कल यानी 1 जुलाई से बाबा बर्फानी की अमरनाथ यात्रा शुरू होने वाली है। अगले 62 दिनों तक यह यात्रा जारी रहेगी। पूरे साल शिवभक्त अमरनाथ यात्रा शुरू होने का बेसब्री से इंतजार करते रहते हैं। कहा जाता है कि अमरनाथ धाम ऐसी जगह है जहां भगवान शिव स्वयं निवास करते हैं।

हर साल 10 से 12 फुट ऊंचा बर्फ से बना शिवलिंग स्वयं तैयार होता है, जो कुछ समय बाद धीरे-धीरे पिघल जाता है। श्रीनगर से लगभग 141 किमी दूर और 12756 फुट की ऊंचाई पर स्थित अमरनाथ की गुफा के लिए 30 जून को अमरनाथ यात्रियों का पहला जत्था रवाना हो चुका है।
अमरनाथ गुफा से कई लोककथाएं और रहस्य जुड़े हुए हैं, जिनकी आज तक कोई भी वैज्ञानिक व्याख्या नहीं मिल सकी है। आइए आपको उन रहस्यों और लोककथाओं के बारे में बताते हैं।
बर्फ से बनने वाला एकमात्र शिवलिंग
अमरनाथ की गुफा में बर्फ से बनने वाला शिवलिंग, दुनिया भर का एकमात्र शिवलिंग है जो बर्फ के ठोस रूप में जमने से बनता है। यह प्राकृतिक रूप से स्वयं ही बनता है। गुफा के अंदर निर्धारित स्थान पर ही प्रतिवर्ष यह शिवलिंग कैसे बनता है इसका कोई वैज्ञानिक कारण आज तक नहीं पता चला है।

खास बात यह है कि अमरनाथ की गुफा में कहा जाता है कि बर्फ कण के रूप में होता है लेकिन शिवलिंग ठोस बर्फ से कैसे बन जाता है, इसका कारण कोई नहीं बता पाया है। कहा जाता है कि काशी विश्वनाथ के दर्शन और पूजा से 10 गुना पूण्य मिलता है लेकिन अमरनाथ के दर्शन व पूजा से 100 गुना पूण्य मिलता है।
चंद्रमा के आकार के साथ घटता-बढ़ता
चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण बल की वजह से समुद्र में ज्वार और भाटा आने के बारे में तो आपने जरूर सुना होगा। इसकी वैज्ञानिक व्याख्या भी मिलती है। लेकिन क्या आपको पता है कि चंद्रमा के आकार के साथ ही अमरनाथ की गुफा में शिवलिंग का आकार भी घटता-बढ़ता रहता है। कहा जाता है कि पूर्णिमा के समय अमरनाथ गुफा में बाबा बर्फानी का शिवलिंग अपने पूरे आकार में होता है लेकिन अमावश्या के समय शिवलिंग का आकार थोड़ा छोटा हो जाता है।

हालांकि इस बात की वैज्ञानिक पुष्टि नहीं हुई है। अमरनाथ की गुफा में शिवलिंग के पास से लगातार पानी बहता रहता है, लेकिन वह पानी कहां से आता है, इसका कोई स्रोत नहीं बता पाया है। यह पानी शिवलिंग का पिघला पानी भी नहीं हो सकता है क्योंकि उसी गुफा में तो भगवान शिव का यह लिंगस्वरूप ठोस बर्फ से जमा रहता है।
ज्योतिर्लिंग नहीं है अमरनाथ की गुफा
भगवान शिव से जुड़े सभी पवित्र मंदिर ज्योतिर्लिंग कहलाते हैं लेकिन अमरनाथ का शिवलिंग जो स्वयंभू तो है लेकिन ज्योतिर्लिंग नहीं है। दरअसल, ज्योतिर्लिंग होने के लिए शिवलिंग का स्थायी होना अनिवार्य है जहां भगवान शिव का अंश स्थायी रूप से निवास करता है। लेकिन अमरनाथ की गुफा के बारे में कहा जाता है कि भगवान शिव यहां माता पार्वती के साथ एकांत में समय व्यतित करने आए थे। इसलिए अमरनाथ का शिवलिंग कुछ समय बाद खुद से ही गायब हो जाता है।
अमरनाथ की गुफा से जुड़ी लोककथाएं
मां पार्वती को अमरत्व की सुनायी थी कथा
कहा जाता है कि अमरनाथ गुफा में भगवान शिव ने माता पार्वती को अमरत्व की कथा सुनायी थी। एक बार जब माता पार्वती ने भोलेनाथ के गले में मुंड माला देखी तो उन्होंने उसके बारे में उनसे पूछा। भगवान शिव ने कहा, "पार्वती, ये सारे सिर तुम्हारी ही है। जब भी तुम्हारी मृत्यु होती है तो इस माला में एक सिर जुड़ जाता है।" इसके जवाब में माता पार्वती ने भोलेनाथ से उनके अमरत्व का कारण पूछा।

भगवान शिव ने तब किसी एकांत स्थान पर माता पार्वती को अमरत्व की कहानी सुनाने का निर्णय लिया। इसके लिए दोनों अमरनाथ की गुफा की तरफ चल पड़े। रास्ते में दोनों ने सबसे पहले पहलगाम में आराम किया और नंदी को यहीं पर छोड़ दिया। इसलिए नंदी हमेशा शिवमंदिर के बाहर प्रतिक्षारत मुद्रा में होते हैं। इससे आगे बढ़ने पर शेषनाग झील पहुंचकर उन्होंने अपने गले से सांप को उतार दिया। गणेश जी को महागुणस पहाड़ और पंचतरिणी में भगवान शिव पंच तत्वों को छोड़ने के बाद अमरनाथ की गुफा पहुंचे।
कबुतर ने सुनी कथा

अमरनाथ की गुफा में पहुंचकर भगवान शिव ने सभी से वह जगह खाली करके चले जाने के लिए कहा, लेकिन कबुतर का एक जोड़ा वहीं बैठा रहा। जब महादेव माता पार्वती को अमरत्व की कहानी सुना रहे थे, तब बीच में ही माता पार्वती सो गयी लेकिन कबुतर ने वह कहानी पूरी सुन ली। इस वजह से कबुतर का वह जोड़ा अमर हो गया और भगवान शिव के आर्शिवाद से अमरनाथ की गुफा में आज भी शिव-पार्वती के प्रतिक के रूप में कबुतर का वह जोड़ा निवास करता है।
अमरनाथ गुफा की खोज
अमरनाथ की पवित्र गुफा 5000 साल से भी पुरानी बतायी जाती है। कहा जाता है कि इसकी खोज बुट्टा मलिक नामक एक गडरिया ने किया था। एक बार अपनी भेड़ों को चराते समय बुट्टा मलिक काफी दूर निकल गया। रास्ते में उसे एक साधु मिला जिसने एक थैली में उसे कोयले के कुछ टुकड़े दिए। घर जाकर जब गडरिया ने थैली में देखा तो वहां कोयले के बदले उसे सोने के टुकड़े नजर आए। बुट्टा मलिक जब साधु को धन्यवाद कहने के लिए वापस उस जगह गया तो उसे वहां कोई साधु नहीं मिला बल्कि अमरनाथ की गुफा दिखी। इसके बाद से ही अमरनाथ की गुफा तीर्थ स्थान के रूप में मशहूर हो गयी।



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