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इस देवी का प्रकोप उत्तराखंड को पलभर में कर सकता है बर्बाद

उत्तराखंड देवों की भूमि है, जहां असंख्य साधकों ने अपने तप के बल पर इस धरा दैवीय बनाया है। वैश्विक स्तर पर अध्यात्म और आस्था के लिए प्रसिद्ध इस पहाड़ी राज्य की अपनी अलग पहचान है। यहां कई ऐसे धार्मिक स्थान मौजूद हैं जिनका संबंध पौराणिक काल से है। प्राचीन ऋषि परंपरा की जड़ों को थामे उत्तराखंड दुनिया के चुनिदा धार्मिक पर्यटन केंद्रों मे गिना जाता है।

यहां दूर-दूर से सैलानी आकर आत्मिक और मानसिक शांति का अनोखा अनुभव प्राप्त करते हैं। वैसे तो उत्तराखंड में अनगिनत छोटे-बड़े मंदिर मौजूद हैं लेकिन आज हम अपने इस लेख के माध्यम से यहां के एक ऐसे मंदिर के बारे में आपको बताएंगे जहां की देवी उत्तराखंड की रक्षक मानी जाती है। 

सदियों से कर रही हैं रक्षा

सदियों से कर रही हैं रक्षा

वैसे तो आपने उत्तराखंड के कई चमत्कारी मंदिरों और देवी-देवताओं के बारे में सुना होगा लेकिन आज हम आपको उन देवी के बारे में बताने जा रहे हैं जो कई सालों से राज्य की रक्षा कर रही हैं। मां धारी देवी उत्तराखंड की रक्षक मानी जाती है। माना जाता है कि राज्य में जितने भी धार्मिक स्थल मौजूद हैं उनकी रक्षा स्वयं माता धारी करती हैं।

माता के मंदिर में पूजा पूरे विधि विधान से होती है क्योंकि कोई भी माता के प्रकोप का भागी नहीं बनना चाहता। वैसे आज तक ऐसी स्थित नहीं आई है।अद्भुत : उत्तराखंड का यह फल कभी देवताओं को परोसा जाता था

ऐतिहासिक मंदिर

ऐतिहासिक मंदिर

माता धारी देवी का मंदिर काफी प्राचीन बताया जाता है। माता का सिद्धपीठ उत्तराखंड के श्रीनगर से लगभग 15 किमी की दूरी पर स्थित कलियासौड़ इलाके में अलकनंदा नदी के तट पर बसा है। माना जाता है कि इस मंदिर का इतिहास काफी सालों पुराना है।

जानकारों के मुताबिक यहां वर्ष 1807 के साक्ष्य पाएं गए हैं। जबकि यहां के ग्रामीण लोगों और मंदिर के महंत का कहना है कि मंदिर इससे भी कई साल पुराना है।

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भक्तों का जमावड़ा

भक्तों का जमावड़ा

प्राचीन मंदिर होने के कारण इस मंदिर से भक्तों की गहरी आस्था जुड़ी है। माता धारी देवी के मंदिर में आपको ढेरों घंटियां दिखेंगी। पूजा के समय घंटी की आवाज दूर-दूर तक जाती है, जिसके बाद यहां दर्शनाभिलाषियों का तांता लग जाता है। यहां भक्त आपको माता के जयकारे लगाते हुए दिख जाएंगे।

बता दें कि बद्रीनाथ जाने वाले श्रद्धालु यहां रूककर माता के दर्शन अवश्य करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार मां धारी देवी का शरीर कालीमठ में स्थित है। कालीमठ रूद्रप्रयाग का एक धार्मिक मठ है।अद्भुत :भारत के इन शहरों से जुड़ा है मां दुर्गा का खास नाता, जानिए क्यों

मंदिर का पौराणिक महत्व

मंदिर का पौराणिक महत्व

कहा जाता है कि प्राकृतिक आपदा के दौरान माता का मंदिर पूरी तरह बह गया था, लेकिन एक चट्टान जैसी शिला से सटा मां की प्रतिमा पास के धारों नाम के गांव में बची रही। जिसके बाद गांव वालों को मां की आवाज सुनाई दी। मां ने गांववालों को उसी स्थान पर मंदिर निर्माण का आदेश दिया।

मान्यता है कि माता के यहां मत्था टेकने से हर मनोकामनाएं पूरी होती है। इसलिए अगर आप उत्तराखंड आएं तो माता के दर्शन अवश्य करें।OMG : जितना चाहें दबाकर खाएं और जितनी मर्जी उतना चुकाएं !

कैसे करें प्रवेश

कैसे करें प्रवेश

माता का मंदिर राज्य के श्रीनगर हिल स्टेशन से लगभग 15 किमी की दूरी पर स्थित है। आप यहां सड़क मार्गों से भी पहुंच सकते हैं। आप श्रीनगर निजी वाहनों या प्राइवेट-सरकारी बसों के द्वारा जा सकते हैं।देहरादून से श्रीनगर की दूरी मात्र 156 किमी की है। यहां का नजदीकी रेलवे स्टेशन ऋषिकेश है और नजदीकी हवाईअड्डा जॉली ग्रांट जो देहरादून में स्थित है। ऋषिकेश से श्रीनगर की दूरी 113 किमी रह जाती है।

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