कोलकाता कालीघाट मंदिर, जिसे मां काली का एक बेहद जागृत शक्तिपीठ माना जाता है। मान्यताओं के अनुसार देवी सती के दाहिने पैर की 4 ऊंगलियां कोलकाता में गिरी थी, जिसके बाद कालीघाट मंदिर का निर्माण हुआ था। स्थानीय लोगों का मानना है कि आज भी मां काली के पैर की ऊंगलियां इस मंदिर में मौजूद है। कालीघाट मंदिर से जुड़ी कई तरह की कहानियां प्रसिद्ध हैं। लेकिन...

क्या आपको पता है कि कालीघाट मंदिर का निर्माण किसने करवाया था? कालीघाट मंदिर का भैरव कौन है और उनके मंदिर के निर्माण की क्या कहानी है? कालीघाट मंदिर को बनाने में कितना खर्च आया था? क्या आप जानते हैं कि अंग्रेजों तक के मन में कालीघाट मंदिर के प्रति इतनी श्रद्धा थी कि उन्होंने भी यहां चढ़ावा भेजा था? जी हां, इस आर्टिकल में हम आपको कोलकाता के कालीघाट में स्थापित मां काली के इस प्रसिद्ध मंदिर के बारे में कई हैरान करने वाली जानकारियां देने वाले हैं।
क्या है कालीघाट की मां काली की खासियत
सबसे पहले आपको बता दें, कालीघाट में मां काली की जो प्रतिमा स्थापित है, वह दूसरे शक्तिपीठों से काफी अलग है। कालीघाट में मां काली ने अपना जीभ तो बाहर निकाल रखी है लेकिन उनके पैरों के नीचे भगवान शिव की कोई मूर्ति नहीं है। इस वजह से स्थानीय लोग कालीघाट की मां काली को पूर्णावयव मूर्ति नहीं मानते हैं। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यहां मां काली का जो वर्तमान स्वरूप देखा जाता है, वह हमेशा से ऐसा नहीं था।

कहा जाता है कि मां काली की मूर्ति कालीघाट मंदिर के पास ही स्थित कालीकुंड (वर्तमान में कुंडु पुकुर) के पास मिली थी। यह वह समय था जब कालीघाट से लेकर पार्क स्ट्रीट और एस्प्लेनेड जैसे वर्तमान पॉश इलाको में घने जंगल हुआ करते थे। कहा जाता है कि मां काली की मूर्ति का निर्माण किसी इंसान ने नहीं बल्कि स्वयं ब्रह्मा ने किया था। बाद में धीरे-धीरे धनी जमींदारों की आस्था मां काली में बढ़ती गयी और उन्हें विभिन्न आभूषणों से सजाया गया।
किसने करवाया था कालीघाट मंदिर का निर्माण
कालीघाट मंदिर के निर्माण को लेकर कई तरह की मान्यताएं प्रचलित हैं। लेकिन इनमें से सबसे अधिक जो मान्यता प्रचलित है, उसके अनुसार कालीघाट मंदिर का सबसे पहले निर्माण जशोरराज (वर्तमान बांग्लादेश) राजा वसंत राय ने करवाया था। कहा जाता है कि मां काली के इस मंदिर को उन्होंने 595 बीघा जमीन भी दान में दी थी। इसके बाद कालीघाट मंदिर का निर्माण बडिशा निवासी सवर्ण रायचौधरी (जमींदार) परिवार के संतोष रायचौधरी ने 18वीं सदी के अंत में करवाया था।

हालांकि मंदिर का निर्माण पूरा करवाने से पहले ही जमींदार संतोष चौधरी की मृत्यु वर्ष 1799 में हो गयी थी। उनकी मौत के बाद उनके बेटे और भतीजे ने कालीघाट मंदिर का निर्माण पूरा करवाया। 1809 में कालीघाट मंदिर का निर्माण पूरा हुआ। इस मंदिर से थोड़ी दूरी पर नकुलेश्वर महादेव का मंदिर स्थापित किया गया जो कालीघाट के भैरव हैं।
खर्च जानकर चौंक उठेंगे

बताया जाता है कि जब कालीघाट मंदिर का निर्माण कार्य संपन्न हुआ, उस समय इस मंदिर को बनाने में करीब 30,000 रुपए का खर्च आया था। हालांकि आज के समय में यह सुनने में काफी कम लगता हो, लेकिन ध्यान रहे। साल 1809 में कोलकाता (तत्कालिन कलकत्ता) में 1 मन महंगा चावल 1 रुपए में बिकता था।
हमें उम्मीद है कि अब आपको समझ में आ गया होगा कि उस समय कालीघाट मंदिर को बनाने में खर्च हुए 30,000 रुपया कितनी बड़ी रकम होती होगी। मंदिर निर्माण का पूरा खर्च सवर्ण रायचौधरी परिवार ने ही उठाया था।
अंग्रेजों ने भेजा था चढ़ावा

अंग्रेज पादरी फादर वार्ड ने अपनी किताब में उल्लेख किया है कि साल 1803 में अंग्रेजी सरकार की तरफ से 5000 रुपए का चढ़ावा मां काली के पास कालीघाट मंदिर में भेजा गया था। उन्होंने लिखा है कि उस समय पहली बार किसी देसी इसाई जोड़े की शादी हुई थी। ब्राह्मण परिवार से ईसाई बने दुल्हे और सुत्रधर परिवार से ईसाई बनी दुल्हन की शादी श्रीरामपुर में आयोजित की गयी थी।
भारत में ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार से खुश होकर ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने कुछ सेवकों के हाथों 5000 रुपए का चढ़ावा काली मंदिर में भिजवाया था। सिर्फ इतना ही नहीं, हर भारत विजय (भारत के किसी भी प्रांत पर विजय प्राप्त करना) पर अंग्रेज अधिकारी कालीघाट मंदिर में चढ़ावा चढ़ाया करते थे। इसके साथ ही अंग्रेज महिलाएं भी पालकी में बैठकर मां काली के दर्शन व उनका आर्शिवाद लेने कालीघाट मंदिर नियमित रूप से जाया करती थी।
नकुलेश्वर महादेव मंदिर निर्माण की दिलचस्प कहानी
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार हर शक्तिपीठ की रक्षा की जिम्मेदारी उसके भैरव पर होती है। कालीघाट की मां काली का भैरव नकुलेश्वर महादेव है, जिन्हें स्वयंभू माना जाता है। कालीघाट मंदिर के निर्माण के कई साल बीत जाने के बावजूद नकुलेश्वर महादेव का मंदिर नहीं बन पाया था। कालीघाट मंदिर के ठीक बगल से होकर बहती आदिगंगा नदी को एक अंग्रेज अधिकारी ने अपने खर्च पर विद्याधरी नदी से जोड़ दिया था, जिससे आदिगंगा में पानी बहाव काफी बढ़ गया था।

वर्ष 1858 तक, नकुलेश्वर महादेव का एक छोटा सा मंदिर बन पाया था। मान्यताओं के अनुसार एक पंजाबी व्यापारी तारा सिंह को व्यापार में काफी मुनाफा हुआ था। उसने वाराणसी में सन्यासियों के लिए एक विशाल मठ का निर्माण करने का फैसला लिया और मठ बनाने के लिए नाव पर पत्थर लादकर बनारस के लिए निकल पड़ा। लेकिन उस समय गंगा नदी में बहाव इतनी तेज थी कि माझी नाव को बनारस के घाट पर रोक ही नहीं पाया।
कहा जाता है कि वह नाव सीधे कालीघाट मंदिर के पास आदिगंगा घाट पर आकर रुकी। तारा सिंह ने जब मां काली के भैरव नकुलेश्वर महादेव के मंदिर की बुरी अवस्था देखी तो उसने उन पत्थरों से ही नकुलेश्वर महादेव का मंदिर बनवा दिया।



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