भारत एक अनोखा देश है, जहां हर कदम पर एक नई परम्परा, एक नई संस्कृति देखने को मिलती है। कुछ ऐसा ही राजस्थान का करौली। जी हां, जहां मकर संक्रांति पर हर तरफ पतंगबाजी की जाती है, लोग अपने छतों से पतंग उड़ाने का अद्भुत आनंद लेते हैं। वहीं, करौली इससे अछूता रहता है। अब सवाल यह है कि ऐसा क्यों, आखिर ऐसी कौन सी बात है, जिससे करौली में पतंग नहीं उड़ाए जाते तो आइए जानते हैं...
250 साल पहले से चली आ रही परम्परा
दरअसल, पिछले 250 सालों से ये परम्परा चली आ रही है। मकर संक्रांति के दिन करौली में पतंग नहीं उड़ाया जाता है। लेकिन ऐसा नहीं है कि यहां पतंग उड़ाई ही नहीं जाती है। महाराजा गोपाल सिंह के काल से ही करौली में मकर संक्रांति की जगह जन्माष्टमी और रक्षाबंधन के दिन यहां पतंगबाजी करने की परम्परा है और करौलीवासी इसे इतने सालों से निभाते आ रहे हैं।

संक्रांति के दिन दान करने की परम्परा
करौली के लोग पतंग तो नहीं उड़ाते लेकिन पूरे देश की तरह यहां दान-पुण्य देखा जा सकता है। इस दिन लोग गरीबों में गर्म कपड़े, गुड़ और खाने-पीने की चीजों का दान करते हैं। यहां हर साल संक्रांति पर भंडारे का भी आयोजन किया जाता है।
करौली में घूमने की जगह
गुलाबी नगरी से करीब 150 किमी दूर स्थित करौली मध्य प्रदेश से सीमा साझा करता है। इस खूबसूरत से शहर में आप नदियों, जंगलों और पहाड़ों को देख सकते हैं। करौली एक प्रकार का लाल पत्थर निकलता है, जिसकी पूरे भारत की डिमांड रहती है। इसके अलावा यहां घूमने के लिए आपको किला, महल, मंदिर, वन्यजीव अभयारण्य और बांध मिलेंगे, जो आपकी यात्रा को सुखद बनाते हैं।

1. कैला देली मंदिर
2. मेंहदीपुर बालाजी मंदिर
3. श्री महावीर जी मंदिर
4. गोमती धाम
5. भवंर विलास पैलेस
6. सिटी पैलेस
7. राजा गोपाल सिंह की छत्री
8. तिमंगगढ़ फोर्ट
9. देवगिरी किला
10. कैला देवी अभ्यारण्य
करौली कैसे पहुंचें?
करौली पहुंचने के लिए यहां का नजदीकी हवाई अड्डा जयपुर में स्थित है, जो यहां से करीब 150 किमी दूर है। वहीं, यहां का नजदीकी रेलवे स्टेशन हिण्डौन सिटी रेल्वे स्टेशन है, जो करौली में ही स्थित है। इसके अलावा यहां सड़क मार्ग से भी आसानी से पहुंचा जा सकता है।



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