाम की देवी की जिन्होंने यहां आत्मदाह कर लिया थी। इस आत्मदाह का कारण क्या था, यह आपको आगे हम बताएंगे।
कोट्टियूर दिर की खासियत
इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत है कि यहां का वार्षिक महोत्सव। यह महोत्सव मॉनसून के ठीक पहले आयोजित किया जाता है। मॉनसून में यहां से बहने वाली नदी का जलस्तर बढ़ जाता है, तब इन जंगलों में आम लोगों का प्रवेश बंद कर दिया जाता है। यह नदी मंदिर प्रांगण के ठीक बीचों-बीच से गुजरती है।
वार्षिक महोत्सव के दौरान नदी के दो किनारों पर आमने-सामने बने दो मंदिरों में एक मंदिर को कुछ दिनों के लिए खोला जाता है तो उस समय दूसरे किनारे पर मौजूद मंदिर को बंद रखा जाता है।

नदी के दो किनारों पर स्थापित हैं दो मंदिर
उत्तर केरल में कोट्टियूर महोत्सव साल में एक बार आयोजित किया जाता है। यहां बावली नदी के किनारे पर दो मंदिर स्थापित हैं। इनमें से एक को अक्कारे कोट्टियूर और दूसरे को इक्कारे कोट्टियूर के नाम से जाना जाता है। अक्कारे कोट्टियूर जो भगवान शिव का मंदिर है, साल में सिर्फ 28 दिनों के लिए खोला जाता है जब मंदिर के वार्षिक वैशाखमहोत्सवम् का आयोजन किया जाता है। यह महोत्सव मई-जून के दौरान आयोजित है। इस समय के दौरान नदी के दूसरे किनारे पर स्थित इक्कारे कुट्टियूर मंदिर को बंद रखा जाता है।

मंदिर के बीच से बहती है नदी
किसी भी आम मंदिर की तरह ही इक्कारे कोट्टियूर मंदिर का निर्माण भी साधारण ही है। लेकिन अक्कारे कोट्टियूर मंदिर काफी खास है। अक्कारे कोट्टियूर बावली नदी के बीच में स्थित है या यूं कहा जाए कि मंदिर के बीच से होकर नदी बहती है, तो कहना गलत नहीं होगा। लोग मानते हैं कि इस मंदिर का शिव लिंग स्वयंभू (स्वयं जमीन के अंदर से प्रकट हुआ) है। माना जाता है जो नदी के पत्थरों की वजह से यह एक ऊँचे मंच पर स्थापित है। इस मंदिर की कोई औपचारिक संरचना भी नहीं है।

जुड़ी है आत्महत्या की कहानी
कोट्टियूर मंदिर का इतिहास माता सती के आत्मदाह की कहानी से जुड़ा हुआ है। इस पौराणिक कहानी के अनुसार भगवान शिव से विवाह करने की वजह से नाराज होकर उनके पिता प्रजापति दक्ष ने यज्ञ का आयोजन किया लेकिन उसमें माता सती और भगवान शिव को उन्होंने नहीं बुलाया। उस यज्ञ का आयोजन कुट्टियूर मंदिर क्षेत्र में ही किया गया था। यज्ञ के बाद एक बकरे की बलि भी दी गई।

प्रजापति दक्ष की मंशा से अनजान माता सती पिता के घर गयी लेकिन वहां पति शिव का अपमान सहन नहीं कर पाने की वजह से उन्होंने अपनी योगशक्ति के बल से आत्मदाह कर आत्महत्या कर लिया। देवी सती की मृत्यु से दुःखी और क्रोधित भगवान शिव ने तांडव करना शुरू कर दिया और प्रजापति दक्ष का सिर इसी स्थान पर काट दिया था। तब भगवान विष्णु, ब्रह्मा और अन्य देवता भगवान शिव को शांत कराने आएं। बाद में भगवान शिव ने दक्ष के धड़ पर एक बकरे का सिर जोड़कर उन्हें फिर से जीवित किया था।
शंकराचार्य ने बनाएं थे महोत्सव के नियम
कोट्टियूर मंदिरों का जीर्णोद्धार आदि गुरु शंकराचार्य के समय किया गया था। कहा जाता है कि कोट्टियूर मंदिर में आयोजित होने वाला वार्षिक महोत्सव वैशाखमहोत्सवम् के नियमों को भी शंकराचार्य ने ही बनाया था। इस बात से साबित होता है कि कोट्टियूर मंदिर का इतिहास और यहां महोत्सव के दौरान पालन किये जाने वाले नियम कितने पुराने हैं।

वैशाखमहोत्सवम्
कोट्टियूर मंदिर में 28 दिनों के लिए आयोजित होने वाला वैशाखमहोत्सवम् की शुरुआत भगवान को घी से स्नान करवाने से होती है। इसे नेय्यट्टम कहा जाता है। वहीं वैशाखमहोत्सवम् का समापन भगवान को कोमल नारियल पानी के स्नान से संपन्न होता है। इस अनुष्ठान को एलेनीरट्टम कहा जाता है। कोट्टियूर मंदिर एक ऐसा स्थान कहलाता है जहां प्रकृति, मनुष्य और भगवान एक हो जाते हैं। इस स्थान को त्रिदेव - ब्रह्मा, विष्णु, महेश की पवित्र उपस्थिति का स्थान भी माना जाता है। वैशाखमहोत्सवम् के दौरान कोट्टियूर मंदिर सुबह 5.30 बजे से लेकर रात 8 बजे तक खुला रहता है।
क्या आप कोट्टियूर मंदिर जाना चाहते हैं?
अगर हां, तो सबसे पहले आपको कन्नूर जाना होगा। कन्नूर दक्षिण के सभी बड़े शहर जैसे बेंगलुरु, चेन्नई, तिरुवनंतपुरम, पालक्कड, कोच्चि, आदि से रेल एवं बस सेवाओं द्वारा कनेक्टेड है। नहीं तो आप अपने वाहन से भी जा सकते हैं। यह बेहद खूबसूरत जगह है और मॉनसून के पहले या मॉनसून के बाद जाने का अलग ही मज़ा है। और हां अगर आपको बारिश पसंद हो तो मॉनसून का मजा भी यहां पर ले सकते हैं।

खैर कन्नूर पहुंचने के बाद आप यहां से चलने वाली बस सेवाएं ले सकते हैं। केरल रोड ट्रांसपोर्ट द्वारा बसें चलती हैं, जो आपको सीधे कोट्टियूर मंदिर तक पहुंचा सकती हैं। एक बात तो तय है, जब भी आप इस मंदिर में जाएंगे, तो आपको नेटिवप्लैनेट का यह आर्टिकल जरूर याद आयेगा, क्योंकि वहां आप अपने आपको सीधे प्रकृति और भारत की प्राचीन संस्कृति से जोड़ पायेंगे।



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