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मध्य प्रदेश का महाभारतकालिन मंदिर, जहां आज भी शिवलिंग पर मिलते हैं अश्वत्थामा के चढ़ाए ताजे फूल

पौराणिक मान्यताओं में कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण से मिले श्राप की वजह से द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा आज भी जीवित हैं। मध्य प्रदेश में मौजूद एक मंदिर हजारों सालों बाद आज भी इस बात को सही साबित करता है। जी हां, मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले में स्थित असीरगढ़ किले में मौजूद भगवान शिव के एक मंदिर के बारे में कहा जाता है कि यहां भोर के समय में हर रोज अश्वत्थामा भगवान शिव की पूजा करने आते हैं।

Gupteswar mahadev temple Madhya pradesh

सिर्फ इतना ही नहीं, कहा जाता है कि इस दावे को सच साबित करते हुए यहां कई सबूत भी मिलते हैं। क्या है इस मंदिर की हकिकत? क्या सच में महाभारत काल के अश्वत्थामा हजारों साल बाद आज भी जीवित हैं? अगर हां, तो वह किसी को दिखाई क्यों नहीं देते? क्या मंदिर में आते-जाते या पूजा करते वक्त उन्हें किसी ने देखा है? आइए इन्हीं सवालों का जवाब ढूंढने की कोशिश करते हैं :-

क्या हैं मंदिर में अश्वत्थामा के आने के सबूत?

मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले में मौजूद असीरगढ़ किले में भगवान शिव को समर्पित एक प्राचीन मंदिर है। दावा किया जाता है कि इस मंदिर का इतिहास महाभारतकाल से जुड़ा हुआ है। मंदिर में एक रहस्यमयी सुरंग का गुप्त मार्ग मौजूद होने की वजह से इसे गुप्तेश्वर महादेव का मंदिर कहा जाता है। मंदिर के पास से होकर ही ताप्ती नदी बहती है। स्थानीय लोगों का कहना है कि हर रोज सुबह में ब्रह्म मुहूर्त के समय अश्वत्थामा यहां पहले ताप्ती नदी में स्नान करते हैं और फिर महादेव की पूजा कर गुप्त मार्ग से वापस लौट जाते हैं। इतिहासकारों के मुताबिक इस बात का उल्लेख तापी महापुराण में भी मिलता है।

shiva lingam of gupteswar mahadev ashwatthama

पुजारी ने किया अश्वत्थामा को देखने का दावा

महाभारतकालिन इस मंदिर में वर्तमान समय में पुजारी का काम महेश्वर दामोदर पाटिल करते हैं। उनका दावा है कि उनके पिता दामोदर जयराम पाटिल को अश्वत्थामा ने एक बीमार व्यक्ति के रूप में दर्शन दिया था। रात को उनके पिता द्वारा पकाया हुआ भोजन ग्रहण करने के बाद अचानक वह गायब भी हो गये थे। कहा जाता है कि मंदिर के बाहर स्थापित नंदी महाराज की मूर्ति पर तो धूल जमी रहती है लेकिन मंदिर के अंदर स्थापित शिवलिंग को देखकर ऐसा लगता है मानों अभी-अभी कोई यहां पूजा करके गया है।

सुबह के समय जब मंदिर का द्वार खोला जाता है तो शिवलिंग पर ताजे फूल और गुलाल चढ़ाए हुए मिलते हैं। महेश्वर दामोदर पाटिल का दावा है कि अगर किसी भी दिन हमें पूजा करने में देर होती है, तो मंदिर में पूजा की हुई नजर आती है। बताया जाता है कि शिवलिंग पर अधिकांश समय गुलाब के फूल ही मिलते हैं। कुछ सालों पहले एक आदिवासी युवक ने दावा किया था कि उसने यहां अश्वत्थामा को सफेद रंग के घोड़े से उतरते हुए देखा है। उस व्यक्ति की कदकाठी करीब साढ़े 7 फीट लंबी और सिर के बाल सफेद थे।

कौन थे अश्वत्थामा?

आगे बढ़ने से पहले हम आपको बता दें कि इतनी देर से हम जिस अश्वत्थामा के बारे में बात कर रहे हैं, वो वास्तव में थे कौन! दरअसल, अश्वत्थामा महाभारत के पांडवों और कौरवों के गुरु द्रोण के पुत्र थे। महाभारत के युद्ध में गुरु द्रोण ने कौरवों का साथ दिया। भगवान श्रीकृष्ण के आदेश से युधिष्ठिर ने कुटनीति का सहारा लिया। वह गुरु द्रोणाचार्य के पास गये और कहा कि अश्वत्थामा मारा गया। हालांकि उन्होंने धीरे से यह भी कहा, "नरो वा कुंजरो, अहं ना जानामि।" यानी वह मनुष्य था या हाथी था, यह मुझे नहीं पता। (वास्तव में उस समय अश्वत्थामा नाम का हाथी मारा गया था।)

tapti river

पुत्रशोक में गुरु द्रोण ने शस्त्र त्याग दिये और इसका लाभ उठाकर पांचाल नरेश द्रुपद के पुत्र धृष्टद्युम्न ने उनका वध कर दिया। पिता की हत्या से क्रोधित अश्वत्थामा ने पहले सभी पांडवपुत्रों की हत्या कर दी और उनके कुल का नाश करने के उद्देश्य से उसने अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भस्थ शिशु परीक्षित को मारने के लिए ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया। अपने योग साधना के बल से श्रीकृष्ण ने उत्तरा के गर्भ को बचा लिया था। अश्वत्थामा के इस कृत्य से क्रोधित होकर भगवान श्रीकृष्ण ने उसके माथे पर लगी मणी छिनकर उसे तेजहीन कर दिया और उसे अमर होने का श्राप दे दिया।

मंदिर में मौजूद है रहस्यमयी गुफा

गुप्तेश्वर महादेव के मंदिर के ठीक पीछे एक गुफा मौजूद है। इस गुफा का क्या रहस्य है, यह आज तक कोई नहीं जान सका है। दावा किया जाता है कि इसी गुफा से होकर हर रोज अश्वत्थामा मंदिर में पूजा करने आते हैं और इसी गुफा से वह वापस लौट जाते हैं। स्थानीय कुछ लोगों का दावा है कि यह गुफा मकड़ाई रियासत, कुछ सांगवा किले तक और कुछ चारुवा की गढ़ी तक जाने का रास्ता होने का दावा करते हैं। लेकिन गुफा असली में कहां खुलती है, इस बात का पता किसी को नहीं चल पाता है। कोई व्यक्ति गुफा में गुम ना हो जाए, इस वजह गुफा के दरवाजे को बंद ही रखा जाता है। मूल रूप से इसी रहस्यमयी गुफा के कारण मंदिर को इस गुप्तेश्वर महादेव का मंदिर कहा जाता है।

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