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75 किलो सोने-चांदी के गहनों से यहां सजती हैं मां काली, कोलकाता में सबसे ऊंची होती है इस पंडाल की प्रतिमा

दिवाली की रात को कोलकाता समेत पूरे पश्चिम बंगाल में बड़े ही धुमधाम से मां काली की पूजा की जाती है। दिवाली की पूरी रात राज्य के विभिन्न काली मंदिरों और शक्तिपीठ में तो मां काली की पूजा और विशेष अनुष्ठान का आयोजन किया जाता है, इसके साथ ही दुर्गा पूजा के तर्ज पर कोलकाता के गली-मुहल्लों में भी पंडाल बनाकर मां काली की प्रतिमा स्थापित की जाती है।

maa kali idol

पूरे कोलकाता शहर में कई प्रसिद्ध काली पूजा पंडाल हैं, जिनमें से एक है पाथुरियाघाटा बोड़ो काली पूजा। इस काली पूजा पंडाल में हर साल कोलकाता की सबसे ऊंची मां काली की प्रतिमा स्थापित की जाती है।

स्वाधिनता संग्रामियों से है संबंधित

पाथुरियाघाटा व्यायाम समिति की ओर से आयोजित होने वाली इस काली पूजा का संबंध भारत के स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लेने वाले प्रमुख और चर्चित नाम सुभाष चंद्र बोस से है। इस साल पाथुरियाघाटा बोड़ो काली पूजा ने अपने 95 सालों का सफर पूजा कर 96वें साल में कदम रखा है। साल 1928 में इस काली पूजा की शुरुआत हुई थी।

वर्तमान समय में इस काली पूजा का आयोजन 22 नंबर यदूनाथ मल्लिक रोड में किया जाता है लेकिन जब इसकी शुरुआत हुई थी उस समय यह पूजा निमतल्ला घाट स्ट्रीट से सटे प्रसन्न कुमार ठाकुर घाट इलाके में होती थी। साल 1930 में इस काली पूजा कमेटी के प्रेसिडेंट की जिम्मेदारी कोलकाता के तत्कालिन मेयर सुभाष चंद्र बोस ने निभाई थी।

क्यों हुई थी इस काली पूजा की शुरुआत

pathuriya ghata

बंग-भंग (बंगाल के विभाजन यानी पश्चिम बंगाल और पूर्व बंगाल जो वर्तमान में बांग्लादेश है) के विरोध में ब्रिटिश भारत में चले स्वदेशी आंदोलन में हिस्सा लेने वाले विख्यात लठैत अतुल कृष्ण घोष, जो उस समय के कुख्यात रघु डकैत को अपना गुरु मानते थे, वे इस काली पूजा के प्रवर्तक थे। कहा जाता है कि स्वदेशी आंदोलन से जुड़े स्वतंत्रता सेनानी शक्ति (देवी काली/दुर्गा) की उपासना ज्यादा किया करते थे। इसी वजह से पाथुरियाघाटा बोड़ो काली पूजा की शुरुआत की गयी थी।

lord shiva and goddess kali

साल 1956 में इस काली पूजा का स्थान परिवर्तित हुआ और प्रसन्न कुमार ठाकुर घाट से इस पूजा को स्थानांतरित कर मैदानी इलाके में लाया गया। यह वहीं मैदान था जहां फिलहाल कोलकाता का प्रसिद्ध बिनानी धर्मशाला मौजूद है। वर्ष 1963 तक इसी मैदान में मां काली की आराधना की गयी। इसके अगले साल से इस पूजा का स्थान परिवर्तित किया गया। तब से लेकर अब तक यह काली पूजा वर्तमान स्थान यानी 22 नंबर यदूनाथ मल्लिक रोड के मैदान में ही आयोजित हो रहा है।

कोलकाता की सबसे ऊंची मां काली की प्रतिमा

पाथुरियाघाटा बोड़ो काली पूजा अपने विशालाकार काली प्रतिमा के लिए प्रसिद्ध है। दावा किया जाता है कि इस पूजा पंडाल में कोलकाता की सबसे ऊंची मां काली की प्रतिमा तैयार की जाती है जिसकी ऊंचाई करीब 32 फीट होती है। यहां मां काली को करीब 75 किलो सोने व चांदी के गहनों से सजाया जाता है। मां काली के हाथ में 6 फीट का चांदी का खड्ग होता है और गले में 3 फीट के चांदी के मुंड माला से मां काली का श्रृंगार किया जाता है।

maa kali

काली पूजा संपन्न होने के बाद जब मां काली का विसर्जन किया जाता है तब करीब 9 किमी लंबा रास्ता मां काली को उसी राजसी वेश में सजाकर जुलूस निकाला जाता है। त्योहार के दिनों में कोई भी खाली पेट ना सोये, इस सोच के साथ ही इस काली पूजा कमेटी की तरफ से जरूरतमंदों के लिए काली पूजा के बाद अन्नकुट (भंडारा) का भी आयोजन होता है जिसमें करीब 1500 लोगों को भरपेट खाना खिलाया जाता है।

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